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Updated: 29 मई, 2021 02:16 PM
मुकेश कुमार गजेंद्र
मुकेश कुमार गजेंद्र
  @mukesh.k.gajendra
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आजादी से पहले की बात है, फिल्मों ने अभी बोलना शुरू नहीं किया था. साल 1922 में एक गुजराती लड़का मुंबई पहुंचा था. अस्तबल में रहकर घोड़े की नाल ठोका करता था. एक दिन जुनून सवार हुआ, तो उस दौर की मशहूर फिल्म कंपनी 'इम्पीरियल' के दरवाज़े पर दस्तक दे दी. लेकिन दरबान ने बाहर से चलता होने का इशारा किया, बोला- 'इधर छोकरा लोग नई मंगता. छोकरी लोग मंगता है. ये फिल्म कंपनी है.' इस बात से वो लड़का निराश नहीं हुआ. एक के बाद एक दूसरे फिल्म स्टूडियो के दरवाज़े खटकाता रहा, लेकिन हर जगह जवाब एक जैसा ही मिलता.

वो लड़का भी जिद्दी था. दिल का सच्चा और अपने इरादे का पक्का. उसे पांच साल लगे, लेकिन एक दिन इम्पीरियल फिल्म कंपनी में घुस ही गया. फिल्मों में एक्स्ट्रा का काम मिला, लेकिन अपनी मेहनत से उसमें भी अलग पहचान बना ली. एक दिन यही लड़का फिल्म इंडस्ट्री का मशहूर निर्माता-निर्देशक बना, जिसने 'मदर इंडिया' जैसी फिल्म बनाई और जिसने पहली बार बॉलीवुड को 'ऑस्कर' की राह दिखाई. जी हां, हम दिग्गज फिल्म मेकर महबूब खान की बात कर रहे हैं. उनका जन्म 9 सितंबर 1907 में गुजरात के सूरत में हुआ था.

1_650_052821065507.jpgसाल 1957 में महबूब खान की 'मदर इंडिया' ऑस्कर अवॉर्ड के अंतिम पांच तक पहुंची थी.

'मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है'...महबूब खान की हर फिल्म की शुरूआत में ये शेर जरूर देखा जा सकता है. इस शेर के जरिए वो लोगों को संदेश देना चाहते थे कि किसी के चाहने या न चाहने से हमारा भविष्य तय नहीं होता. हमें अपनी मेहनत और किस्मत पर भरोसा रखना होगा. उनकी खुद की जिंदगी भी इस बात की गवाह है. वरना फिल्मों में एक्स्ट्रा का काम करने वाला एक लड़का एक दिन फिल्म इंडस्ट्री का इतना बड़ा निर्माता-निर्देशक नहीं बनता. उनकी जिद्द उनको सफलता के इस मुकाम तक लेकर आई थी.

'महबूब' और 'मदर इंडिया' की दिलचस्प दास्तान

फिल्म 'मदर इंडिया' की कहानी भी महबूब की जिंदगी की तरह दिलचस्प है. जैसे उन्होंने संघर्षों के बाद सफलता का स्वाद चखा, वैसे ही फिल्म भी तमाम विषम परिस्थितियों से निकल ऑस्कर तक पहुंची थी. भारतीय सिनेमा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अपना नाम दर्ज कराया. 'मदर इंडिया' फिल्म का टाइटल अमेरिकन कैथरीन मायो की किताब 'मदर इंडिया' से लिया गया था. इसमें भारतीय समाज और संस्कृति का खूब मजाक बनाया गया था. इस वजह से इस किताब का बहुत विरोध हुआ था. महबूब ने भी इसी विरोध चलते अपनी फिल्म का नाम 'मदर इंडिया' रखा था.

फिल्म मेकिंग के दौरान आया था आर्थिक संकट

साल 1940 में आई फिल्म 'औरत' के राइट्स लेकर 'मदर इंडिया' बनाई गई. दोनों ही फिल्मों का निर्देशन महबूब खान ने ही किया था. फिल्म मेकिंग में भी कई मुश्किलें आई थीं. इसे बनाने में करीब 40 लाख रुपए खर्च हुए थे. इस वजह से महबूब के पास पैसों की कमी हो गई. बताया जाता है कि ये बात जब फिल्म एक्ट्रेस निम्मी को पता चली तो वो अपनी साड़ी के पल्लू में नोटों का बंडल बांधकर महबूब खान के दफ्तर पहुंचीं. उनके मैनेजर को पैसे पकड़ाए. यहां तक कि मैनेजर से यह अनुरोध किया कि ये पैसे किसने दिए, इसके बारे में महबूब साहब को न बताया जाए.

दिलीप कुमार की जगह सिलेक्ट हुए सुनील दत्त

महबूब खान जब मदर इंडिया फिल्म की स्टारकास्ट को फाइनल कर रहे थे तो उनके दिमाग में पहला नाम दिलीप कुमार का था. लेकिन फिल्म की हीरोइन नरगिस ने इस पर आपत्ति जता दी. उनका कहना था कि इतनी फिल्मों में वो दिलीप कुमार की प्रेमिका बन चुकी है कि लोग उनके मां के किरदार में स्वीकार नहीं कर पाएंगे. इसका असर फिल्म पर भी पड़ेगा. ये बात महबूब साहब को समझ आ गई. इसके बाद उन्होंने नए कलाकारों का ऑडिशन लिया. इसमें सुनील दत्त की एक्टिंग महबूब और नरगिस दोनों को पसंद आई. इस तरह फिल्म में उनकी एंट्री हो गई.

फिल्म मदर इंडिया से दिखाई ऑस्कर की राह

फिल्म मदर इंडिया रिलीज होने के बाद सुपर हिट हुई. दो नेशनल फिल्म फेयर अवॉर्ड झटके. उस समय राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू समेत कई सम्मानित नेताओं ने राष्ट्रपति भवन में इसे एक विशेष शो में इसे देखा. यही नहीं ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भी 'मदर इंडिया' नामांकित की गई और फिल्म महिला सशक्तिकरण का दस्तावेज बनी. अमेरिका की अकादमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंस द्वारा सर्वोत्तम विदेशी फिल्म श्रेणी के पुरस्कार की शुरूआत 1956 से हुई. तब से 57 वर्षों में केवल 3 भारतीय फिल्में अंतिम राउंड तक पहुंच सकी हैं.

महज एक वोट से हाथ से फिसला ऑस्कर

साल 1957 में महबूब खान की 'मदर इंडिया' अंतिम पांच तक पहुंची ही नहीं थी बल्कि ऑस्कर लाने वाली पहली फिल्म बनने से मात्र एक वोट से पिछड़ गई थी. उसे चुनौती मिल रही थी फेडरिको फेलिनी की 'नाइट्स ऑफ कैबीरिया' से. ऑस्कर के निर्णायकों के बीच तीन बार टाई होने के बाद फैसला एक वोट से फेलिनी के पक्ष में चला गया. दरअसल, ऑस्कर के लिए भी प्रचार करना पड़ता है. भारतीय सरकार और फिल्म इंडस्ट्री को यह जानकारी ही नहीं थी कि अन्य देश अपनी फिल्म की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करने के लिए कितना परिश्रम करते हैं. धन खर्च करते हैं.

कई एक्टर-एक्ट्रेस को बनाया सुपरस्टार

महबूब खान ने 40, 50 और 60 के दशक में अपनी फिल्मों के जरिए कई एक्टर-एक्ट्रेस को लॉन्च किया, स्टेबलिश किया और उनको सुपरस्टार बना दिया. इनमें सुरेंद्र, अरुण कुमार आहूजा, दिलीप कुमार, राज कपूर, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार, राज कुमार, निम्मी, नादिरा और नरगिस जैसे कलाकारों के नाम शामिल हैं. वो साल 1961 में द्वितीय मास्को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में जूरी के सदस्य थे. फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष बने रहे. महबूब खान हॉलीवुड फिल्मों से बहुत प्रभावित रहते थे. इसलिए अपनी फिल्मों में भी अक्सर हॉलीवुड की शैली में भव्य सेट बनवाते थे. मुंबई में उनका बनाया हुआ मेहबूब स्टूडियो आज भी उनकी दूरदर्शिता का गवाह बना हुआ है.

लेखक

मुकेश कुमार गजेंद्र मुकेश कुमार गजेंद्र @mukesh.k.gajendra

लेखक इंडिया टुडे ग्रुप में सीनियर असिस्टेंट एडिटर हैं.

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