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बीजेपी ने एक खास 'गेस्‍ट हाउस' बनवाया है कुछ खास लोगों के लिए...

    • आईचौक
    • Updated: 29 अगस्त, 2018 04:33 PM
  • 29 सितम्बर, 2017 06:49 PM
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बीजेपी को खुद जिसकी जरूरत है उसके लिए तो पार्टी में फ्री एंट्री पास है. लेकिन जिन्‍हें बीजेपी की जरूरत है उनके लिए बीजेपी के पास एनडीए का गेस्ट रूम ही उपलब्ध है.

बीजेपी अपने स्वर्णिम काल में सफर कर रही है. इस सफर के रास्ते में जो भी मिल रहा है अमित शाह उसे गले लगाने की कोशिश कर रहे हैं. अगर कोई गले लगने को तैयार नहीं तो येन केन प्रकारेण उसके गले भी पड़ जाने से बीजेपी को परहेज नहीं है. मगर, कुछ शर्तें भी लागू हैं.

बीजेपी ने दिल तो सभी के लिए खोल रखे हैं, लेकिन दरवाजा सबके लिए नहीं खुला है.

एनडीए का 'गेस्ट-रूम'

बीजेपी को खुद जिसकी जरूरत है उसके लिए तो पार्टी में भी फ्री एंट्री पास है, लेकिन जहां दोनों पक्ष एक दूसरे के पूरक बन रहे हैं उनके लिए एनडीए का गेस्ट रूम ही उपलब्ध है. ये गेस्ट रूम वो व्यवस्था है जिसमें कोई भी नेता अपना पैतृक संगठन छोड़ने के बाद खुद पार्टी बनाये और एनडीए में शामिल होकर बीजेपी के साथ हो ले.

हैं तो मांझी, मगर न खुद के न दूसरे के...

फिलहाल तीन राज्यों में तीन नेता ऐसे हैं जो बीजेपी के साथ के लिए बेचैन हैं. इन तीनों के साथ उनकी पैतृक पार्टियों से और के भी आने की बीजेपी को उम्मीद है. बीजेपी में फिलहाल इस बात पर मंथन चल रहा है कि इन्हें पार्टी में शामिल कर लिया जाये या उनकी नयी पार्टी के साथ सहयोगी बनाया जाये.

बिहार में जीतन राम मांझी ऐसी ही व्यवस्था के तहत एनडीए में बने हुए हैं.

कितने मांझी?

जीतन राम मांझी और ओ पनीरसेल्वम - इन दोनों ही नेताओं की अपने अपने सूबे में मिलता जुलता काम रहा है. कुछ मामलों में दोनों एक दूसरे के विपरीत भी काम करते पाये गये हैं. मांझी के साथ पहले तो बीजेपी ने नीतीश को खूब छकाया और अब जेडीयू से गठबंधन कर मांझी को ही हाशिये पर ला दिया है. तमिलनाडु में जयललिता के भरोसेमंद पनीरसेल्वम को बीजेपी ने संपर्क में रखा हुआ है और शशिकला के प्रति निष्ठावान पलानीसामी के साथ मेल मिलाप...

बीजेपी अपने स्वर्णिम काल में सफर कर रही है. इस सफर के रास्ते में जो भी मिल रहा है अमित शाह उसे गले लगाने की कोशिश कर रहे हैं. अगर कोई गले लगने को तैयार नहीं तो येन केन प्रकारेण उसके गले भी पड़ जाने से बीजेपी को परहेज नहीं है. मगर, कुछ शर्तें भी लागू हैं.

बीजेपी ने दिल तो सभी के लिए खोल रखे हैं, लेकिन दरवाजा सबके लिए नहीं खुला है.

एनडीए का 'गेस्ट-रूम'

बीजेपी को खुद जिसकी जरूरत है उसके लिए तो पार्टी में भी फ्री एंट्री पास है, लेकिन जहां दोनों पक्ष एक दूसरे के पूरक बन रहे हैं उनके लिए एनडीए का गेस्ट रूम ही उपलब्ध है. ये गेस्ट रूम वो व्यवस्था है जिसमें कोई भी नेता अपना पैतृक संगठन छोड़ने के बाद खुद पार्टी बनाये और एनडीए में शामिल होकर बीजेपी के साथ हो ले.

हैं तो मांझी, मगर न खुद के न दूसरे के...

फिलहाल तीन राज्यों में तीन नेता ऐसे हैं जो बीजेपी के साथ के लिए बेचैन हैं. इन तीनों के साथ उनकी पैतृक पार्टियों से और के भी आने की बीजेपी को उम्मीद है. बीजेपी में फिलहाल इस बात पर मंथन चल रहा है कि इन्हें पार्टी में शामिल कर लिया जाये या उनकी नयी पार्टी के साथ सहयोगी बनाया जाये.

बिहार में जीतन राम मांझी ऐसी ही व्यवस्था के तहत एनडीए में बने हुए हैं.

कितने मांझी?

जीतन राम मांझी और ओ पनीरसेल्वम - इन दोनों ही नेताओं की अपने अपने सूबे में मिलता जुलता काम रहा है. कुछ मामलों में दोनों एक दूसरे के विपरीत भी काम करते पाये गये हैं. मांझी के साथ पहले तो बीजेपी ने नीतीश को खूब छकाया और अब जेडीयू से गठबंधन कर मांझी को ही हाशिये पर ला दिया है. तमिलनाडु में जयललिता के भरोसेमंद पनीरसेल्वम को बीजेपी ने संपर्क में रखा हुआ है और शशिकला के प्रति निष्ठावान पलानीसामी के साथ मेल मिलाप करा रही है - भविष्य में जो भारी पड़ेगा वो मलाई खाएगा और दूसरा मांझी बनेगा.

फिलहाल बिहार में अशोक चौधरी इस भूमिका में आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं. महाराष्ट्र में ये किरदार नारायण राणे को मिल चुका है. दोनों में एक फर्क है कि राणे कांग्रेस छोड़ चुके हैं जबकि चौधरी पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है.

राणे चाहते थे कि बीजेपी उन्हें पार्टी में एंट्री दे दे, लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया. असल में राणे बीजेपी ज्वाइन कर अपने बेटों का भविष्य सुरक्षित करना चाहते थे लेकिन बात नहीं बन पायी. बीजेपी राणे को भी मांझी बनाये रखना चाहती है. इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा है कि वो बीजेपी पर बोझ भी नहीं बन सकते और पार्टी आने वाले चुनावों में राणे और उनके दोनों बेटों को शिवसेना के खिलाफ इस्तेमाल कर सकती है. अशोक चौधरी का केस राणे से थोड़ा अलग है. कांग्रेस ने चौधरी को हटाकर कौकब कादरी को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया है. लेकिन आलाकमान का ये फैसला बाकियों को रास नहीं आया है. सबूत ये है कि कादरी को शपथ दिलाये जाने के मौके पर कांग्रेस का सिर्फ एक ही विधायक पहुंचा बाकी गायब रहे. जाहिर है गायब रहने वाले उस खिचड़ी का हिस्सा हैं जो पर्दे के पीछे पक रही है. ये खिचड़ी भी पूरी पंचमेल की है. जो विधायक नदारद रहे उनके पास तीन तीन ऑफर हैं - बीजेपी के अलावा जेडीयू और आरजेडी से भी बुलावा आ रहा है. खुद अशोक चौधरी के अलावा कांग्रेस के ऐसे कई विधायक हैं जिनके नीतीश कुमार के साथ बहुत अच्छे रिश्ते हैं.

...जरा फासले से चला करो!

अशोक चौधरी भी बेहतर डील चाहते हैं इसलिए बड़े आराम से दलित कार्ड भी खेल दिया है. इन मामलों में आखिर फैसले इस पर निर्भर करते हैं कि सौदा किस रूप में फाइनल होता है. हालांकि, बंगाल में मुकुल रॉय का केस थोड़ा अलग है.

बंगाल में बीजेपी के मांझी

पश्चिम बंगाल में बीजेपी और मुकुल रॉय के बीच बातचीत भी आखिरी दौर में ही है. मुकुल और तृणमूल कांग्रेस का रिश्ता टूट जाने के बाद ये तो तय है कि बीजेपी ही उन्हें ठिकाना देने वाली है, लेकिन शर्तें क्या होंगी अभी साफ नहीं है.

राणे और चौधरी वाले चश्मे से थोड़ा इतर देखें तो मुकुल बीजेपी के लिए असम के हिमंत बिस्वा सरमा की तरह है. जिस तरह हिमंत कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार हुआ करते थे, उसी तरह ममता के लिए मुकुल रॉय रहे हैं. थोड़ा पीछे जायें तो यूपी चुनावों से पहले स्वामी प्रसाद मौर्य भी बीएसपी छोड़ कर बीजेपी के साथ आये थे. हिमंता और स्वामी दोनों ही बीजेपी सरकारों में मंत्री हैं, लेकिन हिमंता बीजेपी के ज्यादा भरोसेमंद हैं जिन पर पार्टी ने पूरे नॉर्थ ईस्ट की एक तरीके से जिम्मेदारी दे रखी है.

बूथ मैनेजमेंट के बाहुबली...

बीजेपी को बंगाल में मुकुल रॉय जैसे एक ऐसे नेता की जरूरत है जो ग्रास रूट लेवल पर पकड़ रखता हो. दिलीप घोष को अध्यक्ष बनाने के बावजूद बीजेपी में ये संकट बरकरार है. मुकुल रॉय के बारे में माना जाता है कि बूथ का नाम लेने पर वो वहां के कार्यकर्ताओं तक के नाम बताने लगते हैं. अमित शाह को भला और क्या चाहिये - और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तो वो इस बारे में समझा ही लेंगे. वैसे भी अगर मुकुल रॉय तैयार हों तो ममता बनर्जी को उनसे ज्यादा कौन नुकसान पहुंचा सकता है भला.

देश को कांग्रेस मुक्त बनाने के साथ साथ बीजेपी बंगाल को भी तृणमूल कांग्रेस मुक्त बनाने में जुटी हुई है. बीजेपी के इस मिशन में मुकुल रॉय पूरी तरह फिट हो सकते हैं. हालांकि, उनके ऊपर भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं और सीबीआई के रडार पर भी रहे हैं.

वैसे सौ सुनार की एक लुहार की वाले अंदाज में बीजेपी के कैलाश विजयवर्गीय इस मुद्दे पर खुद ही तस्वीर साफ कर देते हैं - पूछे जाने पर द हिंदू से कहते हैं, 'गंगा में सभी पवित्र हो जाते हैं.' बिलकुल सही जवाब!

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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