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संस्कृति

मां की आंख तो बाप का क्या...?

    • करुणेश कैथल
    • Updated: 25 फरवरी, 2016 11:53 AM
  • 25 फरवरी, 2016 11:53 AM
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यहां भी वही तथ्य काम कर रहा है जो अक्सर महिलाओं के शोषण को लेकर दिए जाते हैं. क्या हमारे देश में महिलाओं की इज्जत अफजाई के लिए अब ऐसे ही शब्द बच गए हैं!

आम बोलचाल की भाषा में भी गालियों से प्रेरित शब्दों का इस्तेमाल आज कल ट्रेंड बन चुका है. खासकर अगर कोई दोस्त-यार हो तो फिर तो सीधे मुंह बात करने का सवाल ही पैदा नहीं होता. बगैर गाली-गलौच के बात करने पर लोगों को हमारी दोस्ती नजर नहीं आएगी. वैसे तो बहुत सारे ऐसे शब्द और वाक्य हैं जो गाली से प्रेरित होती हैं या यूं कहें कि शब्द या वाक्य नहीं वह गाली ही होती है. लेकिन आजकल ‘मां की आंख’ को फैशनेबल प्रतिष्ठा प्राप्त है. हमारी आम जिंदगी से लेकर स्टार, सुपर स्टार, बाॅलीवुड फिल्मों आदि तक में ‘मां की आंख’ वाक्य का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि इसका अर्थ समझ से परे है. लेकिन इसे दोहरे अर्थ वाले वाक्यों के परिवार की सदस्यता प्राप्त है.

हालांकि यह सवाल उसी समय उठना चाहिए था जिस समय से इस वाक्य का चलन शुरू हुआ.लेकिन आज भी यह सबसे बड़ा प्रश्न बना हुआ है कि अगर ‘मां की आंख’ तो ‘बाप का क्या....‘. इस वाक्य को जिसने भी बनाया हो उसे क्या किसी की मां ही दिखाई दी थी, किसी का बाप क्यों नहीं दिखाई दिया या यहां भी वही तथ्य काम कर रहा है जो अक्सर महिलाओं के शोषण को लेकर दिए जाते हैं. क्या हमारे देश में महिलाओं की इज्जत अफजाई के लिए अब ऐसे ही शब्द बच गए हैं! वो भी मां जैसे पवित्र शब्द के लिए.

जिस किसी ने भी इस वाक्य का इजात किया, उससे सभी यही जानना चाहेंगे कि अगर मां के उपर इस तरह का वाक्य बनाया तो बाप को क्यों छोड़ दिया. कायदे से तो इस तरह के वाक्यों के उपयोग पर पूर्णतः विराम लगनी चाहिए. इस तरह के वाक्यों से मां जैसे पवित्र शब्द की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान को काफी ठेस पहुंची है.

वैसे तो हर मां-बाप अपने बच्चों को बचपन से ही अच्छी शिक्षा देने की जुगत में लगे रहते हैं. बड़े होने-होने तक यही सीख देने की कोशिश करते हैं कि जिंदगी में कभी झूठ न बोलें, गाली-गलौच न करें आदि. लेकिन शायद यह कलयुग का दोष ही है कि कोई भी बगैर गाली जैसे शब्दों के बात नहीं करता मिलेगा.

कुल...

आम बोलचाल की भाषा में भी गालियों से प्रेरित शब्दों का इस्तेमाल आज कल ट्रेंड बन चुका है. खासकर अगर कोई दोस्त-यार हो तो फिर तो सीधे मुंह बात करने का सवाल ही पैदा नहीं होता. बगैर गाली-गलौच के बात करने पर लोगों को हमारी दोस्ती नजर नहीं आएगी. वैसे तो बहुत सारे ऐसे शब्द और वाक्य हैं जो गाली से प्रेरित होती हैं या यूं कहें कि शब्द या वाक्य नहीं वह गाली ही होती है. लेकिन आजकल ‘मां की आंख’ को फैशनेबल प्रतिष्ठा प्राप्त है. हमारी आम जिंदगी से लेकर स्टार, सुपर स्टार, बाॅलीवुड फिल्मों आदि तक में ‘मां की आंख’ वाक्य का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि इसका अर्थ समझ से परे है. लेकिन इसे दोहरे अर्थ वाले वाक्यों के परिवार की सदस्यता प्राप्त है.

हालांकि यह सवाल उसी समय उठना चाहिए था जिस समय से इस वाक्य का चलन शुरू हुआ.लेकिन आज भी यह सबसे बड़ा प्रश्न बना हुआ है कि अगर ‘मां की आंख’ तो ‘बाप का क्या....‘. इस वाक्य को जिसने भी बनाया हो उसे क्या किसी की मां ही दिखाई दी थी, किसी का बाप क्यों नहीं दिखाई दिया या यहां भी वही तथ्य काम कर रहा है जो अक्सर महिलाओं के शोषण को लेकर दिए जाते हैं. क्या हमारे देश में महिलाओं की इज्जत अफजाई के लिए अब ऐसे ही शब्द बच गए हैं! वो भी मां जैसे पवित्र शब्द के लिए.

जिस किसी ने भी इस वाक्य का इजात किया, उससे सभी यही जानना चाहेंगे कि अगर मां के उपर इस तरह का वाक्य बनाया तो बाप को क्यों छोड़ दिया. कायदे से तो इस तरह के वाक्यों के उपयोग पर पूर्णतः विराम लगनी चाहिए. इस तरह के वाक्यों से मां जैसे पवित्र शब्द की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान को काफी ठेस पहुंची है.

वैसे तो हर मां-बाप अपने बच्चों को बचपन से ही अच्छी शिक्षा देने की जुगत में लगे रहते हैं. बड़े होने-होने तक यही सीख देने की कोशिश करते हैं कि जिंदगी में कभी झूठ न बोलें, गाली-गलौच न करें आदि. लेकिन शायद यह कलयुग का दोष ही है कि कोई भी बगैर गाली जैसे शब्दों के बात नहीं करता मिलेगा.

कुल मिलाकर कोई कुछ भी करे लेकिन मां जैसे पवित्र शब्द के उपर बने वाक्य ‘मां की आंख’ को बिल्कुल उपयोग में न लाएं. जिस किसी ने भी इस वाक्य का इजात किया है वो या तो इसका अर्थ बताए और साथ में यह भी बताए कि अगर ‘मां की आंख..... तो बाप का क्या’.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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