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तीन आतंकी संगठनों की पहुंच के नजदीक है परमाणु हथियार

    • आदर्श तिवारी
    • Updated: 04 अप्रिल, 2016 03:23 PM
  • 04 अप्रिल, 2016 03:23 PM
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परमाणु अस्त्रों को सुरक्षित करना सभी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों का प्रमुख दायित्व है. लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में कुछ राष्ट्र इस मसले पर गंभीर नही हैं. इसमें आतंक परस्त पाकिस्तान और उत्तर कोरिया प्रमुख हैं.

अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में परमाणु सुरक्षा जैसे गंभीर विषय को लेकर 50 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने विचार-विमर्श किया. इस शिखर सम्मलेन का मुख्य उद्देश्य परमाणु सुरक्षा पर मंडराते खतरे को रोकना था. सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इस विषय पर चिंता जताई कि परमाणु अस्त्र निर्माण में इस्तेमाल होने वालें युरेनियम और प्लूटोनियम पदार्थ को सुरक्षित कैसे रखा जाए. वो भी ऐसे में जब बोको हरम, इस्लामिक स्टेट और अलकायदा जैसे आतंकी संगठन परमाणु हथियार और उसकी तकनीक हासिल करने की फिराक में लगे हैं.

परमाणु अस्त्रो को सुरक्षित करना सभी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों का प्रमुख दायित्व है. लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में कुछ राष्ट्र इस मसले पर गंभीर नही हैं. इसमें आतंक परस्त पाकिस्तान और उत्तर कोरिया प्रमुख हैं. एक तरफ चरमपंथी ताकतें मजबूत हो रहीं तो दूसरी ओर उत्तर कोरिया बार-बार अपने परमाणु शक्ति का परीक्षण कर रहा है. ऐसे में स्थिति और गंभीर हो जाती है.

यह भी पढ़ें- पाकिस्तान के न्यूक्लियर बम से पूरी दुनिया पर बढ़ा खतरा

अगर हम परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलनों की पृष्टभूमि पर नजर डालें तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल से पहला परमाणु सुरक्षा सम्मेलन 2010 में वाशिंगटन में आयोजित किया गया. दूसरा 2012 में दक्षिण कोरिया में और फिर तीसरा सम्मेलन प्राग में हुआ था. परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन के इस छह साल की यात्रा पर गौर करें तो बराक ओबामा के इस पहल ने सभी देशों का ध्यान परमाणु सुरक्षा की तरफ आकर्षित किया.

अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में परमाणु सुरक्षा जैसे गंभीर विषय को लेकर 50 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने विचार-विमर्श किया. इस शिखर सम्मलेन का मुख्य उद्देश्य परमाणु सुरक्षा पर मंडराते खतरे को रोकना था. सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इस विषय पर चिंता जताई कि परमाणु अस्त्र निर्माण में इस्तेमाल होने वालें युरेनियम और प्लूटोनियम पदार्थ को सुरक्षित कैसे रखा जाए. वो भी ऐसे में जब बोको हरम, इस्लामिक स्टेट और अलकायदा जैसे आतंकी संगठन परमाणु हथियार और उसकी तकनीक हासिल करने की फिराक में लगे हैं.

परमाणु अस्त्रो को सुरक्षित करना सभी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों का प्रमुख दायित्व है. लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में कुछ राष्ट्र इस मसले पर गंभीर नही हैं. इसमें आतंक परस्त पाकिस्तान और उत्तर कोरिया प्रमुख हैं. एक तरफ चरमपंथी ताकतें मजबूत हो रहीं तो दूसरी ओर उत्तर कोरिया बार-बार अपने परमाणु शक्ति का परीक्षण कर रहा है. ऐसे में स्थिति और गंभीर हो जाती है.

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अगर हम परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलनों की पृष्टभूमि पर नजर डालें तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल से पहला परमाणु सुरक्षा सम्मेलन 2010 में वाशिंगटन में आयोजित किया गया. दूसरा 2012 में दक्षिण कोरिया में और फिर तीसरा सम्मेलन प्राग में हुआ था. परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन के इस छह साल की यात्रा पर गौर करें तो बराक ओबामा के इस पहल ने सभी देशों का ध्यान परमाणु सुरक्षा की तरफ आकर्षित किया.

 परमाणु सुरक्षा सम्मेलन

गौरतलब है कि इस चौथे शिखर सम्मेलन का आयोजन उस वक्त किया गया है जब आतंकवाद समूचे दुनिया में अपना पांव पसार रहा है. आतंकवाद का खतरा सभी देशों पर छाया हुआ है. लेकिन किसी भी देश के पास आतंकवाद से निपटने की कोई ठोस नीति नही है. फलस्वरूप कभी भारत में पठानकोट तो कभी ब्रसेल्स में आतंकवादी हमले होते हैं. आतंकवादी संगठन सरेआम अपने नापाक मनसूबों को अंजाम दे रहें है.

परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन में इस बात पर ज्यादा जोर दिया गया कि जिस प्रकार आतंकवादी संगठन परमाणु बम बनाने की सामग्री हासिल करनें का निरंतर प्रयास कर रहें है, उसे कैसे रोका जाए. अगर परमाणु बम बनाने की सामग्री किसी भी आतंकवादी संगठन के हाथों लग गई तो ये विश्व के लिए विध्वंसकारी होगा. इस बेहद गंभीर मुद्दे पर सभी देशों के प्रतिनिधियों ने चिंता जाहिर की है.

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में सभी देशों का ध्यान आतंकवाद की तरफ आकर्षित किया. मोदी ने मुख्य रूप से तीन बातों पर विशेष जोर दिया. उन्होंने बेहद शख्त लहजे में कहा कि सारे देशों को यह धारणा छोड़ देनी चाहिए कि यह मेरा आतंकी है, और यह तुम्हारा आतंकी है. हाल हुए ब्रसेल्स हमले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ये हमले दिखातें है कि परमाणु सुरक्षा पर आतंकवाद के कारण मंडराने वाला खतरा कितना वास्तविक व तात्कालिक है. इसके साथ ही मोदी ने ये भी कहा कि सभी देशों को इस संदर्भ में अपनी अंतर्राष्ट्रीय कर्तव्यों का पालन करना चाहिये. मोदी ने ये भी स्पष्ट किया कि हम गुफा में छिपे आदमी की तलाश नही कर रहें है बल्कि हमें उस आतंकी की तलाश है, जो शहर में है तथा कम्प्यूटर और स्मार्टफोन से लैस है.

आखिरी में मोदी ने पाकिस्तान पर निशाना साधने हुए कहा कि परमाणु तस्करों और आतंकियों के साथ मिलकर काम करने वाले सरकारी तत्व परमाणु सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. अपने संबोधन में मोदी ने बगैर नाम लिए पाकिस्तान पर कई दफा हमला बोला. ये बात जगजाहिर है कि पाकिस्तान सरकार आतंकवादियों की मदद करने से कोई गुरेज नही करती और पाक से पनपे आतंकी भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहें है.

 सम्मेलन में मोदी और ओबामा

वर्तमान स्थिति में विश्व के सामने सबसे बड़ा खतरा आतंकवाद से है. प्रधानमंत्री मोदी लगातार इस विध्वंसकारी ,कट्टरपंथी ताकतों से लड़ने के लिए एक साथ आने की अपील कर रहें है. परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में भारत की तरफ से दिए गये सुझावों पर सभी राष्ट्रों को गंभीरता से चिंतन करना चाहिए. यदि वक्त की नजाकत को देखतें हुए आतंकवाद के विरूद्ध सभी देश एकजुट नही हुए तो वो दिन दूर नही कि आतंकी संगठन परमाणु सामग्री को अपने चपेट में ले लेंगे और दुनिया को तबाह कर देंगे.

फिलहाल तो ये देखने वाली बात होगी कि भारत की इस अपील को दूसरे राष्ट्र कितने गंभीरता से लेते हैं. अब समय आ गया है कि विश्व के सभी अमन पसंद देश आतंक के मसले पर भारत के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलें. परमाणु हथियारों को पूर्णतया तभी सुरक्षित माना जा सकता है जब दुनिया आतंकवाद से निपटने की कोई ठोस नीति बनाएं.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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