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Updated: 28 जनवरी, 2022 01:12 AM
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साल 2018 में आईपीसी की धारा 377 के रद्द होने से पहले समाज में समलैंगिकता एक वर्जित विषय माना जाता रहा. इस विषय पर सिनेमा देखना तो छोड़िए, लोग बात तक करना पसंद नहीं करते थे. लेकिन बॉलीवुड सामाजिक सरोकारों के लिए समय के साथ हमेशा मुखर रहा है. जब लोग समलैंगिकता पर बात करने से परहेज करते थे, उस वक्त भी कई फिल्मों में समलैंगिक संबंधों पर आधारित कहानियां दिखाई गई थीं. इन फिल्मों का विरोध भी हुआ, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री कभी पीछे नहीं हटी. समलैंगिकों के अधिकार की इस लड़ाई में हमेशा उनके साथ रही है. फिल्मों के जरिए लोगों को जागरूक करती रही है. इसका नतीजा होमोसेक्शुअल लिब मूवमेंट की जीत के रूप में देखा जा सकता है, सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए धारा 377 को रद्द कर दिया. इसके बाद से LGBTQ समुदाय सुकून की सांस ले रहा है.

पिछले साल सिनेमाघरों में रिलीज हुई आयुष्मान खुराना की फिल्म 'चंडीगढ़ करे आशिकी' के बाद इस साल 11 फरवरी को समलैंगिक संबंधों पर आधारित फिल्म 'बधाई दो' रिलीज होने जा रही है. हर्षवर्धन कुलकर्णी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में राजकुमार राव और भूमि पेडनेकर लीड रोल में हैं. इस फिल्म के जरिए पहली बार 'लैवेंडर मैरिज' को दर्शकों के सामने पेश किया गया है. अभी तक लेस्बियन और गे रिलेशनशिप पर आधारित फिल्में बनती रही हैं. लेकिन लैवेंडर मैरिज का कॉन्सेप्ट इनसे थोड़ा सा अलग है. इसके तहत एक समलैंगिंक आदमी और औरत के बीच शादी होती है, जो समलैंगिक होने के बावजूद सिर्फ इसलिए शादी करते हैं, ताकि समाज के सामने उनकी सच्चाई न आ सके और परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगाए बगैर वो अपना जीवन जी सकें. इसमें दोनों को एक-दूसरे की हकीकत पता होती है.

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आइए ऐसी ही बॉलीवुड फिल्मों पर एक नजर डालते हैं, जिनमें समलैंगिक संबंधों की सच्चाई बयां की गई है...

1. फिल्म चंडीगढ़ करे आशिकी: बोल्ड विषय पर एक संवेदनशील बहस

कलाकार- आयुष्मान खुराना, वाणी कपूर, गौरव शर्मा, गौतम शर्मा, कंवलजीत सिंह, अंजन श्रीवास्तव और अभिषेक बजाज

निर्देशक- अभिषेक कपूर

भूषण कुमार, प्रज्ञा कपूर और अभिषेक नैयर की प्रोडक्शन कंपनी के बैनर तले बनी फिल्म 'चंडीगढ़ करे आशिकी' 'सेक्स चेंज' जैसे संवेदनशील मुद्दे पर आधारित थी. इसमें आयुष्मान खुराना और वाणी कपूर लीड रोल में थे. फिल्म एक बोल्ड और वर्जित विषय को बहुत ही संवेदनशील तरीके से पेश करती है, जिसमें भावनाओं का भरपूर मिश्रण है. अभिषेक कपूर, सुप्रतीक सेन और तुषार परांजपे की लिखी कहानी प्रगतिशील, ताज़ा और समय की आवश्यकता है, क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण संदेश देती है. अमूमन हिंदी फिल्मों में हमने देखा है कि एक लड़का और लड़की मिलते हैं. दोनों के बीच रोमांस होता है. अचानक दोनों कुछ वजहों से दूर हो जाते हैं. फिर अंत में दोनों का मिलन हो जाता है. लेकिन इस फिल्म में रोमांस के बाद बड़ा सवाल खड़ा होता है. क्योंकि नायक को पता चलता है कि नायिक एक ट्रांस गर्ल है. वो सेक्स चेंज कराकर लड़के से लड़की बनी है. ऐसे में नायक के तो पैरों तले जमीन ही खिसक जाती है. लेकिन आगे जो कुछ होता है, वही सच्चा प्यार है.

2. शुभ मंगल ज्यादा सावधान: समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं है

कलाकार: आयुष्मान खुराना, जितेंद्र कुमार, गजराज राव, नीना गुप्ता, मनु ऋषि चड्ढा, सुनीता, मानवी और पंखुड़ी

निर्देशक: हितेश केवल्या

आनंद एल राय, भूषण कुमार और हिमांशु शर्मा की प्रोडक्शन कंपनी के बैनर तले बनी रोमांटिक कॉमेडी फिल्म 'शुभ मंगल ज्यादा सावधान' साल 2020 में रिलीज हुई थी. हितेश केवल्य के निर्देशन में बनी इस फिल्म में में सेक्सुअलिटी जैसे गंभीर विषय को कॉमिक अंदाज में दिखाया गया है. इसमें आयुष्मान खुराना, जितेंद्र कुमार, गजराज राव और नीना गुप्ता अहम किरदारों में हैं. दो लड़कों के आपसी प्यार और उनके परिवार के बीच उठे जद्दोजहद और पीड़ा पर बनी इस फिल्म की कथा-व्यथा को बखूबी वही समझ सकता है, जो इस रास्ते से गुजर रहा हो या कम से कम किसी को गुजरते हुए देखा हो. इस दो लड़के समलैंगिक हैं. एक-दूसरे के रिलेशनशिप में हैं. लेकिन परिजनों को उनका सच पता चलने के बाद उन्हें परिवार दोस्तों की घृणा और ब्लैकमेलिंग का सामना करना पड़ता है. उन्हें अलग-अलग शादी को लिए मजबूर किया जाता है. लेकिन अंतत: उनके प्यार की जीत और परिवार की हार होती है. फिल्म उस टैबू पर प्रहार करती है जिसमें समलैंगिक रिश्तों को बीमारी के रूप में देखा जाता है.

3. गर्लफ्रेंड: लेस्बियन रिलेशन पर बनी कंट्रोवर्सियल फिल्म

कलाकार- ईशा कोप्पिकर, अमृता अरोड़ा, आशीष चौधरी

निर्देशक- करण राजदान

आज से 18 साल पहले समलैंगिक संबंधों पर बात करना किसी गुनाह से कम नहीं था. उस वक्त विदेशों में समलैंगिक संबंधों को लेकर कई संगठन आंदोलन कर रहे थे. हिंदुस्तान में तो इस विषय पर सोचना मतलब समाज के साथ द्रोह करने जैसा था. उस वक्त यानी साल 2004 में करण राजदान ने लेस्बियन रिलेशनशिप जैसे संवेदनशील मुद्दे पर फिल्म बनाया था. इस फिल्म में ईशा कोप्पिकर, अमृता अरोड़ा और आशीष चौधरी लीड रोल में थे. ईशा कोप्पिकर और अमृता अरोड़ा ने लेस्बियन कपल का रोल किया था. इस फिल्म में दो लड़कियों को बेस्टफ्रेंड के तौर पर दिखाया जाता है, लेकिन इनमें से एक लड़के के साथ प्यार में पड़ जाती है तो दूसरी को उससे जलन होने लगती है. इसके बाद उनको पता चलता है कि वो आपस में प्यार करती हैं. दोनों के बीच कई बोल्ड सीन दिखाए गए थे. इसके बाद फिल्म को लेकर काफी बवाल हुआ था. यहां तक कि फिल्म में काम करने वाली एक्ट्रेस ईशा कोप्पिकर और अमृता अरोड़ा को भी लोगों ने बायकाट करना शुरू कर दिया था.

4. अलीगढ़: व्यक्तिगत निजता की वकालत करती फिल्म

कलाकार- मनोज वाजपेयी, राजकुमार राव और आशीष विद्यार्थी

निर्देशक- हंसल मेहता

हमें किसी के एकांत में झांकने की क्या इजाजत होनी चाहिए? निर्देशक हंसल मेहता की फिल्म 'अलीगढ़' में यही सवाल मुख्य रूप से उठाया गया है. इस दौर में हर हाथ में कैमरे हैं, जिसकी वजह से निजता का हनन हर बार होता है. यहां तक यदि कोई कुछ छुपाने की कोशिश भी करे, तो लोग उसे संदिग्ध नजरों से देखना शुरू कर देते हैं. यह फिल्म व्यक्तिगत निजता की वकालत करती है, जो कि एक सच्ची घटना पर आधारित है. फिल्म को साल 2016 में रिलीज किया गया था, जिसमें मनोज वाजपेयी और राजकुमार राव लीड रोल में हैं. फिल्म की कहानी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक गे प्रोफेसर के इर्द-गिर्द घूमती है. उनका एक लड़के के साथ यौन संबंध बनाने का वीडियो वायरल हो जाता है.फिल्म में बताया गया है कि कैसे रूढ़ीवादी लोगों के जीवन पर नकारात्मक असर डालते हैं, जिससे वो अपनी जान तक देते हैं.

5. फायर: समलैंगिक संबंधों पर प्रकाश डालती पहली फिल्म

कलाकार- शबाना आजमी और नंदिता दास

निर्देशक- दीपा मेहता

साल 1996 में रिलीज हुई 'फायर' में पहली बार समलैंगिक संबंधों को किसी बॉलीवुड फिल्म में दिखाया गया था. इस फिल्म का निर्देशन दीपा मेहता ने किया है, जिसमें लेस्बियन रिलेशनशिप पर आधारित कहानी दिखाई गई है. इसमें लेस्बियन कपल का किरदार शबाना आजमी और नंदिता दास ने निभाया है. फिल्म में दिखाया जाता है कि सीता और राधा नाम की देवरानी-जेठानी एक संयुक्त परिवार का हिस्सा हैं. हालात ऐसे बनते हैं कि दोनों का एक-दूसरे के साथ भावुक और शारीरिक संबंध बन जाते हैं. अपने दौर के हिसाब से फिल्म का सब्जेक्ट बहुत बोल्ड था. वैसे यह मुख्यधारा की फिल्म भी नहीं थी. उस वक्त ज्यादातर बोल्ड या संवेदनशील विषय समानांतर सिनेमा का हिस्सा हुआ करता था. फिल्म का हिंदूवादी संगठनों ने जबरदस्त विरोध करते हुए आरोप लगाया कि भारतीय संस्कृति और धर्म को निशाना बनाया जा रहा है.

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