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वायनाड चुनाव से भी ज्यादा जरूरी लड़कियों की इस स्थिति पर बात करना है!

    • श्रुति दीक्षित
    • Updated: 05 अप्रिल, 2019 08:09 PM
  • 05 अप्रिल, 2019 08:09 PM
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केरल की वायनाड सीट को लेकर जहां राजनीति जोरों पर है वहीं इस राज्य की असली समस्याओं से नेता दो चार नहीं हुए. बाहरी नेताओं को छोड़िए केरल के सबसे बड़े अभिशाप से तो स्थानीय नेता भी इस राज्य को मुक्त नहीं करवा पा रहे हैं.

लोकसभा चुनाव 2019 से पहले पूरे भारत में जिस तरह की स्थिति हो गई है उसे देखकर लगता है कि जैसे इस बार मॉनसून केरल में कुछ नई राजनीतिक फसल लेकर आएगा. वायनाड में राहुल गांधी से लेकर भाजपा की सहयोगी पार्टियों और CPI(M) तक सभी जुट गए हैं. चुनावी मुद्दे भी तैयार हो रहे हैं, लेकिन इन सबके बीच इसी इलाके के वोटरों का एक घड़ा ऐसा भी है जिनकी समस्या को नजरअंदाज किया जा रहा है. वायनाड और मल्लापुरम सीट की राजनीति तो ठीक, लेकिन इस इलाके में रहने वाली लड़कियों को कौन पूछेगा?

यहां बात हो रही है उन वोटरों की जो इस इलेक्शन में न सही, लेकिन अगले इलेक्शन में जरूर बहुत अहम रोल निभा सकते हैं. ये वोटर कोई और नहीं बल्कि वो नाबालिग लड़कियां हैं जिन्हें 18 साल से पहले ही शादी के बंधन में बांध दिया जाता है. ये केरल की वो सच्चाई है जिसे वहां की पढ़ी-लिखी आबादी छुपाती है.

फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट कहती है कि केरल के मल्लापुरम जिले की लड़कियों को मोबाइल फोन और घर के बाहर घूमने की आजादी का लालच देकर शादी के बंधन में बांधा जा रहा है. वहां के कई एनजीओ District Child Protection nit (DCP), Child Line और Child Welfare Committee कड़ी मेहनत कर रहे हैं ताकि किसी तरह से तो इस तरह के कांड रुकें.

पढ़े-लिखे राज्य की पिछड़ी मानसिकता:

केरल के एनजीओ अक्सर ऐसी लड़कियों से बात करते हैं और जो सच्चाई सामने आई है वो चौंकाने वाली है. लड़कियां हाई-स्कूल से ही शादी के लिए हां कर देती हैं. रिपोर्ट कहती है कि लड़कियों को शादी के लिए प्रोत्साहन आजादी के बदले मिलता है. घर वालों की नजर में लड़की की शादी जरूरी है और लड़कियों की नजर में शादी के बाद अपने पति के साथ घूमना और मोबाइल फोन मिलना आदि‍ जरूरी रहता है. यहां तक कि लड़कियां अपनी स्कूल की सहेलियों से भी इस बारे में बात करती हैं और उन्हें आकर्षित करती हैं कि वो भी जल्दी शादी कर लें. आजादी का ख्याल भी उन लड़कियों के लिए बेहद आकर्षक होता है.

लोकसभा चुनाव 2019 से पहले पूरे भारत में जिस तरह की स्थिति हो गई है उसे देखकर लगता है कि जैसे इस बार मॉनसून केरल में कुछ नई राजनीतिक फसल लेकर आएगा. वायनाड में राहुल गांधी से लेकर भाजपा की सहयोगी पार्टियों और CPI(M) तक सभी जुट गए हैं. चुनावी मुद्दे भी तैयार हो रहे हैं, लेकिन इन सबके बीच इसी इलाके के वोटरों का एक घड़ा ऐसा भी है जिनकी समस्या को नजरअंदाज किया जा रहा है. वायनाड और मल्लापुरम सीट की राजनीति तो ठीक, लेकिन इस इलाके में रहने वाली लड़कियों को कौन पूछेगा?

यहां बात हो रही है उन वोटरों की जो इस इलेक्शन में न सही, लेकिन अगले इलेक्शन में जरूर बहुत अहम रोल निभा सकते हैं. ये वोटर कोई और नहीं बल्कि वो नाबालिग लड़कियां हैं जिन्हें 18 साल से पहले ही शादी के बंधन में बांध दिया जाता है. ये केरल की वो सच्चाई है जिसे वहां की पढ़ी-लिखी आबादी छुपाती है.

फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट कहती है कि केरल के मल्लापुरम जिले की लड़कियों को मोबाइल फोन और घर के बाहर घूमने की आजादी का लालच देकर शादी के बंधन में बांधा जा रहा है. वहां के कई एनजीओ District Child Protection nit (DCP), Child Line और Child Welfare Committee कड़ी मेहनत कर रहे हैं ताकि किसी तरह से तो इस तरह के कांड रुकें.

पढ़े-लिखे राज्य की पिछड़ी मानसिकता:

केरल के एनजीओ अक्सर ऐसी लड़कियों से बात करते हैं और जो सच्चाई सामने आई है वो चौंकाने वाली है. लड़कियां हाई-स्कूल से ही शादी के लिए हां कर देती हैं. रिपोर्ट कहती है कि लड़कियों को शादी के लिए प्रोत्साहन आजादी के बदले मिलता है. घर वालों की नजर में लड़की की शादी जरूरी है और लड़कियों की नजर में शादी के बाद अपने पति के साथ घूमना और मोबाइल फोन मिलना आदि‍ जरूरी रहता है. यहां तक कि लड़कियां अपनी स्कूल की सहेलियों से भी इस बारे में बात करती हैं और उन्हें आकर्षित करती हैं कि वो भी जल्दी शादी कर लें. आजादी का ख्याल भी उन लड़कियों के लिए बेहद आकर्षक होता है.

केरल के घरों में आज भी लड़की को बोझ ही समझा जाता है.

कहने को तो केरल देश का सबसे पढ़ा लिखा राज्य है पर उस राज्य की कट्टरता और रूढ़िवादी सोच किसी से छुपी हुई नहीं है. यहां अभी भी पितृसत्ता चरम पर है और लड़कियों को बोझ ही समझा जाता है. 18 साल से कम उम्र की लड़कियों को शादी के लिए उनके माता-पिता ही तरह-तरह के प्रलोभन देते हैं. लड़कियों के मन में प्यार, आजादी और लालच भरकर उनकी शादी करवाना आसान है. 

22,552 लड़कियां 19 साल के पहले ही मां बन गईं:

केरल की हालत देखिए कि इस इलाके से बेहद चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. राज्य के इकोनॉमिक्स और स्टेटिस्टिक्स डिपार्टमेंट की एक रिपोर्ट कहती है कि राज्य में 19 साल से कम उम्र की 22,552 लड़कियों ने बच्‍चों को जन्‍म दिया. इतना ही नहीं ग्रामीण इलाकों में तो 137 लड़कियां ऐसी थीं जिन्होंने 19 साल की उम्र से पहले अपनी दूसरी संतान को जन्म दे दिया. 11 माएं 15 साल से कम उम्र की थीं.

ये आंकड़ा और खतरनाक शहरी इलाकों को मिलाकर हो जाता है. 298 मां अपने दूसरे बच्चे को 19 साल की उम्र से पहले जन्म दे देती हैं और 21 मां ऐसी भी थीं जो 19 साल से पहले तीसरे बच्चे की मां बन चुकी थीं. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि ये रिवाज मल्लापुरम जिले में सबसे ज्यादा है जहां 2017 में 181 ऐसे केस थे और 2016 में 125 ऐसे केस मौजूद थे.

75% से ज्यादा मुस्लिम:

जो आंकड़ा सामने आया है उसमें एक सच्चाई उस इलाके की आबादी से भी जुड़ी हुई है. जो लड़कियां कम उम्र में मां बनती हैं उनमें से 17,082 लड़कियां (15-19 साल की उम्र के बीच) मुस्लिम समुदाय की थीं. 4734 लड़कियां हिंदू थीं और 792 ईसाई. जहां ये डेटा 2017 का है रिपोर्ट 2019 फरवरी में ही आई है. वायनाड और मल्लापुरम जैसे इलाके मुस्लिम बहुल हैं और यहां का रिवाज जाति आधारित भी हो गया है.

अप्रैल और मई महीना क्यों होता है लड़कियों के लिए घातक:

जहां पूरे भारत में गर्मियों की छुट्टियां बच्चों को बहुत लुभावनी लगती हैं वहीं केरल में इस समय स्कूल जाने वाली लड़कियों की शादियां कर दी जाती हैं. इसका एक कारण ये भी है कि अप्रैल और मई में स्कूल की छुट्टियां हो जाती हैं और इस समय लड़कियां स्कूल प्रशासन से शिकायत नहीं कर पाती हैं. ऐसे में उनकी शादी करवाना घर वालों के लिए आसान हो जाता है. कई बार लड़कियां अपने हाई-स्कूल, हायर सेकंड्री की परीक्षा भी नहीं दे पातीं.

अपनी लड़कियों की जल्दी शादी करवा कर लोग एक और पीढ़ी को बर्बाद कर देते हैं.

NICEF की 2014 की रिपोर्ट भी इसी खतरनाक रिवाज को बताती है कि केरल की लड़कियां 18 साल की उम्र से पहले ही ब्याह दी जाती हैं.

क्या कोई इस समस्या की सुध लेगा?

एक तरफ भारत को एक विकासशील देश कहा जा रहा है और ऐसी उम्मीद की जा रही है कि भारत हमेशा से ही महिलाओं के प्रति इस तरह की सोच को लेकर सवालों के घेरे में रहा है, लेकिन इसे तो पाखंड की हद कहेंगे कि जिस राज्य को सबसे ज्यादा शिक्षित माना जाता है वो इस तरह की समस्या से जूझ रहा है. 17,202 कम उम्र की माएं 12वीं तक भी नहीं पढ़ी होती हैं. इस सर्वे में 3,420 लड़कियों ने तो अपनी शिक्षा के बारे में बताया ही नहीं. 86 तो अनपढ़ थीं और 91 ने प्राइमरी स्कूल तक भी पढ़ाई नहीं की है.

जब एक कम पढ़ी-लिखी लड़की की शादी होती है तो उसकी जिंदगी में पढ़ाई का महत्व नहीं रह जाता. माता-पिता ये नहीं समझते हैं कि अगर लड़की की शादी नहीं की जाएगी जल्दी तो वो पढ़-लिखकर नौकरी कर सकती है और अपने परिवार का पालन कर सकती है, लेकिन परिवार वाले तो उसे सिर्फ बोझ ही समझते हैं और ऐसे में जिस गरीबी की दुहाई देकर वो अपनी लड़की की शादी इतनी जल्दी कर देते हैं वो ये नहीं समझते कि इससे वो एक और पीढ़ी को गरीबी की तरफ ढकेल रहे हैं. ये आम धारणा है कि अगर लड़की लड़के से कम पढ़ी-लिखी होगी तो उसकी शादी की उम्मीद बढ़ जाएगी और ये भी एक कारण है कि उस इलाके में इतनी जल्दी शादियां कर दी जाती है.

न सिर्फ इन लड़कियों को अपने सशक्तिकरण की जानकारी नहीं होती बल्कि इन्हें ये भी नहीं पता होता है कि कैसे वो अपने बच्चों के लिए एक सही जीवन दें. National Institute of Mental Health and Neuro Sciences (NIMHANS) की एक रिपोर्ट के मुताबिक जिन बच्चों को किसी तरह का गलत काम करते पकड़ा गया है उसमें से 90 प्रतिशत एक ऐसे परिवार से आते हैं जहां मां की शादी कम उम्र में हुई है.

केरल में ही अरबी कल्याणम की भी एक ऐसी ही प्रथा थी जहां किसी अरब के दूल्हे से अपनी बेटी की शादी करवा दी जाती थी जो सिर्फ अपने काम के लिए ही केरल आता था. ये दूल्हे लड़की के परिवार को थोड़ा पैसा देकर चले जाते थे और फिर लड़कियों की जिंदगी उसी तरह दूभर हो जाती थी जिस तरह से रूढ़िवादी समाज में एक छोटी हुई पत्नी की होती है. वैसे तो लगभग 6 साल से अरबी कल्याणम का कोई केस सामने नहीं आया है, लेकिन फिर भी ये केरल के उस खतरनाक सच को सामने लाता है जहां अभी भी लड़कियों को बोझ ही समझा जाता है.

जितनी राजनीति केरल को लेकर हो रही है उसमें ये सोचना भी जरूरी है कि क्या वाकई कोई नेता इस स्थिति के बारे में कुछ कर सकता है या फिर किसी नेता को ये आंकड़े पता भी हैं. चलिए हम बाहरी नेताओं से उम्मीद नहीं कर सकते जो सिर्फ चुनाव लड़ने वहां गए हैं, लेकिन क्या वहां के स्थानीय नेताओं को भी इस बारे में नहीं पता? सवाल बड़ा है, लेकिन जवाब कहां मिलेगा इसके बारे में कोई जानकारी नहीं.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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