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Updated: 17 मई, 2022 04:02 PM
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''जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ''...सोमवार को ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे खत्म होने के बाद हिंदू पक्ष के पैरोकार डॉ. सोहनलाल जैसे ही लोगों के सामने आए, उनके मुंह से संत कबीरदास का ये दोहा फूट पड़ा. बोले- अंदर नंदीवाले बाबा मिल गए हैं. उनके बयान का मतलब था कि मस्जिद के अंदर शिवलिंग मिला है. बाद में हिंदू पक्ष के पैरोकार जितेंद्र सिंह बिसेन ने कहा, ''ज्ञानवापी में करीब साढ़े 12 फीट का शिवलिंग मिला है. मैं अयोध्या की तरह 500 साल का इंतजार नहीं करूंगा. बाबा विश्वनाथ का भव्य मंदिर बनकर रहेगा और जल्द से जल्द बनेगा. जो भी आज मिला है, वह सत्य को सामने ला रहा है.'' हिंदू पक्ष के प्रार्थन पत्र के मद्देनजर अदालत ने मस्जिद में स्थित उस जगह को सील करने का आदेश दिया, जहां शिवलिंग मिला है. अदालत ने यह भी कहा कि उस जगह को सुरक्षित और संरक्षित किया जाए. वहां जाने की अनुमति किसी को न दी जाए. इसके साथ ही अदालत ने वाराणसी डीएम, पुलिस कमिश्नर और सीआरपीएफ कमांडेंट को सील जगह को सुरक्षित करने की व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदारी दी है.

untitled-1-650_051622084946.jpgज्ञानवापी मस्जिद वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के ठीक बगल में स्थित है, जहां शिवलिंग मिला है.

ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग मिलने और अदालत द्वारा वहां वजूखाने को सील करने के आदेश के बाद मुस्लिम नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. मुस्लिमों के बड़े नेता और एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि वहां ज्ञानवापी मस्जिद थी, है और कयामत तक रहेगी. हमारा देश अपने ही बनाए कानून का उल्लंघन कर रहा है. 91 एक्ट जब तक है उसका पालन होगा. देश अपने ही कानून को नहीं मान रहा है. निचली अदालत का फैसला संसद के 91 एक्ट का उल्लंघन है. मोदी जी बोल दें कि वे 1991 का आदेश नहीं मानेंगे. उसे गंगा में बहा दीजिए. ये एक्ट इसलिए बना कि किसी भी मजहब के मंदिर मस्जिद के नेचर और करैक्टर में कोई बदलाव न किया जाए. इतना ही नहीं ओवैसी ने स्थानीय अदालत के फैसले पर हैरानी जताते हुए कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर सुनवाई करने वाला है, तो निचली अदालत को इतनी जल्दी क्या थी कि वो मस्जिद में स्थित वजूखाने सील कर दे. कानून वह वजूखाना था और वजूखाना ही रहेगा. ओवैसी ही नहीं कई मुस्लिम पक्षकार और जानकार इस मामले में 91 एक्ट का जिक्र कर रहे हैं.

आखिर 1991 एक्ट क्या है, जिसका जिक्र हो रहा है?

1991 एक्ट यानी प्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट यानी उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार के प्रस्ताव पर संसद में पास किया गया था. इस कानून के मुताबिक, 15 अगस्त 1947 यानी देश की आजादी से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के उपासना स्थल को किसी दूसरे धर्म के उपासना स्थल में नहीं बदला जा सकता है. यदि कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना का प्रावधान किया गया है. सनद रहे कि ये कानून उस वक्त अस्तित्व में आया था, जब देश भर में अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद और श्रीराम जन्मभूमी का मामला तूल पकड़े हुए था. उसी वक्त कारसेवकों के द्वारा बाबरी मस्जिद का विध्वंस किया गया था. लेकिन वहां मिले साक्ष्य और सबूतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू पक्ष के हक में फैसला सुनाया था, जिसके बाद ही अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो सका है. कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा था कि मस्जिद परिसर और खुदाई में मिले सबूत वहां मंदिर होने का प्रमाण देते हैं.

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट का होता रहा है विरोध

अयोध्या मामले में फैसला आने के बाद से ही देशभर के सैकड़ों उपासना स्थलों पर मंदिर होने की दावेदारी की जा रही है. इसमें ज्यादातर जगहों पर मस्जिद बनी है, लेकिन प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 की वजह से दावा करने वाले कोर्ट नहीं जा पाते हैं. इसकी वजह से कानून का लगातार विरोध हो रहा है. खासकर हमेशा से ही मंदिर की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने इस कानून की हमेशा मुखालफत की है. एक साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने पूजा स्थल कानून, 1991 को चुनौती देने वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा था कि ये कानून देश के नागरिकों में भेदभाव करता है और मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन करता है. याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने कानून को भेदभावपूर्ण और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी थी. याचिका में इस कानून की धारा दो, तीन, चार को रद्द करने की मांग करते हुए कहा गया था कि 1192 से लेकर 1947 के दौरान मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा गैरकानूनी रूप से स्थापित किए गए उपासना स्थलों को कानूनी मान्यता देते हैं.

आगे क्या होगा, शिवलिंग आधार बनेगा क्या?

ऐसा दावा किया जा रहा है कि जो शिवलिंग ज्ञानवापी मस्जिद के वजूखाने से मिला है, उसे अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल ने साल 1585 में स्थापित कराया था. उनके साथ बनारस के पंडित नारायण भट्‌ट भी थे, जिनके परिवार के लोग काशी विश्वनाथ मंदिर के पुरोहित का काम करते रहे हैं. शिवलिंग पन्ना पत्थर से बना है, जिसका रंग हरा है. यह शिवलिंग श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित नंदी के सामने 83 फीट दूरी पर ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर विराजमान है. यदि ये दावा सच निकलता है, तो शिवलिंग 450 साल पुराना है. ऐसे में इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित किया जा सकता है. क्योंकि ये प्राचीन स्मारक, पुरातत्वीय स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत आ जाएगा. इस अधिनियम के तहत प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारकों, मूर्ति नक्काशियों और इसी तरह की अन्य वस्तुओं, पुरातत्वीय स्थलों और अवशेषों का संरक्षण एवं परिरक्षण किया जाता है. ऐसे में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 का इस केस में प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. कुल मिलाकर, यह सुप्रीम कोर्ट के उपर निर्भर करता है कि वो इस मामले में क्या फैसला करती है.

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