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गुजरात का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? जनता, कांग्रेस और बीजेपी सबके लिए सस्‍पेंस

    • बिलाल एम जाफ़री
    • Updated: 27 नवम्बर, 2017 04:15 PM
  • 27 नवम्बर, 2017 04:15 PM
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गुजरात चुनाव पूरे देश के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है और सभी ये जानना चाहते हैं कि आखिर जीत का ख़िताब किसे मिलेगा. कहा जा सकता है कि इस चुनाव में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी दोनों की, इज्जत दाव पर लगी हुई है.

गुजरात में चुनाव होने को हैं. जाहिर है प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां तेज होंगी. राज्य में चुनाव से जुड़ी बातें होना एक आम बात है मगर ये आम बात तब खास बन जाती है जब सम्पूर्ण देश इसके बारे में बात करे. आज चौक-चौराहे, गली- मुहल्ले यहां तक की सट्टा बाजार भी इस बात से खासा उत्साहित दिख रहे हैं कि गुजरात चुनाव के नतीजे क्या होंगे? गुजरात में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा? क्या गुजरात में देश के प्रधानमंत्री अपनी छाप छोड़ पाएंगे? क्या वाडनगर से लेकर अहमदाबाद तक राहुल गांधी का युवा जोश और युवाओं को साथ लेकर चलने की बात कोई कमाल दिखा पाएगी?

कहा जा सकता है कि एक आम देश वासी के लिए गुजरात चुनाव की बात किंतु-परंतु और लेकिन से ज्यादा कुछ नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि वो ये नहीं जानता कि आखिर एक गुजराती दिमाग किसे मुख्य मंत्री की कुर्सी में विराजमान देखेगा. लोगों की छोड़िये बात अगर गुजरात से चुनाव लड़ रही दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और भाजपा को भी ध्यान में रखकर विचार करें तो ये पार्टियां भी नहीं जानती हैं कि आखिर किस तरह गुजरात की जनता उनके भविष्य का फैसला करेगी.

गुजरात का चुनाव कांग्रेस और भाजपा की साख का चुनाव है

गुजरात में कांग्रेस और बीजेपी खुलकर एक दूसरे के सामने हैं. दोनों ही आरोपों और प्रत्यारोपों के जरिये एक वोटर को ये बताने का प्रयास कर रही हैं कि अगर हम सत्ता में आए तो गुजरात एक नई सुबह देखेगा. एक ऐसी सुबह जिसमें तमाम सुख और समृद्धियाँ तमाम गुजरातियों के कदम चूमेंगी. गुजरात में विकास का वो मॉडल दिखेगा जिसके कल्पना एक आम गुजराती ने शायद ही कभी अपने सपनों में की हो.

एक आम भारतीय की नजर में गुजरात चुनाव इस लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि नोटबंदी के दंश और जीएसटी के बाद ये पहली बार होगा कि एक आम गुजरती अपना मुख्यमंत्री...

गुजरात में चुनाव होने को हैं. जाहिर है प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां तेज होंगी. राज्य में चुनाव से जुड़ी बातें होना एक आम बात है मगर ये आम बात तब खास बन जाती है जब सम्पूर्ण देश इसके बारे में बात करे. आज चौक-चौराहे, गली- मुहल्ले यहां तक की सट्टा बाजार भी इस बात से खासा उत्साहित दिख रहे हैं कि गुजरात चुनाव के नतीजे क्या होंगे? गुजरात में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा? क्या गुजरात में देश के प्रधानमंत्री अपनी छाप छोड़ पाएंगे? क्या वाडनगर से लेकर अहमदाबाद तक राहुल गांधी का युवा जोश और युवाओं को साथ लेकर चलने की बात कोई कमाल दिखा पाएगी?

कहा जा सकता है कि एक आम देश वासी के लिए गुजरात चुनाव की बात किंतु-परंतु और लेकिन से ज्यादा कुछ नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि वो ये नहीं जानता कि आखिर एक गुजराती दिमाग किसे मुख्य मंत्री की कुर्सी में विराजमान देखेगा. लोगों की छोड़िये बात अगर गुजरात से चुनाव लड़ रही दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और भाजपा को भी ध्यान में रखकर विचार करें तो ये पार्टियां भी नहीं जानती हैं कि आखिर किस तरह गुजरात की जनता उनके भविष्य का फैसला करेगी.

गुजरात का चुनाव कांग्रेस और भाजपा की साख का चुनाव है

गुजरात में कांग्रेस और बीजेपी खुलकर एक दूसरे के सामने हैं. दोनों ही आरोपों और प्रत्यारोपों के जरिये एक वोटर को ये बताने का प्रयास कर रही हैं कि अगर हम सत्ता में आए तो गुजरात एक नई सुबह देखेगा. एक ऐसी सुबह जिसमें तमाम सुख और समृद्धियाँ तमाम गुजरातियों के कदम चूमेंगी. गुजरात में विकास का वो मॉडल दिखेगा जिसके कल्पना एक आम गुजराती ने शायद ही कभी अपने सपनों में की हो.

एक आम भारतीय की नजर में गुजरात चुनाव इस लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि नोटबंदी के दंश और जीएसटी के बाद ये पहली बार होगा कि एक आम गुजरती अपना मुख्यमंत्री चुनेगा. बात जब गुजरात चुनाव पर हो रही है तो यहां ये बताना बेहद जरूरी है कि इस बार का ये चुनाव देशवासियों के लिए इस कारण भी खास है कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब आम गुजरती हिन्दू मुस्लिम से इतर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेगा. जी हां बिल्कुल सही सुन रहे हैं आप. इस बार गुजरात का ये चुनाव हिन्दू बनाम मुस्लिम नहीं है और न ही इस बार यहां धर्म को तरजीह दी जा रही है. इस बार सम्पूर्ण चुनाव का केंद्र जातिवाद और जातिगत राजनीति है.

बीजेपी के लिए ये चुनाव इसलिए मुश्किल है कि अब आम गुजरती के पास हिंदुत्व से बड़े मुद्दे हैं

इस बात को समझने के लिए आप हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर या जिग्नेश मेवाणी किसी का भी रुख कर सकते हैं. बात खुद ब खुद शीशे की तरह साफ हो जाएगी. इन तीनों लोगों की रैलियों में उमड़ रही भीड़ ये बताने के लिए काफी है कि अब गुजरात का आम वोटर कुछ तूफानी चाहता है. अब इसी बात को आप बीजेपी के सांचे में डाल कर देखिये. आपको मिलेगा कि यही वजह बीजेपी के लिए एक बड़ी चिंता का सबब है और शायद इसी के मद्देनजर बीजेपी ने अपने तमाम स्तर प्रचारकों की फ़ौज गुजरात भेज दी है ताकि वो पार्टी के लिए प्रचार कर सकें और पार्टी को बहुमत दिला सकें.

इसके विपरीत जिस तरह कांग्रेस और उसमें भी राहुल गांधी लगातार गुजरात के लोगों को ये बताने का प्रयास कर रहे हैं कि, पूर्व की सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी के जरिये केवल उनके साथ छल किया है. वो ये बताने के लिए काफी है कि राहुल उस आम गुजरती के दिमाग को पकड़ने का प्रयास कर रहे हैं जिसमें नफा और नुकसान बसता है. कह सकते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुकाबले गुजरात में राहुल गांधी ज्यादा परिपक्व हुए हैं. गुजरात में राहुल गांधी के तेवर साफ तौर से ये दर्शा रहे हैं कि  अध्यक्ष पद की घोषणा के बाद ये चुनाव उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण है और उनकी तथा कांग्रेस पार्टी की पूरी साख इस चुनाव से जुड़ी है. इसी क्रम में राजनीतिक विशेषज्ञों का ये मानना है कि यदि इस चुनाव राहुल गांधी गुजरात में कुछ बड़ा नहीं कर पाए तो ये उनके राजनीतिक भविष्य का अंत होगा.

अगर कांग्रेस कुछ बड़ा नहीं कर पाई तो इससे राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य तक प्रभावित हो सकता है

गुजरात में राहुल को देखते हुए लगता है कि सूबे में कदम रखने से पहले उन्होंने कुछ बातें पहले से ही गाँठ बाँध ली हैं. जैसे वो हिंदुत्व और धर्म से एकदम दूर रहेंगे, मुस्लिम हितों की बातों से उचित दूरी बनाकर चलेंगे, एक आम गुजरती को गुजरात दंगों की याद नहीं दिलाएंगे और सिर्फ अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, दलित, पाटीदार और अन्य जाति समुदाय के लोगों के सपनों और महत्वाकांक्षाओं का जिक्र करेंगे.

कांग्रेस भाजपा से इतर सूबे की राजनीति में हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश की उपस्थिति और उनकी बातें भी ये बताने के लिए काफी हैं कि राज्य में वही पार्टी बढ़त बना पाएगी जो युवा और युवा हितों के विषय में सोचेगी. बहरहाल, गुजरात के जो हालात हैं उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि ये चुनाव न सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी के लिए खास है बल्कि सम्पूर्ण देशवासी भी इसको टकटकी बांधे देख रहे हैं और जानना चाह रहे हैं कि आखिर इतनी ऊहा पोह की स्थिति में एक आम गुजराती किसे अपना नेता चुनता है और उसे कुर्सी सौंपता है. 

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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