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Updated: 16 जून, 2015 08:21 PM
सुहानी सिंह
सुहानी सिंह
 
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हमारी अधूरी कहानी जैसी बोझिल फिल्म देखकर बुरा यह लगा कि किस तरह विद्या बालन के टैलेंट को व्यर्थ जाने दिया गया. वे एक ऐसी अभिनेत्री हैं जिन्होंने खराब फिल्मों (किस्मत कनेक्शन और हे बेबी) में काम करते हुए भी अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया है. विद्या अपने दौर की बाकी हिराइनों की तुलना में फिल्मों का चुनाव हमेशा सावधानी से करती हैं. जो प्रोजेक्ट उन्होंने चुने, हासिल किए या मिले, लेकिन आप उनमें भारतीय महिलाओं के विभिन्न शेड्स दिखाई देंगे. पिछले साल उनकी फिल्म बॉबी जासूस बॉक्स आफिस पर चल नहीं पाई, लेकिन उन्होंने इसमें एक 30 वर्षीय महिला का यादगार किरदार निभाया, जो शादी के लिए अपने परिवार के दबाव और कॅरिअर के बीच संघर्ष कर रही है. फिल्म हमारी अधूरी कहानी में वसुधा का किरदार सास बहू के धारावाहिकों या 80 के दशक की पुरानी फिल्मों के लिए तो ठीक है, मगर इस तरह का रोल विद्या के कॅरियर के लिए सही नहीं है.

महेश भट्ट द्वारा लिखी गई रोमांटिक ट्रेजेडी में वसुधा उसके फैसलों और जिंदगी के प्रति अप्रोच को लेकर परेशान करती नजर आएगी. एक पत्नी से उसे सिंगल पैरेंट बनना पड़ता है. तब जबकि उसका पति (राजकुमार राव) शादी के सालभर के भीतर ही उसे छोड़कर चला जाता है. वह पांच साल बच्चे को अपने दम पर पालती है. वसुधा होटल की लॉबी और कमरों में फ्लावर डेकोरेशन का काम करती है, और यहीं उसका ज्यादातर समय बीतता है. यही उसके जीवन की थोड़ी सी खूबसूरती है. इसी के साथ फिल्म में होटल टाइकून आरव (इमरान हाशमी) की एंट्री होती है. वह उसे दुबई ले जाता है. वहां पर दोनों के बीच प्रेम होता है. फिल्म यहां पूरी तरह इन दोनों के प्रेम पर फोकस होकर रह जाती है. इतना कि शुरुआत में एक पारंपरिक भारतीय नारी का किरदार निभाने वाली वसुधा को अब बेटे की याद तक नहीं आती. शगूफ्ता रफीक प्रभावी डायलॉग भी बालन और हाशमी के बीच कैमिस्ट्री नहीं बना पाते.

वसुधा के रोल में विद्या आज की ट्रेजेडी क्वीन बनी हैं, जिसका काम है कि वह अपना मंगल-सूत्र पकड़कर खुद को याद दिलाती रहे कि वे दूसरे व्यक्त‍ि से प्यार करने का पाप नहीं कर सकती. तो ऐसे में क्या जब वह उस पति को प्यार ही नहीं करती, जो उसे बे‍तहाशा मारता-पीटता हो. जो उसके हाथ पर जबर्दस्ती अपना नाम गुदवा देता है, ताकि उसे हमेशा याद रहे कि वह सिर्फ उसी की है? ये इसलिए है कि वसुधा एक 'संस्कारी नारी' है. वो सिर्फ राएगी, सुबकेगी, सहेगी लेकिन अपनी परेशानियों का जिक्र किसी से नहीं करेगी. (ये अलग बात है, जो फिल्म में दर्शकों को बालन से जोड़ती है.) वह आखि‍री समय तक दूसरे व्यक्ति‍ के प्यार को स्वीकार नहीं करती, जब तक कि दूसरी महिला, इस मामले में आरव की मां, उसे समझाती है कि वह परंपराओं को भूल जाए और दिल की सुने.

इन सब के बीच फिल्म के माध्यम से एक संदेश देने का प्रयास किया गया है कि शादीशुदा महिला कोई वस्तु नहीं है, उसके भी अपने अरमान हैं. स्क्रीन पर प्रमुख भूमिका निभाने वाली विद्या बालन की अदाकारी के अलावा कुछ गड़बडि़यां भी दिखाई देती हैं. जैसे एक सीन में वे रेगिस्तान में अकेली चली जा रही हैं. इसे टाला जा सकता था. ये आसानी से देखा जा सकता है कि विद्या इतनी कन्फ्यूज हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वे असल में क्या हैं- वसुधा, राधा, मीरा, सीता, बंजारन, मां, आरव की मां... ये नाम उनके किरदार को दिए गए हैं. यही उस हिराईन की परेशानी है, जो बेहद जल्दबाजी में और उदास है. जब ऐसा किरदार रचा जाएगा तो उसे विद्या जैसी अदाकारा भी फिल्म को नहीं बचा पाएगी. इस फिल्म की तमाम नाउम्मीदियों के अलावा भी काफी कुछ है. विद्या हर तीसरे सीन में आंसुओं के साथ दिखाई देंगी. क्या कोई कहानी विद्या को यही दे सकती है?

फिल्म की विफलता का दोष अकेले विद्या बालन पर नहीं मढ़ा जा सकता. वे 37 साल की हैं. उनके रोल को क्वालिटी न देना बॉलीवुड की कमजोरी है, जो 35 की उम्र वाली हिरोइनों के लिए शादीशुदा महिला का बढि़या किरदार नहीं रच पातीं. बालन के पास चुनने को ज्यादा नहीं है, जैसा कि दीपिका पादुकोण या कंगना रनोत के पास है. जो अपने कॅरियर के चरम पर हैं. हां, करीना कपूर को अब देखा जा सकता है कि अच्छे रोल के लिए संघर्ष करते हुए. और वो अभी 34 साल की ही हैं. ये सिर्फ बॉलीवुड की ही प्रॉब्लम नहीं है. 30 की उम्र पार चुकी अदाकाराओं के लिए खतरे की घंटी यूएस में भी बज चुकी है. लेकिन हॉलीवुड में यहां की तुलना में अपवाद ज्यादा हैं. मेलिसा मैकार्थी को देखिए, जिन्होंने ब्लॉकबस्टर फिल्म स्पाई में प्रमुख निभाई है. या 65 की मेरिल स्ट्रीप, जिन्होंने फिल्म रिकी एंड द फ्लैश में रॉक म्यूजिशियन के रोल में कमाल कर दिया है. हमारी अधूरी कहानी के लेखक, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए एक ही संदेश हैं- महिलाओं के लिए अच्छी स्टोरी लेकर आएं. खासतौर पर ऐसी फिल्म जिसमें यदि उदासी दिखाई जा रही हो, तो दर्शक हंसे न.

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लेखक

सुहानी सिंह सुहानी सिंह

लेखिका मुम्बई में इंडिया टुडे की एसोसिएट एडिटर है.

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