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Updated: 15 सितम्बर, 2020 08:12 PM
ओम प्रकाश धीरज
ओम प्रकाश धीरज
  @om.dheeraj.7
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हिंदी समेत अन्य भाषाओं की फ़िल्म इंडस्ट्री में काफी समय से फ़िल्मों के नाम के साथ अक्सर प्रयोग किए जाते हैं, जिनमें कुछ कहावतों पर आधारित होती हैं, कुछ मान्यताओं और कुछ कहानी के अनुसार शायराना या कविताओं के शीर्षक के रूप में दिखती हैं. हालांकि, बहुत सी फ़िल्मों के नाम सुनकर ही हंसी आ जाती है और इसे कॉमेडी जोनर की फ़िल्में मान ली जाती हैं. लेकिन बदलते समय के साथ फ़िल्मों के नाम के साथ इतने प्रयोग होने लगे कि ये गालियों के नाम के साथ ही डबल मीनिंग बातों पर भी रखे जाने लगे, जिसका हालिया उदाहरण है हरामी. इमरान हाशमी की अगली फ़िल्म का नाम है हरामी. इससे पहले आपने हरामखोर फ़िल्म का नाम भी सुना होगा. दरअसल, ये दोनों ही फ़िल्में गालियों के नाम पर रखी गई हैं. सभ्य समाज में हरामी और हरामखोर को गाली माना जाता है और लोग इन शब्दों को अपनी जुबां पर लाने से पहले कई बार सोचते हैं. लेकिन अब जमाना ऐसा आ गया है कि फ़िल्मों के नाम भी गालियों पर रखे जाने लगे हैं. बीते दिन हरामी के साथ ही एक और फ़िल्म की घोषणा हुई, जिसमें कियारा आडवाणी प्रमुख भूमिका में हैं. इस फ़िल्म का नाम है इंदू की जवानी. इससे आपको अंदाजा हो गया होगा कि सिनेमा इंडस्ट्री कितनी तेजी से बदल रही है और इसी तरह फ़िल्मों के नाम और स्वरूप भी काफी तेजी से बदल रहे हैं.

यहां सबसे पहले हालिया घटी एक घटना का जिक्र करना जरूरी लगता है, जिसमें एक विख्यात कुख्यात सांसद ने शब्दों की ऐसी कहानी बुनी कि पूरे देश में हंगामा मच गया. हुआ यूं कि शिवसेना सांसद संजय राउत ने गुस्से में कंगना रनौत को हरामखोर बोल दिया. कंगना लगातार शिवसेना सरकार और मुंबई पुलिस के खिलाफ बयानबाजी कर रही थीं. जब शिवसेना सांसद ने गुस्से में बातों की सीमा लांघ दी तो फिर राजनीतिक गलियारे से लेकर सोशल मीडिया तक संजय राउत की लोगों ने ऐसी तैसी कर दी. अंत में संजय राउत को अपने बचाव में बोलना पड़ा कि उनके हरामखोर शब्द का मतलब इंग्लिश का नॉटी शब्द था, जिसका मतलब शैतान होता है. शब्दों के इस खेल में आखिरकार कंगना की विजय हुई. लेकिन इससे ये पता चला कि हरामखोर जैसे शब्द अब आम बोलचाल में इस्तेमाल किए जाने लगे हैं और अब जब हरामी नाम की फ़िल्म आ रही है तो निकट भविष्य में ये भी देखने को मिल जाए कि लोग अक्सर गुस्से में किसी को हरामी जैसे शब्दों से पुकार लें. हालांकि, यह वैयक्तिक भावना होती है और सभ्य लोग इस तरह की भाषा के इस्तेमाल से बचते हैं.

सिनेमा इंडस्ट्री बदल रही है...

बीते 15 वर्षों के दौरान हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री रियलिस्टिक स्टोरी, यानी समाज और सामाजिक प्राणी की असल कहानी पर्दे पर उतारने पर फोकस करने लगी है. ऐसे में नए जमाने के निर्देशक जहां कहानी और संवाद के साथ ही गानों में भी गालियां या द्विअर्थी शब्दों के इस्तेमाल को समय की जरूरत बताने लगे हैं, वहीं अब तो फ़िल्म का नाम भी ऐसा-ऐसा रखने लगे हैं कि लोग ये नाम जुबां पर लाने या अपने परिजनों के सामने बोलने से पहले एक बार को सोचें कि बोले तो बोलें क्या. एक और बात जो फिलहाल सोसाइटी की सच्चाई बनती जा रही है, वो ये है कि लोग हर बातों में कैची हेडलाइन ढूंढने लगे हैं, जिसकी तरफ वो आकर्षित हों. जैसे आजकल डिजिटल मीडिया कंपनियां अपनी खबरों की हेडलाइन ऐसी रखती है कि आप उसे क्लिक किए बिना रह ही नहीं सकते. उसी प्रकार आजकल डायरेक्टर भी अपनी फ़िल्मों के नाम ऐसे-ऐसे रखने लगे हैं कि सुनकर ही दर्शकों में उत्सुकता जग जाए कि आखिरकार ये है क्या. हालांकि, डिजिटल प्लैटफॉर्म पर रिलीज होने वाली वेब सीरीज की बात करें तो वह नाम के साथ ही कंटेंट के स्तर पर भी अलग ही जा रही है, जिसमें अश्लीलता की भरमार है.

किरदारों के अनोखे नाम तो हैं ही

पिछले कुछ वर्षों के दौरान कुछ ऐसी फ़िल्मों का जिक्र करें, जिसके नाम को लेकर दर्शकों में काफी उत्सुकता जगी तो इसमें अमिताभ बच्चन की कई फ़िल्में हैं. अमिताभ की चीनी कम, पा, बुड्ढा होगा तेरा बाप समेत कई ऐसी फ़िल्में हैं, जिनके नाम वाकई लीक से हटकर थे. हिंदी फ़िल्मों में किरदार के नाम भी ऐसे-ऐसे रखे जाते हैं, जिसे सुनकर लोग हंसते-हंसते पागल हो जाते हैं. इन किरदारों में कुछ हैं- सुरमा भोपाली, छोटा छतरी, चौधरी होशियारचंद शिकारपुरी बकुलवाला, चूचा, कर्नल चिकारा, सर्किट, प्रलयनाथ गुंडास्वामी, क्राइम मास्टर गोगो, झंडू लाल त्यागी, मिस्टर घुंघरू, हरिश्चंद्र रामचंद्र मीरचंदानी उर्फ हरामी, केसरिया विलायती, खोखा सिंह, वसूली भाई, सूनामी सिंह, लोटिया पठान, रणछोड़ दास छांछड़ समेत कई अन्य. इन नामों की तरह ही अब डायरेक्टर फ़िल्मों के नाम भी अजीब अजीब रखने लगे हैं. कुछ साल पहले एक बंगाली फ़िल्म रिलीज हुई थी, जिसका नाम था- गांडु. यह फ़िल्म काफी विवादों में रही थी. उसके बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने हरामखोर नामक फ़िल्म बनाई, जिसके नाम पर भी लोगों को एतराज हुआ, क्योंकि यह भारतीय समाज में गाली के रूप में इस्तेमाल होता है.

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फ़िल्मों के ऐसे-ऐसे नाम कि सुनकर हंसी नहीं रुक पाती

उल्लेखनीय है कि फ़िल्मों के नाम अजीबोगरीब, डबल मीनिंग और अश्लील रखने का चलन नया नहीं, बल्कि काफी पुराना है. 1960 और 70 के दशक में भी कुछ फ़िल्मों के नाम ऐसे रखे थे कि लोगों को सोचकर हंसी आ जाती थी. धर्मेंद्र और महमूद की एक बहुत फेमस फ़िल्म का नाम था- धोती, लोटा और चौपाटी. इसके बाद आने वाले वर्षों में बढ़ती का नाम दाढ़ी, जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली, सस्ती दुल्हन महंगा दुल्हा, अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान, बंदूक दहेज के सीने पर, अंधेरी रात में दिया देरे हाथ में, राजा रानी को चाहिए पसीना, तू बाल ब्रह्माचारी, मैं हूं कन्या कुमारी, सलीम लंगड़े पर मत रो, घर में राम गली में श्याम, अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, दो लड़के दोनों कड़के, सोने का दिल लोहे का हाथ, मर्द की जान खतरें में, शैतानों का हनीमून, घर में हो साली तो पूरा साल दिवाली, एक से मेरा क्या होगा, गुरु सुलेमान चेला पहलवान, अकेली मत जइयो, भटकती जवानी समेत कई ऐसी फ़िल्में हैं, जिनके नाम को लेकर चर्चा चलती रहती है.

फिल्म की कहानी से तो नहीं लगता कि 'हरामी' नाम रखने की मजबूरी थी

हालांकि, 80 के दशक की इन सभी फिल्मों के बारे में जान लीजिए कि यह तीसरे दर्जे की बेहद फूहड फिल्मेें होती थी. इनके आपत्तिजनक नामकरण का तर्क इतना ही होता था कि कैसे भी हो, एक भड़काऊ नाम और फिल्म के कामुक पोस्टर का चारा डालकर दर्शक को सिनेमा हॉल तक लाना. लेकिन, इन दिनों अच्छी भली फिल्मों के नाम भी बेहद हल्के में रख दिए जाते हैं. अब यदि इमरान हाशमी की फिल्म 'हरामी' की ही कहानी को लें तो उसमें इमोशंस की भरमार है. मुंबई की लोकल ट्रेन में जेब काटने वाला लड़का है. उसकी मुलाकात उस लड़की से होती है, जिसके पिता को इस लड़के ने लूटा है. और उस सदमे के कारण उन्होंने आत्महत्या कर ली है. फिल्म की ये कहानी घिसीपिटी नहीं लगती. यदि ऐसी कहानी है तो उसके फिल्मांकन की बहुत गुंजाइश निर्देशक के पास होगी. तो जब सबकुछ बेहतर किया जा सकता था, तो फिल्म का नाम क्यों नहीं?

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लेखक

ओम प्रकाश धीरज ओम प्रकाश धीरज @om.dheeraj.7

लेखक पत्रकार हैं, जिन्हें सिनेमा, टेक्नॉलजी और सामाजिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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