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खुले में स्तनपान को गलत कहने वाले अपने दिमाग का इलाज करा लें

    • पूनम मुत्तरेजा
    • Updated: 25 जून, 2018 03:39 PM
  • 25 जून, 2018 03:39 PM
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जो लोग सार्वजनिक रूप से स्तनपान कराने का विरोध कर रहे हैं या फिर जो अपनी स्थिति के बारे में अस्पष्ट हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी होने के साथ साथ विशेषाधिकार भी है कि अकेले महिलाओं को ही अपने बच्चों को खिलाना है.

हाल ही में टीवी पर होने वाली बहसों में एक मुद्दा था सार्वजनिक तौर पर स्तनपान कराना. इन बहसों को देखकर मुझे घिन्न आने लगी. एक तथाकथित कार्यकर्ता ने इसे सेक्सुअल एक्ट कहा. मैं अचंभित थी. इससे किसी भी तरह का कोई मतलब नहीं निकलता.

1991 में मैं कैम्ब्रिज मैसाचुसेट्स में थी. वहां के विश्व प्रसिद्ध यौन और प्रजनन स्वास्थ्य कार्यकर्ता और एम्हेर्स्ट में हैम्पशायर कॉलेज में महिला अध्ययन की निदेशक प्रोफेसर बेट्सी हार्टमैन से पूछा कि, जब वो सबैटिकल लीव पर कोस्टा रीका जाएंगी तो मैं चाहूं तो “Development from A Grassroots Perspective” कोर्स पढ़ा सकती हूं. ये मेरा सौभाग्य था कि ये अवसर मुझे मिला.

मेरे पेट में तब मेरा दूसरा बच्चा पल रहा था. लेकिन प्रोफेसर का आइडिया बहुत ही रोमांचक था इसलिए मैंने बिना समय गंवाए जवाब दिया कि "बिल्कुल, मुझे कोर्स पढ़ाने में खुशी होगी. लेकिन आपको ये पता होना चाहिए कि मैं गर्भवती हूं." बेट्सी ने जवाब दिया: "प्रेग्नेंसी क्या एक स्वास्थ्य समस्या है?" मैंने कहा- "बेशक नहीं, और मैं कोर्स पढ़ाने के लिए तैयार हो गई."

मुझे एक हफ्ते में दो कक्षाओं को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. लेकिन क्योंकि कैम्ब्रिज से हैम्पशायर कॉलेज की दूरी लगभग दो घंटे की ड्राइव थी, इसलिए उन्होंने मुझे ये सुविधा दी कि मैं सप्ताह में एक ही दिन दोनों क्लासेस ले लूं. 15 मिनट के ब्रेक के बीच. वो इस बात पर भी सहमत हो गए थे कि मेरे बच्चे के जन्म के बाद मैं उसे कॉलेज लेकर भी आउंगी ताकि मैं स्तनपान करा सकूं. और साथ ही मेरा बच्चा मेरे साथ रह सके.

मुझे इसमें किसी तरह की दिक्कत नहीं थी. हमारा बेटा 13 नवंबर को पैदा हुआ और दो सप्ताह बाद मैं उसे पहली अपने कॉलेज लेकर गई.

स्तनपान को गलत मानने वाले नजर के साथ साथ नजरिया भी...

हाल ही में टीवी पर होने वाली बहसों में एक मुद्दा था सार्वजनिक तौर पर स्तनपान कराना. इन बहसों को देखकर मुझे घिन्न आने लगी. एक तथाकथित कार्यकर्ता ने इसे सेक्सुअल एक्ट कहा. मैं अचंभित थी. इससे किसी भी तरह का कोई मतलब नहीं निकलता.

1991 में मैं कैम्ब्रिज मैसाचुसेट्स में थी. वहां के विश्व प्रसिद्ध यौन और प्रजनन स्वास्थ्य कार्यकर्ता और एम्हेर्स्ट में हैम्पशायर कॉलेज में महिला अध्ययन की निदेशक प्रोफेसर बेट्सी हार्टमैन से पूछा कि, जब वो सबैटिकल लीव पर कोस्टा रीका जाएंगी तो मैं चाहूं तो “Development from A Grassroots Perspective” कोर्स पढ़ा सकती हूं. ये मेरा सौभाग्य था कि ये अवसर मुझे मिला.

मेरे पेट में तब मेरा दूसरा बच्चा पल रहा था. लेकिन प्रोफेसर का आइडिया बहुत ही रोमांचक था इसलिए मैंने बिना समय गंवाए जवाब दिया कि "बिल्कुल, मुझे कोर्स पढ़ाने में खुशी होगी. लेकिन आपको ये पता होना चाहिए कि मैं गर्भवती हूं." बेट्सी ने जवाब दिया: "प्रेग्नेंसी क्या एक स्वास्थ्य समस्या है?" मैंने कहा- "बेशक नहीं, और मैं कोर्स पढ़ाने के लिए तैयार हो गई."

मुझे एक हफ्ते में दो कक्षाओं को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. लेकिन क्योंकि कैम्ब्रिज से हैम्पशायर कॉलेज की दूरी लगभग दो घंटे की ड्राइव थी, इसलिए उन्होंने मुझे ये सुविधा दी कि मैं सप्ताह में एक ही दिन दोनों क्लासेस ले लूं. 15 मिनट के ब्रेक के बीच. वो इस बात पर भी सहमत हो गए थे कि मेरे बच्चे के जन्म के बाद मैं उसे कॉलेज लेकर भी आउंगी ताकि मैं स्तनपान करा सकूं. और साथ ही मेरा बच्चा मेरे साथ रह सके.

मुझे इसमें किसी तरह की दिक्कत नहीं थी. हमारा बेटा 13 नवंबर को पैदा हुआ और दो सप्ताह बाद मैं उसे पहली अपने कॉलेज लेकर गई.

स्तनपान को गलत मानने वाले नजर के साथ साथ नजरिया भी बदलें

जब जरूरत पड़ती, मैं ब्रेक ले लेती और क्लास में ही अपने बच्चे को स्तनपान करती. इस बीच सारे छात्र मुझसे बात करते रहते. और ये अगले सेमेस्टर तक चलता रहा. जहां तक मेरे शिक्षण की दिनचर्या का सवाल था, कुछ भी नहीं बदला. लेकिन मैंने अपने बेटे के जन्म के बाद छात्रों द्वारा जमा किए जाने वाले साप्ताहिक असाइनमेंट की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा.

मैंने सोचा कि आखिर ऐसा क्यों है? मैंने सोचा कि शायद मेरी कक्षा से छात्रों को प्रेरणा मिली हो. उन्होंने महसूस किया होगा कि मैं सिर्फ एक शिक्षक नहीं बल्कि मां भी हूं और जिसकी अपनी प्राथमिकता है. इसके अलावा मुझे कोई अन्य कारण नहीं दिख रहा था कि आखिर उनके ग्रेड में सुधार क्यों होगा!

जाहिर है, मुझे वो आराम था जो भारत की लाखों महिला मजदूरों और अन्य महिलाओं को नसीब नहीं है. ऐसी महिलाओं को अक्सर अपने बच्चों को धूल धूसरित जगहों पर और खुले में सभी के सामने बच्चे को स्तनपान कराने पर मजबूर किया जाता है. भले ही सभी निर्माण स्थलों के लिए स्तनपान कराने के लिए एक क्रेच की सुविधा प्रदान करना अनिवार्य है.

जो लोग सार्वजनिक रूप से स्तनपान कराने का विरोध कर रहे हैं या फिर जो अपनी स्थिति के बारे में अस्पष्ट हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी होने के साथ साथ विशेषाधिकार भी है कि अकेले महिलाओं को ही अपने बच्चों को खिलाना है. समाज को मां और बच्चे के सर्वोत्तम हितों में सुरक्षित स्तनपान कराने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए. एक बच्चे को स्तनपान करना एक अश्लील कार्य या विकलांगता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. अगर इस तरह के पुरातन सोच को बदल दें तभी भारत वास्तव में एक आधुनिक राष्ट्र बन सकता है.

(DailyO से साभार)

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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