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सियासी पार्टियों को मिलने वाले फंड पर सर्जिकल स्ट्राइक कब ?

    • शुभम गुप्ता
    • Updated: 19 नवम्बर, 2016 02:33 PM
  • 19 नवम्बर, 2016 02:33 PM
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आज देश का 90 फीसदी आम आदमी ही परेशान हो रहा है. अगर प्रधानमंत्री चाहते तो सबसे पहले इन राजनीतिक दलों की जांच करवाते. इनके पास पैसा कहां से आता है. वो भी करोड़ों रुपये.

आम आदमी आज महज 4 हजार रुपये निकालने के लिये परेशान है. अपना आधार, आपना पैन कार्ड सबकुछ दिखाने को तैयार है. मगर क्या हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां कभी बता पाएंगी कि उनके पास इतना पैसा कहां से आया? जैसे–जैसे आजादी के बाद चुनाव होते गए. चुनावी बजट भी बढ़ता गया. आज कोई भी बड़ी पार्टी करोड़ों-अरबों रुपए में किसी राज्य का चुनाव लड़ती है. और ये बात जग-जाहिर है कि ये दल बेहिसाब पैसा खर्च करते हैं. मगर कोई भी ये बताने को तैयार नहीं होता कि उनके पास ये पैसा कब और कहां से आया.

 सबसे पहले मोदी जी राजनीतिक दलों के पार्टी फंड पर कराते सर्जिकल स्ट्राइक

जब सूचना का अधिकार जैसा हथियार देश के सामने आया तो लगा कि अब तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा मगर हुआ क्या, इन दलों ने एक साथ निर्णय लिया कि आप हर चीज की जानकारी ले सकते हैं, मगर ये जानकारी नहीं ले सकते कि राजनीतिक पार्टीयों के पास इतना पैसा कहां से आया?  जब आम आदमी पार्टी बनी तो ऐसा लगा कि अब ईमानदार लोग आए हैं, ये देश को बदलेंगे. केजरीवाल ने कहा कि हम दूसरी पार्टी जैसे नहीं हैं. हमें जितना भी चंदा मिलता है हम अपनी वेबसाइट पर आपको दिखाएगें. और होता भी यही था. मैंने भी इसे चैक करने के लिये 10 रुपये दिए थे और मेरा नाम दिखाई दिया. केजरीवाल ने सबसे पहला चुनाव 20 करोड़ रु. में लड़ा. वो भी जनता के पैसे से. एक-एक पैसे का हिसाब दिया.

ये भी पढ़ें- काले धन के खिलाफ जंग जरूरी...

आम आदमी आज महज 4 हजार रुपये निकालने के लिये परेशान है. अपना आधार, आपना पैन कार्ड सबकुछ दिखाने को तैयार है. मगर क्या हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां कभी बता पाएंगी कि उनके पास इतना पैसा कहां से आया? जैसे–जैसे आजादी के बाद चुनाव होते गए. चुनावी बजट भी बढ़ता गया. आज कोई भी बड़ी पार्टी करोड़ों-अरबों रुपए में किसी राज्य का चुनाव लड़ती है. और ये बात जग-जाहिर है कि ये दल बेहिसाब पैसा खर्च करते हैं. मगर कोई भी ये बताने को तैयार नहीं होता कि उनके पास ये पैसा कब और कहां से आया.

 सबसे पहले मोदी जी राजनीतिक दलों के पार्टी फंड पर कराते सर्जिकल स्ट्राइक

जब सूचना का अधिकार जैसा हथियार देश के सामने आया तो लगा कि अब तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा मगर हुआ क्या, इन दलों ने एक साथ निर्णय लिया कि आप हर चीज की जानकारी ले सकते हैं, मगर ये जानकारी नहीं ले सकते कि राजनीतिक पार्टीयों के पास इतना पैसा कहां से आया?  जब आम आदमी पार्टी बनी तो ऐसा लगा कि अब ईमानदार लोग आए हैं, ये देश को बदलेंगे. केजरीवाल ने कहा कि हम दूसरी पार्टी जैसे नहीं हैं. हमें जितना भी चंदा मिलता है हम अपनी वेबसाइट पर आपको दिखाएगें. और होता भी यही था. मैंने भी इसे चैक करने के लिये 10 रुपये दिए थे और मेरा नाम दिखाई दिया. केजरीवाल ने सबसे पहला चुनाव 20 करोड़ रु. में लड़ा. वो भी जनता के पैसे से. एक-एक पैसे का हिसाब दिया.

ये भी पढ़ें- काले धन के खिलाफ जंग जरूरी थी

मगर जब से ये लोग सत्ता में आए , ये भी वही हो गए जो दुसरे थे. आज आम आदमी पार्टी ने भी अपनी वैबसाइट पर चंदा दिखाना बंद कर दिया है. अब ये भी नहीं बताते कि गोवा में हर तरफ इनके जो पोस्टर लगे हैं उसका पैसा कहां से आया. पंजाब में जो इतना पैसा खर्च कर रहे हैं, वो कहां से आया? कहते हैं कि आज के दौर में आदमी तभी तक ईमानदार है जब तक उसे भ्रष्टाचार करने का मौका न मिले. जैसे ही ये आम ईमानदार लोग सत्ता में आए इन्होंने पारदर्शिता पर ताला लगा दिया.  आज देश का 90 फीसदी आम आदमी ही परेशान हो रहा है. अगर प्रधानमंत्री चाहते तो सब से पहले इन राजनीतिक दलों की जांच करवाते. इनके पास पैसा कहां से आता है. वो भी करोड़ों रुपये. मगर इस मामले में बीजेपी भी कहां पीछे है. कुछ भी हो, परेशान हमेशा आम आदमी ही होता है. अगर भ्रष्टाचार को मिटाना है तो सबसे पहले इन पार्टियों को मिलने वाले फंड की जानकारी सार्वजनिक करनी होगी.

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कौनसी पार्टी को कितना और कहां से करोड़ों रुपये मिल रहा है पहले इस पर सर्जिकल स्ट्राइक हो. आम आदमी तो आपना सारा पैसा बैंक में ही रखता है और उसे किसी बात का डर भी नहीं है. मगर हां, आज परेशानी जरुर है और थोड़ी नहीं बहुत परेशानी है.

ये भी पढ़ें- 'कालेधन, 500 और 1000 रु.' के नीचे दब गए कई मुद्दे

मेरे हिसाब से देश में कालेधन पर सबसे बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक तब होगी जब प्रधानमंत्री मोदी राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले फंड के बारे में देश के सामने जानकारी रखेंगे. मगर इसे आप एक सपने के रुप में ही सोचिए क्योंकि जो आम आदमी पार्टी वाले लोग इसके खिलाफ आवाज उठाने आए थे, आज उन पर ही सवाल खड़े हो गए हैं.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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