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Updated: 25 मई, 2020 12:05 PM
अनु रॉय
अनु रॉय
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नहीं, क्या सोच कर शाहरुख़ ख़ान (Shahrukh Khan) ने बेताल (Betaal) जैसी घटिया वेब सीरिज़ को प्रोड्यूस करने का निर्णय किया होगा. उन्होंने क्या सोचा होगा कि भारतीय दर्शक अपना दिमाग़ गिरवी रख कर उनके प्रोडक्शन की महान कृति देखेंगे. 45 मिनट्स के चार एपिसोड... इस सीरिज़ में न तो कहानी है, न स्क्रिप्ट है, न डायलॉग है और न ही एक्टिंग है. शुरू से शुरू करती हूं. देखिए नक्सल, आर्म फ़ोर्स, भ्रष्ट राजनीति और ज़ॉम्बी को एक साथ ले कर एक सुपर फ़्लॉप कहानी बुनी गयी है. कहानी क्या कॉपी-पेस्ट कह लीजिए हॉलीवुड की ज़ॉम्बी वाली फ़िल्मों और शताब्दी की सबसे बढ़िया सीरिज़ गेम ऑफ़ थ्रॉन्स के किरदारों की भौंडी कॉपी. सिरीज़ की शुरुआत एक ऐसी सुरंग से होती है जो सदियों से बंद पड़ी है. कोई एक भ्रष्ट बिल्डर अपने मतलब के लिए उस सुरंग को खुलवाना चाहता है. वहां रास्ता बना कर शहर बसाना चाहता है. जिसके लिए गांव के लोग विरोध करते हैं.

Betaal Review, Netflix, Shahrukh Khan, Web Series शाहरुख खान की बेताल के जरिये दर्शक केवल बोर हुए हैं

अब वो ऐसे में बाज़ स्क्वॉड की मदद मांगता है. बाज़ स्क्वॉड यानी सीआरपीएफ़ की नक़ल वाली एक फ़ोर्स है जो आती है गांव वालों के आंदोलन को कुचलने के लिए. गांव वाले मना करते हैं कि इस सुरंग को मत खोलो. इस पहाड़ी पर बेताल का साया है. अगर ये खुल गया तो देश तबाह हो जाएगा. उसके बाद बाज़ फ़ोर्स के जवान क्या करते हैं ये जानने के लिए आप इस सीरिज़ को देख सकते हैं लेकिन वो एंटाइअर्ली आपका फ़ैसला होगा.

ये तो थी बेसिक कहानी. अब आते हैं ऐक्टिंग पर. सबसे पहले बता दूं कि बेताल में किसी ने ऐक्टिंग की ही नहीं है. सब किरदार अनमने से इधर-उधर गोलियां चलाते और जैसा की ट्रेंड चल चुका है वेब सीरिज़ में बेवजह गालियां देने का तो वही रस्म अदायगी करते दिख रहें हैं. विनीत कुमार यानी विक्रम, बेताल के मेन प्रटैगनिस्ट हैं.

इससे पहले मैंने उनकी फ़िल्म मुक्केबाज़ देखी थी. क्या शानदार काम किया था उसमें. इस सीरिज़ को करना उनके करियर की सबसे बड़ी भूल है. उनके हिस्से एक भी ढंग का न तो सीन आया है और न डायलॉग. उदाहरण के तौर पर उनका एक डायलॉग देखिए. 'क्या आपने भी वही देखा जो मैंने देखा?'

अब आप इसी से अंदाज़ा लगाइए कि जब सबसे अहम् किरदार के हिस्से ऐसी बकवास लाइन आयी होगी तो बाक़ी के किरदारों के लिए भला क्या ही लिखा गया होगा. इसके साथ ही साथ स्क्रीनप्ले, एडिटिंग, म्यूज़िक और हॉरर सीरिज़ है तो किरदारों का मेक और लाइटिंग सब इस हद तक बुरा है कि आप स्क्रीन से कई-कई मिनट्स के लिए नज़रें हटा कर रख सकते हैं. सब कुछ इतना प्रेडिकटेबल है जैसे स्टार प्लस के सास बहू वाले घटिया शो.

मैं अभी ये रिव्यू लिखते वक्त दिमाग़ पर ज़ोर डाल कर इस सीरिज़ की एक सिर्फ़ एक अच्छी बात याद करने की कोशिश कर रहीं हूं मगर मुझे कुछ भी अच्छा याद नहीं आ रहा. सॉरी.

हां, इस याद करने के चक्कर में बेताल के विलेन यानि उस अंग्रेज कर्नल का लूक याद आ गया जो डिट्टो कॉपी है गेम ऑफ़ थ्रोंस के व्हाइट वॉकर्स (white walkers) का. क्यों करना ये कॉपी. अगर आपके पास इमैजिनेशन नहीं है तो मत बनाइए कोई सीरिज़. आप ऐसे दर्शकों को सिर दर्द नहीं दे सकते.

एक तो लॉकडाउन की वजह से इंसान ख़ुद ही डिप्रेसड है. ईद अलग ही मीठी नहीं लग रही उसके ऊपर से बेताल जैसी बकवास सीरिज़ प्रोड्यूस कर के रेड चिल्ली प्रोडक्शन और डायरेक्टरस निखिल महाजन और पैट्रिक ग्राहम ने जो ज़ुल्म किया है न उसे पब्लिक हमेशा याद रखेगी और इसके लिए कभी भी माफ़ नहीं करेगी.

आख़िर में सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूंगी कि अगर कोरोना से आप सुरक्षित बच भी गए तो बेताल देखने के बाद आप ज़ॉम्बी ज़रूर बन जाएंगे. बाक़ी मर्ज़ी आपकी है.

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लेखक

अनु रॉय अनु रॉय @anu.roy.31

लेखक स्वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं, और महिला-बाल अधिकारों के लिए काम करती हैं.

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