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कश्मीर में आतंकवाद को सामाजिक समर्थन मिलना सबसे खतरनाक बात है

    • मृगांक शेखर
    • Updated: 02 मार्च, 2019 11:03 PM
  • 02 मार्च, 2019 11:03 PM
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लंबे अरसे से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की समस्या की जड़ें सरहद पार पाकिस्तान में रही हैं, लेकिन अब स्थिति बदलने लगी है. आंतकवादी घाटी में अपना सपोर्ट सिस्टम विकसित करने लगे हैं - और ये ज्यादा खतरनाक है.

भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव का बेशक सबसे ज्यादा असर जम्मू और कश्मीर के लोगों पर पड़ता है. आईएएस छोड़ कर राजनीति शुरू करने जा रहे शाह फैसल का कहना है कि पिछले 15 कश्मीरियों के लिए कितने भयावह रहे हैं वे ही जानते हैं.

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में शाह फैसल ने अपने हालिया अनुभव शेयर करते हुए बताया, 'हमें लग रहा था कि युद्ध होने वाला है, जो लंबा चलेगा और लोग खुद इसके लिए तैयार करने लगे थे.'

2009 में आईएएस परीक्षा में पहला स्थान पाने वाले शाह फैसल का कहना है, 'ये वो युद्ध है जो हमारे घर में पिछले 30 साल से लड़ा जा रहा है.' शाह फैसल का सवाल है, 'क्या भारत-पाकिस्तान कोई ऐसा विकल्प नहीं निकाल सकते, जिसमें जान-माल का नुकसान न हो?'

बातचीत के दौरान शाह फैसल ने एक ऐसी बात बतायी जो हर किसी के लिए बड़ी चिंता का विषय हो सकती है. शाह फैसल की नजर में घाटी में आतंकवाद को सामाजिक समर्थन मिलने लगा है - और वास्तव में इससे खतरनाक कुछ हो भी नहीं सकता.

आतंकवादियों का सपोर्ट सिस्टम कैसे बना?

जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद कितने खतरनाक हालत में पहुंच गया है पुलवामा हमला उदाहरण है. पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले को कार बम से टारगेट किया गया था जो फिदायीन हमला था. हैरानी की बात ये रही कि हमले की साजिश रचने वालों ने एक कश्मीरी युवक को ही फिदायीन बनाने में कामयाबी हासिल कर ली.

किसी कश्मीरी युवक के आत्मघाती हमले को अंजाम देने की ये पहली घटना है और सुरक्षा बलों से लेकर हर किसी को फिलहाल इसी की फिक्र है. कश्मीरी नौजवान पत्थरबाजी के जरिये सुरक्षा बलों के रास्ते में आकर मदद तो आतंकवादियों की ही करते हैं - और सिलसिला भी लगातार कायम है. ये तो पहले ही साफ हो चुका है कि अलगाववादी नेता इसे पाकिस्तान की फंडिंग के जरिये अंजाम देते रहे हैं. अलगाववादियों के खिलाफ सरकार की हालिया कार्रवाई का फर्क जरूर पड़ना चाहिये.

शाह फैसल की नजर में घाटी में आंतकवाद को सामाजिक तौर पर समर्थन मिलना अप्रत्याशित है. शाह फैसल भी बाकी कश्मीरी...

भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव का बेशक सबसे ज्यादा असर जम्मू और कश्मीर के लोगों पर पड़ता है. आईएएस छोड़ कर राजनीति शुरू करने जा रहे शाह फैसल का कहना है कि पिछले 15 कश्मीरियों के लिए कितने भयावह रहे हैं वे ही जानते हैं.

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में शाह फैसल ने अपने हालिया अनुभव शेयर करते हुए बताया, 'हमें लग रहा था कि युद्ध होने वाला है, जो लंबा चलेगा और लोग खुद इसके लिए तैयार करने लगे थे.'

2009 में आईएएस परीक्षा में पहला स्थान पाने वाले शाह फैसल का कहना है, 'ये वो युद्ध है जो हमारे घर में पिछले 30 साल से लड़ा जा रहा है.' शाह फैसल का सवाल है, 'क्या भारत-पाकिस्तान कोई ऐसा विकल्प नहीं निकाल सकते, जिसमें जान-माल का नुकसान न हो?'

बातचीत के दौरान शाह फैसल ने एक ऐसी बात बतायी जो हर किसी के लिए बड़ी चिंता का विषय हो सकती है. शाह फैसल की नजर में घाटी में आतंकवाद को सामाजिक समर्थन मिलने लगा है - और वास्तव में इससे खतरनाक कुछ हो भी नहीं सकता.

आतंकवादियों का सपोर्ट सिस्टम कैसे बना?

जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद कितने खतरनाक हालत में पहुंच गया है पुलवामा हमला उदाहरण है. पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले को कार बम से टारगेट किया गया था जो फिदायीन हमला था. हैरानी की बात ये रही कि हमले की साजिश रचने वालों ने एक कश्मीरी युवक को ही फिदायीन बनाने में कामयाबी हासिल कर ली.

किसी कश्मीरी युवक के आत्मघाती हमले को अंजाम देने की ये पहली घटना है और सुरक्षा बलों से लेकर हर किसी को फिलहाल इसी की फिक्र है. कश्मीरी नौजवान पत्थरबाजी के जरिये सुरक्षा बलों के रास्ते में आकर मदद तो आतंकवादियों की ही करते हैं - और सिलसिला भी लगातार कायम है. ये तो पहले ही साफ हो चुका है कि अलगाववादी नेता इसे पाकिस्तान की फंडिंग के जरिये अंजाम देते रहे हैं. अलगाववादियों के खिलाफ सरकार की हालिया कार्रवाई का फर्क जरूर पड़ना चाहिये.

शाह फैसल की नजर में घाटी में आंतकवाद को सामाजिक तौर पर समर्थन मिलना अप्रत्याशित है. शाह फैसल भी बाकी कश्मीरी नेताओं की तरह इसके लिए केंद्र सरकार की नीतियों को ही जिम्मेदार बता रहे हैं. घाटी के लोगों से बातचीत की वकालत करते हुए शाह फैसल की सलाहियत है कि सरकार को घाटी के अवाम से जुड़ने वाली नीति अपनानी होगी. शाह फैसल का कश्मीर को लेकर कोई ठोस प्लान या आइडिया अभी सामने नहीं आया है, न ही उनकी राजनीतिक विचारधारा या किसी पार्टी के प्रति झुकाव ही सार्वजनिक तौर पर मालूम हुआ है. देखना होगा कि जिस सपने के साथ उन्होंने सिविल सर्विस छोड़कर राजनीति का सपना देखा है वो कैसा है?

हालांकि, घाटी में आतकंवाद के समर्थन मिलने की बात से वो खुद भी हैरान हैं और कहते हैं कि किसी ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी.

आतंकवाद की जड़ें काटने की जरूरत है

जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी नेताओं से सरकार के सुरक्षा कवर वापस लेने के साथ ही NIA और सुरक्षा बलों ने कार्रवाई तेज कर दी है. इसी बीच गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही उसके करीब 150 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया था.

जमात-ए-इस्लामी पर बैन के खिलाफ सड़क पर उतरीं महबूबा मुफ्ती

मुसीबत ये है कि महबूबा मुफ्ती सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर आयी हैं. जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सूबे में जमात-ए-इस्लामी पर पाबंदी लगाये जाने का विरोध कर रही हैं. श्रीनगर में पीडीपी कार्यकर्ताओं के साथ विरोध प्रदर्शन के दौरान महबूबा मुफ्ती ने जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ हुई कार्रवाई को केंद्र सरकार दमनात्मक बताया. जमात-ए-इस्लामी को महबूबा ने कश्मीरियों के लिए कड़ी मेहनत करने वाला संगठन बताया है.

ऐसा लगता है महबूबा मुफ्ती धीरे धीरे अपने पुराने अंदाज में लौटने लगी हैं - जब वो सुरक्षा बलों के खिलाफ आतंकवादियों के साथ खड़ी नजर आती हैं. वैसे तो मुख्यमंत्री रहते भी महबूबा मुफ्ती ने बुरहान वानी को लेकर जो बयान दिया था वो किसी के गले नहीं उतर रहा था. महबूबा मुफ्ती का कहना था कि अगर उन्हें पता होता तो उसे बचाने की कोशिश करतीं.

महबूबा मुफ्ती पहले भी सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गये आतंकवादियों के मददगार नौजवानों के परिवारों को रोने के लिए अपना कंधा देती रही हैं - एक बार फिर वो अपने पुराने सियासी रास्ते पर चल पड़ी हैं.

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में भारत-पाक तनाव और कश्मीर में आतंकवाद की समस्याओं पर कई विशेषज्ञों के विचार सुनने को मिले - जिनमें कुछ सलाहें भी थी और कुछ सवाल भी.

1. लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) डीएस हुड्डा : उरी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक की अगुवाई करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) डीएस हुड्डा मानते हैं कि पाकिस्तान को जवाब देना जरूरी है, लेकिन सैन्य कार्रवाई के साथ साथ कूटनीति का भी इस्तेमाल जरूरी है. उनका कहना है कि एक लंबी सोच और नीति के साथ चलना होगा. हुड्डा फिलहाल कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा पर विजन डॉक्युमेंट तैयार कर रहे हैं.

2. एयर चीफ मार्शल (रिटा.) फाली होमी मेजर : पूर्व वायुसेना प्रमुख फाली होमी मेजर ने तो घाटी में आतंकवाद के खात्मे के लिए वायुसेना के इस्तेमाल की सलाह दी है. विस्तार से समझाते हुए उन्होंने बताया कि जब कश्मीर में हम आतंकवादियों के खिलाफ लड़ाई लड़ते हैं तो कई जवान शहीद होते हैं, जब एनकाउंटर के दौरान गोलीबारी होती है और अंत में घर को उड़ाना ही होता है. तो ये काम पहले क्यों नहीं कर सकते?

पूर्व वायुसेना प्रमुख का कहना है कि जरूरी नहीं कि कश्मीर में विमानों का इस्तेमाल हो बल्कि हेलिकॉप्टर के जरिए गोलीबारी कर सकते हैं. या फिर उस घर को उड़ा सकते हैं जिसमें आतंकवादी छिपे हुए हैं.

3. शिवशंकर मेनन : पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की राय है कि एक ही रणनीति पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. उनका कहना रहा कि पाकिस्तान में सरकार है, व्यापारी हैं, सेना है और आतंकी भी हैं - समस्या सेना और आतंकियों से है. ऐसे में सेना से लेकर राजनयिक स्तर के सभी रास्ते अपनाने होंगे.

हालांकि, शिवशंकर मेनन ने एक सवाल भी खड़ा कर दिया. सरकार आगे क्या करना चाहती है? ये इस पर निर्भर करता है कि आप चाहते क्या हैं? चुनाव जीतना चाहते हैं, पाकिस्तान को हराना चाहते हैं या आतंकवाद का सफाया चाहते हैं?

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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