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समाज

एक ऐसा दास्तानगो जिसकी खुद की दास्तान अधूरी रह गई

    • मनीष जैसल
    • Updated: 13 मई, 2018 07:24 PM
  • 13 मई, 2018 07:24 PM
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13वीं सदी की प्रसिद्ध कला दास्तानगोई को 21वीं सदी में लोकप्रिय बनाने में प्रयासरत अंकित अपनी दास्ताँ अधूरी छोड़ गए.

13वीं सदी में कहानी कहने की कला के रूप में प्रचलित हुई दास्तानगोई यूं तो फारस से आई, लेकिन भारत में भी इस कला से चाह रखने वाले सदियों से रहे हैं. समय के साथ किस्सों को कहने की इस कला का विकास होता गया और यह अभिव्यक्ति का प्रचुर माध्यम भी बना. उर्दू जुबां से रंगी दास्तानगोई को मध्य एशिया और ईरान में मनोरंजन का एक प्रमुख साधन भी माना जाता था. भारत में भी मुगल दरबारों और भारतीय राजाओं के साम्राज्य में यह कला खूब फली फूली. 16वीं सदी में इस कला का फारसी स्टाइल में विस्तार हुआ. वहीं 19वीं और 20वीं सदी तक आते-आते इसमें रोचक परिवर्तन भी महसूस किए गए. उन्हीं परिवर्तनों के प्रमुख सिपहलसारों में अम्बा प्रसाद रासा, मीर अहमद आली रामपुरी, मुहम्मद आमिर खान, सैयद हुसैन जाह और गुलाम रजा जैसे किस्सागो प्रमुख हैं.

मौजूदा सदी के मशहूर किस्सागो महमूद फ़ारुकी के शिष्य अंकित चड्ढा दास्तानगोई के लिए देश और दुनिया में जाने पहचाने जाते हैं. लंदन से लेकर सऊदी तक और भारत के मशहूर मंचों पर अपने किस्सों से दर्शकों को सराबोर कर देने वाले अंकित की असमय मृत्यु हमें दुख देती है. मात्र 30 वर्ष का नौजवान देश और समाज के प्रति इतना संवेदनशील होकर तार्किक प्रश्नों को उठाने के लिए, इतनी पुरानी कला को पुनर्जीवित और नई पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने की सार्थक पहल करेगा, ऐसा करने में लोग वर्षों लगा देते हैं. संभवत: किस्सागो की वर्तमान दुनिया में अंकित सबसे युवा रहें होंगे.

पुणे में 'दास्तां ढाई आखर' के लिए गए अंकित पुणे से 60 किलो मीटर दूर कामसेट के पास उकसान झील में पैर फिसलने से डूब गए. काफी घंटों की मशक्कत के बाद उनका शव निकाला गया तथा दिल्ली ले जाया गया. असामयिक दुर्घटना से देश और दुनिया में उनके चाहने वाले और उनका परिवार गमजदा है. गौरतलब है कि अंकित का कार्यक्रम 12 मई को था और यह घटना 9 मई को घटी. अभी तो...

13वीं सदी में कहानी कहने की कला के रूप में प्रचलित हुई दास्तानगोई यूं तो फारस से आई, लेकिन भारत में भी इस कला से चाह रखने वाले सदियों से रहे हैं. समय के साथ किस्सों को कहने की इस कला का विकास होता गया और यह अभिव्यक्ति का प्रचुर माध्यम भी बना. उर्दू जुबां से रंगी दास्तानगोई को मध्य एशिया और ईरान में मनोरंजन का एक प्रमुख साधन भी माना जाता था. भारत में भी मुगल दरबारों और भारतीय राजाओं के साम्राज्य में यह कला खूब फली फूली. 16वीं सदी में इस कला का फारसी स्टाइल में विस्तार हुआ. वहीं 19वीं और 20वीं सदी तक आते-आते इसमें रोचक परिवर्तन भी महसूस किए गए. उन्हीं परिवर्तनों के प्रमुख सिपहलसारों में अम्बा प्रसाद रासा, मीर अहमद आली रामपुरी, मुहम्मद आमिर खान, सैयद हुसैन जाह और गुलाम रजा जैसे किस्सागो प्रमुख हैं.

मौजूदा सदी के मशहूर किस्सागो महमूद फ़ारुकी के शिष्य अंकित चड्ढा दास्तानगोई के लिए देश और दुनिया में जाने पहचाने जाते हैं. लंदन से लेकर सऊदी तक और भारत के मशहूर मंचों पर अपने किस्सों से दर्शकों को सराबोर कर देने वाले अंकित की असमय मृत्यु हमें दुख देती है. मात्र 30 वर्ष का नौजवान देश और समाज के प्रति इतना संवेदनशील होकर तार्किक प्रश्नों को उठाने के लिए, इतनी पुरानी कला को पुनर्जीवित और नई पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने की सार्थक पहल करेगा, ऐसा करने में लोग वर्षों लगा देते हैं. संभवत: किस्सागो की वर्तमान दुनिया में अंकित सबसे युवा रहें होंगे.

पुणे में 'दास्तां ढाई आखर' के लिए गए अंकित पुणे से 60 किलो मीटर दूर कामसेट के पास उकसान झील में पैर फिसलने से डूब गए. काफी घंटों की मशक्कत के बाद उनका शव निकाला गया तथा दिल्ली ले जाया गया. असामयिक दुर्घटना से देश और दुनिया में उनके चाहने वाले और उनका परिवार गमजदा है. गौरतलब है कि अंकित का कार्यक्रम 12 मई को था और यह घटना 9 मई को घटी. अभी तो उन्हें न जाने और कितनी दास्ताने अपनी बुलंद आवाज़ से दर्शकों को सुनानी थी.

13वीं सदी की इस विधा से मेरे जैसे तमाम युवाओं के जुड़ाव और लोकप्रियता का स्रोत अंकित ही तो थे. जिन्होंने तमाम महफिलों में कबीर के दोहों मजाज़ के किस्सों के सहारे आम मुद्दों को जितनी बेबाकी से रखे जितना और किसी अभिव्यक्ति के माध्यम से कह पाना और उसे असर करा पाना मुश्किल होता है.

जश्ने रेख्ता हो या कबीर उत्सव जैसे आयोजन जहां भी अंकित बुलाये गए उन्होंने दर्शकों के बीच अपने किस्सों से वो समा बंधा जो वाकई हैरत में डालने वाला है. लंबे लंबे संवादों को याद कर उसे अभिव्यक्त करना वाकई दांतों तलें उंगलियां दबाने पर मजबूर करता है. जब भी यूट्यूब पर अंकित के किस्से सुने हर बार देश समाज या फिर प्रेम की मिशाले ही उनमें सुनाई दी. कबीर की दास्तानों से लेकर मोबाइल, कॉर्पोरेट जगत, उर्दू शायर मजाज़ के किस्सों से अंकित ने कई महफिलों को लूटा हैं. ताली पीटने को हर बार अपनी महफिलों में मना करने वाले अंकित सही जगह वाह सुनने की चाह रखते थे उन्हें पता था कि अगर गलत जगह वाह हुई तो आह उनके सीने में भी लग सकती है.

दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट अंकित कभी रंगमंच का हिस्सा भी हुआ करते थे, नौकरी भी की लेकिन फारसी और उर्दू जुबां सीख वे दास्तानगोई की तरफ आकर्षित हुए. इसके बाद उन्होने 2011 से लगातार नई पीढ़ी को इस कला से जोड़ने की जिद में कार्यरत ही दिखे.

अंकित जैसे दास्तानगो और उनके सामईन के बीच के परंपर संबंध की एक बानगी ही है कि वे खुद को लेखक के तौर पर भी पेश कर पाएं. 2016 में ही अंकित अमीर खुसरो; द मैन इन रिडल्स जैसी पुस्तक लिख चुके है. हावर्ड, येल और टोरंटो जैसे विश्वविद्यालयों में अपने सामईन को खुद के प्रयोगों में बाधने वाले अंकित अभी बहुत कुछ कर सकने को लालायित थे. यह तय मानिए वह असमय काल के गाल में न समाये होते तो दास्तां-ए-अंकित भी सुनहरी होती. 30 वर्षों की छोटी यात्रा में जिस तरह की चुस्ती और फुर्ती से इस नौजवान ने नई पीढ़ी में जोश भरने और सीखने की ललक पैदा की थी उसका शुक्रिया हमें अंकित को करना ही पड़ेगा. अंकित को अंतिम विदा कहते उनकी ही एक दास्तां को यहां सुन उन्हें श्रद्धांजली दे रहा हूं.

अंकित इस दास्तानगोई से भारत पाकिस्तान की उस दर्दनाक कहानी को मौजूदा समय में पेश कर रहे है जिसमें कई लाख परिवार आज भी गुमनाम है. उन्हें खोजने में अंकित ने Darain Shahidi का साथ दिया है. आइये सुनते है ...

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