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पिता की डांट में ही जीवन है और उसका सार भी

    • बिलाल एम जाफ़री
    • Updated: 19 जून, 2017 11:51 AM
  • 19 जून, 2017 11:51 AM
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एक पिता ही पुत्र की पहचान होता है. कई बार देखा गया है कि वो पुत्र को कुछ समझाने का प्रयास करता है मगर पुत्र उसे समझना नहीं चाहता. जैसे-जैसे पुत्र की उम्र बढ़ती है उसे महसूस होता है कि उस समय पिता ने जो कहा था वो उसके ही भले के लिए कहा था.

सिनेमा बेवकूफ बनाता है ये जानते हुए भी आपने गैंग्स ऑफ वासेपुर जरूर देखी होगी. फिल्म में आपने रामाधीर सिंह को देखा होगा. पूरी फिल्म में ये दिखाया गया है कि रामाधीर सिंह एक दबंग नेता थे और अंत तक उन्होंने हार नहीं मानी मगर वो बेचारे अपने बेटे से बड़ा परेशान थे. रामाधीर चाहते थे कि उनका बेटा क्षेत्र में निकले और लोगों को मोटिवेट करे और बेटा ठहरा नालायक! उसने वही किया जो उसे सही लगा. बाप का सपना बस सपना रह गया.

अब इस बात को अपनी जिंदगी के इर्द गर्द रख के सोचिये. जब आप अपनी सोच के सागर में डीप बहुत डीप गोते लगा रहे होंगे तो मिलेगा कि ये परेशानी हम सब की है लेकिन हमारी सोच के स्वरुप अलग हैं. फिल्म में रामाधीर चाहते थे कि उनका बेटा एक कुशल नेता बने असल जिंदगी में हमारे पिता चाहते हैं कि हमारा बेटा खूब पैसा कमाए, हमारा नाम रौशन करे और एक आदर्श इंसान बने, एक ऐसा इंसान जो समाज में मिसाल कायम कर सके.

आज फादर्स डे था, बात सुबह की है मैंने अपना फेसबुक खोला तो मेरी वॉल पर फेसबुक की तरफ से एक मैसेज आया. फेसबुक मुझे फादर्स डे की मुबारकबाद देते हुए आपने पिता को फादर्स डे विश करने और उनके लिए कुछ स्पेशल गिफ्ट्स खरीदने को कह रहा था. इस मैसेज की सबसे दिलचस्प बात ये थी की इसके नीचे कुछ जानी मानी ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स के लिंक थे. कह सकते हैं कि सोशल मीडिया और सेल्फी वाले इस दौर में सब कुछ बिक रहा है. ये इसलिए भी बिक रहा है क्योंकि ये दिख रहा है या ये भी हो सकता है कि इसे दिखाया जा रहा हो. शायद मुझे भी दिखाया गया हो.

एक पिता चाहता है किउसका पुत्र ऐसा इंसान जो समाज में मिसाल कायम कर सके

बहरहाल, अच्छा लगा देखकर कि वलेंटाइन डे, अर्थ डे, प्लांट डे, वाटर डे, मदर डे, चिल्ड्रेन डे, ये डे, वो डे, के बाद अब धीरे-धीरे ही सही फादर डे भी हमारे समाज का...

सिनेमा बेवकूफ बनाता है ये जानते हुए भी आपने गैंग्स ऑफ वासेपुर जरूर देखी होगी. फिल्म में आपने रामाधीर सिंह को देखा होगा. पूरी फिल्म में ये दिखाया गया है कि रामाधीर सिंह एक दबंग नेता थे और अंत तक उन्होंने हार नहीं मानी मगर वो बेचारे अपने बेटे से बड़ा परेशान थे. रामाधीर चाहते थे कि उनका बेटा क्षेत्र में निकले और लोगों को मोटिवेट करे और बेटा ठहरा नालायक! उसने वही किया जो उसे सही लगा. बाप का सपना बस सपना रह गया.

अब इस बात को अपनी जिंदगी के इर्द गर्द रख के सोचिये. जब आप अपनी सोच के सागर में डीप बहुत डीप गोते लगा रहे होंगे तो मिलेगा कि ये परेशानी हम सब की है लेकिन हमारी सोच के स्वरुप अलग हैं. फिल्म में रामाधीर चाहते थे कि उनका बेटा एक कुशल नेता बने असल जिंदगी में हमारे पिता चाहते हैं कि हमारा बेटा खूब पैसा कमाए, हमारा नाम रौशन करे और एक आदर्श इंसान बने, एक ऐसा इंसान जो समाज में मिसाल कायम कर सके.

आज फादर्स डे था, बात सुबह की है मैंने अपना फेसबुक खोला तो मेरी वॉल पर फेसबुक की तरफ से एक मैसेज आया. फेसबुक मुझे फादर्स डे की मुबारकबाद देते हुए आपने पिता को फादर्स डे विश करने और उनके लिए कुछ स्पेशल गिफ्ट्स खरीदने को कह रहा था. इस मैसेज की सबसे दिलचस्प बात ये थी की इसके नीचे कुछ जानी मानी ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स के लिंक थे. कह सकते हैं कि सोशल मीडिया और सेल्फी वाले इस दौर में सब कुछ बिक रहा है. ये इसलिए भी बिक रहा है क्योंकि ये दिख रहा है या ये भी हो सकता है कि इसे दिखाया जा रहा हो. शायद मुझे भी दिखाया गया हो.

एक पिता चाहता है किउसका पुत्र ऐसा इंसान जो समाज में मिसाल कायम कर सके

बहरहाल, अच्छा लगा देखकर कि वलेंटाइन डे, अर्थ डे, प्लांट डे, वाटर डे, मदर डे, चिल्ड्रेन डे, ये डे, वो डे, के बाद अब धीरे-धीरे ही सही फादर डे भी हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा बन गया है. हां उन्हीं फादर्स का डे जिन्होंने हमसे वो उम्मीदें रखी जिन्हें वो खुद पूरा नहीं कर पाए. वही फादर जिन्होंने खुद फटी बनियान पहन के हमारे अरमानों की खिड़की में रौशनी का संचार किया. वही फादर जिन्होंने सही रास्ता दिखाने के लिए हमारी गलतियों पर हमें मारा, डांटा और कुछ सकारात्मक करने के लिए प्रेरित किया.

हमारे समाज में, माँ की अपेक्षा पिता हमेशा डर और डराने का पर्याय रहे हैं याद करिए वो समय जब आपसे कहा गया हो 'आने दो पापा को, अब वही तुम्हारी खबर लेंगे' या फिर 'तुम कहां थे अब तक अब इसका हिसाब पापा को ही देना' पापा बेचारे अभी ऑफिस से आकर सुस्ता भी न पाए थे कि मां ने शिकायतों का पुलिंदा उनको पकड़ा दिया और उन्होंने क्लास लेना शुरू कर दिया. इस बिंदु पर गौर करें तो मिलता है कि यही वो बात है जिसके चलते एक पुत्र अपने पिता से घबराया घूमता है.

पेरेंट टीचर मीटिंग से लेकर कई अन्य जगहों तक आते-आते ये डर हमारे और हमारे पिताओं के बीच एक पुल का रूप ले लेता है, जिसको पार करने की हिम्मत शायद ही एक पुत्र कभी करता हो. कहा जा सकता है कि परेशानियों के वक्त एक पुत्र अपने पिता से बात करना ही नहीं चाहता. उसे लगता है कि 'क्या यार! अभी इनसे बात करेंगे तो फिर बेवजह का लेक्चर मिलेगा और डांट पड़ेगी. छोड़ो जाने दो'.

पिता के सन्दर्भ में, हमारे दैनिक जीवन में समस्या 'छोड़ो जाने दो' नहीं है बल्कि बात न करना है. हम अपनी समस्यों को मां से शेयर कर लेंगे, गर्ल फ्रेंड से शेयर कर लेंगे, बीवी से शेयर कर लेंगे, पड़ोसी से शेयर कर लेंगे, रिश्तेदारों से शेयर कर लेंगे अपने पिता के सिवा सबसे शेयर कर लेंगे. आपके पिता चाहते हैं कि आप रुक के दो मिनट उनसे बात करें. अपनी परेशानियों को उनसे शेयर करें, कुछ उनसे कहें कुछ उनकी सुनें. आप बात करिए बात करके देखिये ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? आपको डांट पड़ेगी न, तो क्या परेशानी है सुन लीजिये डांट पिता हैं वो आपके.

हर पिता की इच्छा होती है उसका पुत्र उसके संग बैठे और बात करे

यकीन मानिए यदि आपने अपनी परेशानियों को पिता से साझा किया और उन्होंने आपको डांटा तो ये कई मायनों में आपके लिए फायदेमंद है. आप पांच मिनट डांट खाके देखिये, उसके बाद आपको जो सलाह मिलेगी वो आपकी ज़िन्दगी की सबसे अच्छी सलाह होगी. जब आप इस सलाह को सुन रहे होंगे तो आपको मिलेगा कि अब तब आप जिस इंसान को कठोर और सख्त मान रहे थे वो तो अन्दर से बेहद मुलायम है और उसे आपकी जितनी फिक्र है उतनी शायद ही इस दुनिया में किसी को आपके लिए होगी.

यदि आपको लगता है कि आपके पिता आप पर अपने विचार थोप रहे हैं तो निस्संदेह आप गलत है. गलत इसलिए क्योंकि शायद आप उतने परिपक्व नहीं हो पाएं हैं कि उस भावना को समझ सकें. हो सकता है आप अपनी और अपने पीयर ग्रुप की नजरों में बड़े हो गए हों मगर अपने पिता के सामने आप वहीं हैं जिसने आपको अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया है. साथ ही वो ये भी जानता है कि जीवन के किन मार्गों में आपको दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है.

हो सकता है पढ़ने से लेकर उठने, बैठने, खाने, पीने, घूमने, फिरने तक आपके पिता की कई ऐसी बातें हों जिनको सुनकर आपको लगता हो कि 'क्या यार ये तो हर समय पीछे पड़े रहते हैं' मगर ये जो भी बातें हैं वो केवल और केवल आपके भले के लिए हैं जिनका असल उद्देश्य आपको एक ऐसा इंसान बनाना है जो एक बेहतर समाज के निर्माण में आपका योगदान दे सके.

अंत में हम बस इतना ही कहेंगे कि सोशल मीडिया वाले इस दौर में पिता जी को व्हाट्सऐप पर फादर्स मैसेज भेजने या फेसबुक पर जाकर उनकी वॉल पर बेस्ट डैड, आई लव यू डैड लिखने से बेहतर है कि आप उनके पास जाएं उनसे बात करें. आप कुछ उनकी सुनें कुछ उन्हें अपनी सुनाएं. विश्वास करिए आपके पिता को इससे जो सुख मिलेगा वो सुख न तो उन्हें गूगल इमेज से डाउनलोड की गयी फोटो ही दे पायगी न ही मिंत्रा या अमेज़न से उनके लिए खरीदी गयी शर्ट. 

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बाजार ने मान लिया है कि पापा को गिफ्ट नहीं देते लोग !

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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