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'किंगमेकर' रहे पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाता से इस बार किसे होगा नफा-नुकसान

    • देवेश त्रिपाठी
    • Updated: 28 फरवरी, 2021 03:04 PM
  • 28 फरवरी, 2021 02:57 PM
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इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट 2021 के एक इंटरव्यू में ओवैसी को लेकर पूछे गए सवाल पर ममता बनर्जी ने कहा था कि ऐसे लोगों को महत्व नहीं देना चाहिए. ममता बनर्जी का ये जवाब ही तृणमूल कांग्रेस में मुस्लिम मतदाताओं को लेकर घर कर चुके डर को दर्शाता है.

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का सियासी पारा 'पामेला गोस्वामी' और 'रुजिरा नरूला' जैसी घटनाओं के साथ दिन-ब-दिन चढ़ता जा रहा है. आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति भी धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंच चुकी है. किसी पार्टी में फिल्म स्टार जुड़ रहे हैं, तो किसी में क्रिकेट के खिलाड़ी राजनीतिक पिच पर अपनी किस्मत आजमाने को तैयार हैं. तृणमूल कांग्रेस सारे दांव लगाकर भाजपा को पटखनी देने की तैयारी में जुटी है. भाजपा ने भी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले हिंदुत्व का कार्ड का भरपूर इस्तेमाल कर अपने लिए माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. इन सबके बीच सभी राजनीतिक दल अपने वोटबैंक को मजबूत करने में लगे हैं. ममता बनर्जी 200 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा कर रही हैं और उनके इस दावे के पूरा दारोमदार मुस्लिम मतदाताओं पर टिका है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिंदुत्व कार्ड के प्रयोग की वजह से राज्य का मुस्लिम मतदाता 'दोराहे' पर आकर खड़ा हो गया है.

अब्बास सिद्दीकी अब असदुद्दीन ओवैसी के पाले में खड़े हो गए हैं.

अब्बास सिद्दीकी और ओवैसी का गठजोड़

पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के करीबियों में से एक फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने अपनी अलग पार्टी बना ली है. मौलाना अब्बास सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) ने पहले कांग्रेस-वाम दलों के गठबंधन में शामिल होकर तृणमूल कांग्रेस का सिरदर्द बढ़ा दिया था. माना जा रहा है कि कांग्रेस-वाम दलों के साथ सीटों पर बात न बनने की वजह से वह फिर से एआईएमआईएम के पाले में आ गए हैं. एआईएमआईएम चीफ और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी राज्य में अपनी दस्तक दे दी है. लेकिन, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र मेतियाब्रुज़ में 25 फरवरी को होने वाली रैली की इजाजत नहीं मिली थी. राज्य में ओवैसी के चुनाव प्रचार का आगाज करने वाली रैली को पुलिस की इजाजत न मिलने की वजह बहुत महत्वपूर्ण है.

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का सियासी पारा 'पामेला गोस्वामी' और 'रुजिरा नरूला' जैसी घटनाओं के साथ दिन-ब-दिन चढ़ता जा रहा है. आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति भी धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंच चुकी है. किसी पार्टी में फिल्म स्टार जुड़ रहे हैं, तो किसी में क्रिकेट के खिलाड़ी राजनीतिक पिच पर अपनी किस्मत आजमाने को तैयार हैं. तृणमूल कांग्रेस सारे दांव लगाकर भाजपा को पटखनी देने की तैयारी में जुटी है. भाजपा ने भी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले हिंदुत्व का कार्ड का भरपूर इस्तेमाल कर अपने लिए माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. इन सबके बीच सभी राजनीतिक दल अपने वोटबैंक को मजबूत करने में लगे हैं. ममता बनर्जी 200 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा कर रही हैं और उनके इस दावे के पूरा दारोमदार मुस्लिम मतदाताओं पर टिका है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिंदुत्व कार्ड के प्रयोग की वजह से राज्य का मुस्लिम मतदाता 'दोराहे' पर आकर खड़ा हो गया है.

अब्बास सिद्दीकी अब असदुद्दीन ओवैसी के पाले में खड़े हो गए हैं.

अब्बास सिद्दीकी और ओवैसी का गठजोड़

पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के करीबियों में से एक फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने अपनी अलग पार्टी बना ली है. मौलाना अब्बास सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) ने पहले कांग्रेस-वाम दलों के गठबंधन में शामिल होकर तृणमूल कांग्रेस का सिरदर्द बढ़ा दिया था. माना जा रहा है कि कांग्रेस-वाम दलों के साथ सीटों पर बात न बनने की वजह से वह फिर से एआईएमआईएम के पाले में आ गए हैं. एआईएमआईएम चीफ और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी राज्य में अपनी दस्तक दे दी है. लेकिन, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र मेतियाब्रुज़ में 25 फरवरी को होने वाली रैली की इजाजत नहीं मिली थी. राज्य में ओवैसी के चुनाव प्रचार का आगाज करने वाली रैली को पुलिस की इजाजत न मिलने की वजह बहुत महत्वपूर्ण है.

टीवी टुडे ग्रुप के एक हालिया कार्यक्रम में ओवैसी को लेकर पूछे गए सवाल पर ममता बनर्जी ने जवाब न देते हुए कहा था कि ऐसे लोगों को महत्व नहीं देना चाहिए. ममता बनर्जी का ये जवाब ही तृणमूल कांग्रेस में मुस्लिम मतदाताओं को लेकर घर कर चुके डर को दर्शाता है. तृणमूल कांग्रेस के खास रहे मौलाना अब्बास सिद्दीकी का पार्टी को ठेंगा दिखाकर अब AIMIM के साथ खड़े हो जाना ममता बनर्जी की राजनीति के लिए बहुत भारी पड़ सकता है. पश्चिम बंगाल की सौ से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर जीत-हार का फैसला करने की ताकत रखते हैं. मौलाना अब्बास सिद्दीकी और असदुद्दीन ओवैसी का गठबंधन से निपटना ममता बनर्जी के लिए सबसे चुनौती होगा. इस दोनों के एकसाथ आने से मुस्लिम मतदाताओं का टीएमसी से दूर होने की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ गई है.

तृणमूल कांग्रेस को चौतरफा घेर रही है मुश्किलें

कांग्रेस-वाम दलों का गठबंधन भी थोड़ी संख्या में ही सही, लेकिन मुस्लिम वोटों में सेंध जरूर लगाएगा. इस स्थिति में तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के लिए हालात बहुत मुश्किल होते जा रहे हैं. टीएमसी के कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम चुके हैं. भाजपा के राज्य प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने पहले ही कह दिया है कि विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के साथ दलबदलुओं की संख्या और बढ़ेगी. पश्चिम बंगाल में भाजपा के कई बड़े नेता डेरा डाले बैठे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह राज्य के लगातार दौरे कर रहे हैं. कट्टर हिंदुत्व की राजनीति का बड़ा चेहरा और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को भी स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है. ममता बनर्जी को चौतरफा सियासी मुश्किलें घेर रही हैं.

पश्चिम बंगाल की सौ से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर जीत-हार का फैसला करने की ताकत रखते हैं.

अनुमान के हिसाब से पश्चिम बंगाल में करीब 31 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं. राज्य में मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा उत्तर, दक्षिण और मध्य बंगाल में रहता है. इस स्थिति में पश्चिम बंगाल की करीब 100 सीटों पर मुस्लिम मतदाता 'किंगमेकर' की अहम भूमिका निभाते हुए नजर आएंगे. लेकिन, अब्बास सिद्दीकी और ओवैसी के एकसाथ आने, कांग्रेस-वाम दलों की वजह से इन मुस्लिम मतदाताओं में विभाजन होने की संभावना साफ नजर आ रही है. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान हो चुका है. 27 मार्च से 29 अप्रैल तक 8 चरणों में चुनाव होने हैं. 2 मई को आने वाले नतीजों में तय हो जाएगा कि ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के लिए मुस्लिम मतदाता 'किंगमेकर' की भूमिका निभाएंगे या 'चोकर्स' साबित होंगे.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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