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दादी को भी पसंद, बिल्ली को भी भाया और रिश्ता पक्का

    • मृगांक शेखर
    • Updated: 16 जून, 2015 06:49 PM
  • 16 जून, 2015 06:49 PM
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टच वुड. किसी की नजर न लगे. अय्यर परिवार में खुशी छप्पर फाड़ के आई है. अय्यर परिवार के बेटे के लिए दूल्हे की तलाश पूरी हो गई है.

टच वुड. किसी की नजर न लगे. अय्यर परिवार में खुशी छप्पर फाड़ के आई है. अय्यर परिवार के बेटे के लिए दूल्हे की तलाश पूरी हो गई है. विज्ञापन का शगुन शुभ रहा.

दूल्हा बड़ा शर्मिला है

बेटे के लिए दूल्हा. पुराने ख्यालात के लोगों को अटपटा लग सकता है. तो लगे. उनकी परवाह क्यों? परवाह तो लोगों को इंटरकास्ट शादियों पर भी है. दूसरी और भी न जाने कितनी अंतर-वाली-शादियों पर है.

अगर ऐसा न होता तो उस मां को बेटे के लिए दूल्हे का इश्तहार देने के लिए दर दर नहीं भटकना पड़ता. भला हो उस अखबार का जिसने साथ देने का साहस किया. एक परिवार की खुशी की खातिर.

एक मां के लिए बेटे की खुशी से बढ़कर आखिर कौन सी चीज हो सकती है? बेटे की खुशी को मां से बेहतर समझ भी कौन सकता है भला?

तभी तो जमाने की परवाह छोड़ उस मां ने ये बीड़ा उठाया. इश्तहार पर रिस्पॉन्स में न जाने कितनी गालियां और धमकियां आईं, उनका भी डट कर (नजरअंदाज करते हुए) मुकाबला किया. और आगे भी न जाने कितना करना पड़े?

अय्यर परिवार में दूल्हा बैठक दो घंटे तक चली. डिनर में डोसा सर्व किया गया. दादी की फरमाइश पर दूल्हे ने क्लारसिकल म्यूदजिक भी सुनाया. बेटा बहुत खुश था. ''मेरी मां, पिता, दादी और मेरी बिल्ली ने उसे पसंद किया.''

फिर मां खुश कैसे न होती. ''मैंने अय्यर को काफी भरोसेमंद पाया. वो बहुत धीमे बोलता है और सौम्य है. मुझे उम्मीद है कि वो हरीश का ख्याल रखेगा.''

फर्स्ट डेट मंदिर में

जब सब कुछ खास है तो डेट-साइट भी तो स्पेशल होनी ही चाहिए. जुहू बीच, सी-लिंक या कोई रेस्तरां... कुछ भी हो सकता था. जगह तो जाने पर कोई भी होती खास हो ही जाती. जब मां प्लान करे तो आम जगह भी खास बन ही जाएगी.

बेटे ने कभी सोचा भी न था. डेटिंग के लिए मंदिर जाना पड़ेगा. चर्च जाने वाले बेटे ने डेटिंग के लिए मंदिर की सीढ़ियां चुनीं. वैसे भी चाहे दीया जले या कैंडल, रोशनी तो एक ही जैसी होगी. ये बात अलग है कि कौन किससे कनेक्ट होता है? मामला...

टच वुड. किसी की नजर न लगे. अय्यर परिवार में खुशी छप्पर फाड़ के आई है. अय्यर परिवार के बेटे के लिए दूल्हे की तलाश पूरी हो गई है. विज्ञापन का शगुन शुभ रहा.

दूल्हा बड़ा शर्मिला है

बेटे के लिए दूल्हा. पुराने ख्यालात के लोगों को अटपटा लग सकता है. तो लगे. उनकी परवाह क्यों? परवाह तो लोगों को इंटरकास्ट शादियों पर भी है. दूसरी और भी न जाने कितनी अंतर-वाली-शादियों पर है.

अगर ऐसा न होता तो उस मां को बेटे के लिए दूल्हे का इश्तहार देने के लिए दर दर नहीं भटकना पड़ता. भला हो उस अखबार का जिसने साथ देने का साहस किया. एक परिवार की खुशी की खातिर.

एक मां के लिए बेटे की खुशी से बढ़कर आखिर कौन सी चीज हो सकती है? बेटे की खुशी को मां से बेहतर समझ भी कौन सकता है भला?

तभी तो जमाने की परवाह छोड़ उस मां ने ये बीड़ा उठाया. इश्तहार पर रिस्पॉन्स में न जाने कितनी गालियां और धमकियां आईं, उनका भी डट कर (नजरअंदाज करते हुए) मुकाबला किया. और आगे भी न जाने कितना करना पड़े?

अय्यर परिवार में दूल्हा बैठक दो घंटे तक चली. डिनर में डोसा सर्व किया गया. दादी की फरमाइश पर दूल्हे ने क्लारसिकल म्यूदजिक भी सुनाया. बेटा बहुत खुश था. ''मेरी मां, पिता, दादी और मेरी बिल्ली ने उसे पसंद किया.''

फिर मां खुश कैसे न होती. ''मैंने अय्यर को काफी भरोसेमंद पाया. वो बहुत धीमे बोलता है और सौम्य है. मुझे उम्मीद है कि वो हरीश का ख्याल रखेगा.''

फर्स्ट डेट मंदिर में

जब सब कुछ खास है तो डेट-साइट भी तो स्पेशल होनी ही चाहिए. जुहू बीच, सी-लिंक या कोई रेस्तरां... कुछ भी हो सकता था. जगह तो जाने पर कोई भी होती खास हो ही जाती. जब मां प्लान करे तो आम जगह भी खास बन ही जाएगी.

बेटे ने कभी सोचा भी न था. डेटिंग के लिए मंदिर जाना पड़ेगा. चर्च जाने वाले बेटे ने डेटिंग के लिए मंदिर की सीढ़ियां चुनीं. वैसे भी चाहे दीया जले या कैंडल, रोशनी तो एक ही जैसी होगी. ये बात अलग है कि कौन किससे कनेक्ट होता है? मामला मटीरियलिस्टिक नहीं, भावनाओं का जो है.

मंदिर की गूंजती घंटियों के एंबिएंस में दोनों ने फ्यूचर प्लान शेयर किए. लाइफ में मिलने वाले अटेंशन. क्रिटिसिज्म और जजमेंट. भविष्य में आने वाली चुनौतियां. और भी न जाने कितनी बातें. जब तक बातों का सिलसिला थम न गया.

फिर दोनों ने कदम कदम मिलाकर चलने की हामी भरी होगी. जिंदगी भर साथ निभाने पर भी बात हुई ही होगी.

बस थोड़ी सी फिक्र बाकी है

''घर में मुलाकात के बाद मेरी मां ने मुझे सलाह दी है कि मैं अपना फैसला लेने के लिए वक्त लूं, ताकि हम लोग एक-दूसरे को बेहतर तरीके से जान सकें. खासकर, मेरी मां इस बात पर ज्यादा जोर दे रही है कि वह मेरे लिए 'सेक्सुअली कॉम्पैटिबल' होगा या नहीं?''

फिक्र की बात तो है. आखिर सारी कवायद के पीछे बात तो बस इतनी सी ही है.

मां का इनिशिएटिव, मुमकिन है

मां को दुनिया की परवाह भले न हो, पर कानून की जरूर होगी. वैसे भी अगर दो लोग बालिग हैं तो कानूनन उन्हें साथ रहने का हक मिला हुआ है. हां, देश के कानून के तहत अननेचुरल सेक्स गैरकानूनी अवश्य है. रही बात सेम-सेक्स-मैरेज की तो अभी तक इसे कानूनी मान्यता नहीं मिली है. जहां तक समाज की बात है तो वहां बहस जारी है.

अमेरिकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन ने गे-मैरेज को लेकर अपना स्टैंड बदल लिया है. आयरलैंड ने भी अभी अभी गे-मैरेज को मान्यता दी है.

बाबा रामदेव जैसे अनुभवी इसे बीमारी बताकर इलाज का भी दावा करते हैं. दिल्ली के भी कुछ डॉक्टर इलाज के नाम पर पैसे ऐंठते रहे हैं. ऐसे तो गली गली सेक्स क्लिनिक खुले हैं. इलाज के साथ साथ गारंटी भी दी जाती है.

अगर मां इनिशिएटिव नहीं लेती तो क्या ये सब मुमकिन था. हरगिज नहीं. धन्य हो मां.

"हां, मेरे पास ऐसी मां है," पूछने पर हरीश का यही जवाब होगा.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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