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मोमबत्तियों की उजास क्या इस उदास अंधेरे को रोशन कर पाएगी?

    • प्रीति अज्ञात
    • Updated: 14 अप्रिल, 2018 03:59 PM
  • 14 अप्रिल, 2018 03:59 PM
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इधर गलियारों में राजनीति की तरीदार, महक़ती हांडी चढ़ चुकी है, संवेदनाओं की मीठी खीर अक्षयपात्र से गिरने को है. मौक़े की गरमागरम क़रारी रोटियां दोनों तरफ से सेकी जा रहीं हैं. शब्द, नमक की तरह सुविधानुसार हैं. आओ, स्वाद लें इस शुद्धिकरण भोज का!

निर्भया, आयलान, आसिफ़ा और इन जैसे तमाम मासूम, निर्दोषों की दर्दनाक चीखें यहां की आबोहवा में बस गई हैं. स्वयं को दोषी ठहराती हवाएं भारी शर्मिंदगी और गुस्से से गर्म हैं. सूरज की आंखें लाल हो दहक रही हैं. ये प्रकृति, ये हरे-भरे वृक्ष भी मुंह झुकाए, उदास चुपचाप खड़े हैं. कुछ डालियों ने सहमकर, नन्ही कोपलों को आहिस्ता से भीतर खींच लिया है और पल्लवित होने को बेताब कलियां स्वत: ही सूखकर इस माटी की गोदी में समा गई हैं. पहाड़ निःशब्द, स्तब्ध हैं और आसमां समंदर में अपना मुंह छुपाए बिलख-बिलख भीग रहा है. पक्षियों की चहचहाहट में अपने मनुष्य न हो पाने का उल्लास है या कि कुछ न कर पाने की बेबसी, स्पष्टत: कह नहीं सकती पर पशुओं को अब स्वयं के सभ्य होने का पूरा यक़ीन हो चला है.

मोमबत्तियों की उजास क्या इस उदास अंधेरे को रोशन कर पाएगी?

मनुष्य, मनुष्य नहीं रहा! वह धर्म और राजनीति की आड़ में अपनी हवस को बुझाने का रास्ता ढूंढ ही निकालता है. दानवी तर्क़, राजनीति को न्यायसंगत और लुभावने लगते हैं क्योंकि तिरंगे का स्थान दो अलग-अलग रंगों ने ले लिया है. साहस, बलिदान, सम्पन्नता और हरियाली से भरे इन दोनों रंगों ने मिलकर एकता के प्रतीक हमारे प्रिय राष्ट्रध्वज की ख़ूबसूरती को नष्ट कर एक स्याह काला रंग ओढ़ा दिया है, जिसमें घृणा है, ईर्ष्या है, द्वेष है. अब देश इन्हीं दो रंगों की पिचकारियों से ख़ून और बदले की होली खेलने लगा है. एक श्वेत रंग जो शांति का प्रतीक हुआ करता था, अब भी छटपटा रहा है. दशकों से उसकी पताका दूर-दूर तक भी देखने को नहीं मिल सकी है और अब यह केवल पुस्तकों, तस्वीरों, नम आँखों में छुपी दुआओं और सहमी, भयभीत चुप्पियों में नज़र आता है! अथाह वेदना से भरा हर ह्रदय यही कह रहा है कि बस! अब बस भी करो! अब और सुनने, देखने की शक्ति शेष नहीं रही! नींद, अब ख़्वाब हो गई है. बेचैनी, घबराहट और दुःख से उपजा अवसाद लीलने को आतुर है.

निर्भया, आयलान, आसिफ़ा और इन जैसे तमाम मासूम, निर्दोषों की दर्दनाक चीखें यहां की आबोहवा में बस गई हैं. स्वयं को दोषी ठहराती हवाएं भारी शर्मिंदगी और गुस्से से गर्म हैं. सूरज की आंखें लाल हो दहक रही हैं. ये प्रकृति, ये हरे-भरे वृक्ष भी मुंह झुकाए, उदास चुपचाप खड़े हैं. कुछ डालियों ने सहमकर, नन्ही कोपलों को आहिस्ता से भीतर खींच लिया है और पल्लवित होने को बेताब कलियां स्वत: ही सूखकर इस माटी की गोदी में समा गई हैं. पहाड़ निःशब्द, स्तब्ध हैं और आसमां समंदर में अपना मुंह छुपाए बिलख-बिलख भीग रहा है. पक्षियों की चहचहाहट में अपने मनुष्य न हो पाने का उल्लास है या कि कुछ न कर पाने की बेबसी, स्पष्टत: कह नहीं सकती पर पशुओं को अब स्वयं के सभ्य होने का पूरा यक़ीन हो चला है.

मोमबत्तियों की उजास क्या इस उदास अंधेरे को रोशन कर पाएगी?

मनुष्य, मनुष्य नहीं रहा! वह धर्म और राजनीति की आड़ में अपनी हवस को बुझाने का रास्ता ढूंढ ही निकालता है. दानवी तर्क़, राजनीति को न्यायसंगत और लुभावने लगते हैं क्योंकि तिरंगे का स्थान दो अलग-अलग रंगों ने ले लिया है. साहस, बलिदान, सम्पन्नता और हरियाली से भरे इन दोनों रंगों ने मिलकर एकता के प्रतीक हमारे प्रिय राष्ट्रध्वज की ख़ूबसूरती को नष्ट कर एक स्याह काला रंग ओढ़ा दिया है, जिसमें घृणा है, ईर्ष्या है, द्वेष है. अब देश इन्हीं दो रंगों की पिचकारियों से ख़ून और बदले की होली खेलने लगा है. एक श्वेत रंग जो शांति का प्रतीक हुआ करता था, अब भी छटपटा रहा है. दशकों से उसकी पताका दूर-दूर तक भी देखने को नहीं मिल सकी है और अब यह केवल पुस्तकों, तस्वीरों, नम आँखों में छुपी दुआओं और सहमी, भयभीत चुप्पियों में नज़र आता है! अथाह वेदना से भरा हर ह्रदय यही कह रहा है कि बस! अब बस भी करो! अब और सुनने, देखने की शक्ति शेष नहीं रही! नींद, अब ख़्वाब हो गई है. बेचैनी, घबराहट और दुःख से उपजा अवसाद लीलने को आतुर है.

मोमबत्तियों की उजास क्या इस उदास अंधेरे को रोशन कर पाएगी? ये पोस्टर, ये नारे, ये क्रांति क्या सुन्न हुए मस्तिष्कों पर अपना असर छोड़ पाएँगे? क्या हर अपराध के बाद प्रजा को राजा से यूं ही न्याय की गुहार लगानी होगी? क्या प्रजा की प्रसन्नता और सम्पन्नता, राजा और उसके दरबारियों का उत्तरदायित्व नहीं? न्याय तंत्र का काम न्याय करना है या उसकी पुकार करते लोगों की प्रतीक्षा करना?...कि आप चीखें, तो हम सुनने का प्रयास करें?

इधर गलियारों में राजनीति की तरीदार, महक़ती हांडी चढ़ चुकी है, संवेदनाओं की मीठी खीर अक्षयपात्र से गिरने को है. मौक़े की गरमागरम क़रारी रोटियां दोनों तरफ से सेकी जा रहीं हैं. शब्द, नमक की तरह सुविधानुसार हैं. आओ, स्वाद लें इस शुद्धिकरण भोज का! महकते गुलाबी कागज़ों में लिपटे सांत्वना के फूल भी बस आते ही होंगे!

मानवता आज भी किसी जीवित लाश की तरह बेसुध, औंधे मुँह उदास पड़ी है!

हो सके, तो इसे अपने-अपने घरों में ज़िंदा रखें कि आने वाली पीढ़ियों को मनुष्यता गाली न लगे!

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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