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असम-यूपी में जमीन आसमान का फर्क है, लेकिन बीजेपी के खुश होने का ख्याल बुरा नहीं

    • आईचौक
    • Updated: 02 जून, 2016 01:57 PM
  • 02 जून, 2016 01:57 PM
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असम और यूपी में सबसे बड़ा फर्क ये है कि मायावती वहां पहले से ही दावेदार नंबर वन हैं - उसके बाद ही बीजेपी या कांग्रेस का नंबर आता है.

लोक सभा और विधानसभा चुनावों की तासीर बिलकुल अलहदा होती है - ये धारणा आम रही है, लेकिन असम का नतीजा इससे थोड़ा अलग देखने को मिला. लोक सभा चुनाव में बीजेपी को असम की आधी सीटें मिली थीं - और विधानसभा में भी आंकड़ा लगभग वही रहा. अब यूपी में अग्नि परीक्षा होनी है. अगर कमल ने कमाल दिखाया तो नई अवधारणा पर नये सिरे से बहस की गुंजाइश बनेगी.

परिस्थिति/पोजीशन

असम में बीजेपी की कामायाबी का क्रेडिट महासचिव राम माधव के बुने ताने बाने को दिया गया. एक इंटरव्यू में राम माधव ने बताया था कि बीजेपी लोक सभा चुनाव के पहले से ही असम के एक्शन प्लान पर काम कर रही थी. यानी, लोक सभा के नतीजे बीजेपी के लिए परफॉर्मेंस टेस्ट के रिजल्ट थे - और उसे बेस मानकर बीजेपी आगे बढ़ी. तब बीजेपी को लगा कि वो अकेले आधी सीटें हासिल कर सकती है - लेकिन बहुमत के लिए उसे अलाएंस करना पड़ेगा. इसीलिए बीजेपी ने एजीपी और बीपीएफ को साथ लिया. आंकड़े भी बीजेपी के अनुमान को सही साबित किये. बीजेपी को 126 में से 60 सीटें मिलीं - और गठबंधन की बदौलत वो एजीपी के 14 और बीपीएफ के 12 विधायकों के बूते बहुमत हासिल कर सकी.

इसे भी पढ़ें: सत्ता के लिए बीजेपी क्या-क्या करेगी...

अब यूपी का रुख करें तो लोक सभा में उसे 80 में से 71 सीटें मिलीं थी और उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल को 1 मिलकर 72 हो गई. अगर ऐसे देखें तो बीजेपी को यूपी में वैसा ही बहुमत मिलना चाहिए जैसा दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को मिला. राजनीति में दो और दो चार तो दूर अक्सर तीन भी नहीं होता. हां, नसीबवालों की बात और है. फिर तो दो और दो पांच, छह या सात भी हो सकते हैं.

असम/यूपी

जहां तक एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर की बात है तो असम और यूपी में काफी फर्क है. पीरियड के हिसाब से...

लोक सभा और विधानसभा चुनावों की तासीर बिलकुल अलहदा होती है - ये धारणा आम रही है, लेकिन असम का नतीजा इससे थोड़ा अलग देखने को मिला. लोक सभा चुनाव में बीजेपी को असम की आधी सीटें मिली थीं - और विधानसभा में भी आंकड़ा लगभग वही रहा. अब यूपी में अग्नि परीक्षा होनी है. अगर कमल ने कमाल दिखाया तो नई अवधारणा पर नये सिरे से बहस की गुंजाइश बनेगी.

परिस्थिति/पोजीशन

असम में बीजेपी की कामायाबी का क्रेडिट महासचिव राम माधव के बुने ताने बाने को दिया गया. एक इंटरव्यू में राम माधव ने बताया था कि बीजेपी लोक सभा चुनाव के पहले से ही असम के एक्शन प्लान पर काम कर रही थी. यानी, लोक सभा के नतीजे बीजेपी के लिए परफॉर्मेंस टेस्ट के रिजल्ट थे - और उसे बेस मानकर बीजेपी आगे बढ़ी. तब बीजेपी को लगा कि वो अकेले आधी सीटें हासिल कर सकती है - लेकिन बहुमत के लिए उसे अलाएंस करना पड़ेगा. इसीलिए बीजेपी ने एजीपी और बीपीएफ को साथ लिया. आंकड़े भी बीजेपी के अनुमान को सही साबित किये. बीजेपी को 126 में से 60 सीटें मिलीं - और गठबंधन की बदौलत वो एजीपी के 14 और बीपीएफ के 12 विधायकों के बूते बहुमत हासिल कर सकी.

इसे भी पढ़ें: सत्ता के लिए बीजेपी क्या-क्या करेगी...

अब यूपी का रुख करें तो लोक सभा में उसे 80 में से 71 सीटें मिलीं थी और उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल को 1 मिलकर 72 हो गई. अगर ऐसे देखें तो बीजेपी को यूपी में वैसा ही बहुमत मिलना चाहिए जैसा दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को मिला. राजनीति में दो और दो चार तो दूर अक्सर तीन भी नहीं होता. हां, नसीबवालों की बात और है. फिर तो दो और दो पांच, छह या सात भी हो सकते हैं.

असम/यूपी

जहां तक एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर की बात है तो असम और यूपी में काफी फर्क है. पीरियड के हिसाब से भी देखें तो तीन गुना का अंतर है. असम में तरुण गोगोई के सामने बीजेपी खुद दावेदार बन कर खड़ी हो गई - यूपी में सबसे बड़ा फर्क ये है कि मायावती वहां पहले से ही दावेदार नंबर वन हैं - उसके बाद ही बीजेपी या कांग्रेस का नंबर आता है.

असम में बीजेपी ने खुद को मजबूत विकल्प के तौर पर पेश किया. उसने लोगों से अपना एजेंडा शेयर किया और कार्यक्रम बताए. खासतौर पर बांग्लादेश की सीमा से घुसपैठ और मूल असमवासियों की अस्मिता की बात की.

यूपी में अभी बीजेपी का एजेंडा जो मैसेज दे रहा है उसे फिलहाल तो दादरी पर आई नई रिपोर्ट को लेकर योगी आदित्यनाथ के बयान ही काफी हैं. यूपी में अखिलेश की स्थिति भी तरुण गोगोई से बेहतर है. कार्यकर्ताओं में असंतोष और बगावत के कारण कांग्रेस असम में काफी कमजोर हो गई थी. बीजेपी ने कांग्रेस छोड़ कर आए हिमंत बिस्वा सरमा का खूब इस्तेमाल किया.

कमल कमाल दिखाएगा क्या?

समाजवादी पार्टी में पहले तो ये बात है नहीं. ऊपर से वो फिलहाल घरवापसी मुहिम चला रही है. पार्टी में न ही, अमर सिंह दिल में तो आ ही चुके हैं. बेनी प्रसाद वर्मा का आना खास मायने रखता है. अगर अजीत सिंह भी साथ हो जाते हैं तो समाजवादी पार्टी ज्यादा ही मजबूत हो जाएगी.

यूपी में कांग्रेस किस ग्लैमर, बैनर और पोस्टर के साथ उतरती है तस्वीर साफ नहीं है, लेकिन उससे पहले बीजेपी को मायावती की चुनौती से जूझना होगा जिनके पास डेडिकेटेड दलित वोट बैंक तो है ही मुस्लिमों को भी साधने की कोशिश में हैं.

इसे भी पढ़ें: यूपी में सबसे बड़ा मुद्दा कानून व्यवस्था है तो माया पहली पसंद

यूपी में अमित शाह धीरे धीरे कदम बढ़ा रहे हैं. केशव मौर्य के रूप में उन्हें एक बैकवर्ड चेहरा आगे किया है तो गोरखपुर से शिव प्रताप शुक्ला को राज्य सभा भेजे जाने को इलाके में ब्राह्मण-ठाकुर वोटों को बैलेंस करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है. बीच बीच में दलित घरों के दौरे भी होते रहेंगे, ऐसा माना जा सकता है.

असम में वो सीएम उम्मीदवार के साथ उतरी थी लेकिन यूपी में बीजेपी नेता लगता है खबरें लीक करके के माहौल की पैमाइश कर रहे हैं. यूपी में मुख्यमंत्री उम्मीदवार होगा कि नहीं होगा, होगा भी तो कौन होगा - इस पर इंकार और इकरार की लुकाछिपी चल रही है.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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