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सुना आपने, कन्हैया ने फिर भाषण दिया है!

    • डॉ. कपिल शर्मा
    • Updated: 07 मार्च, 2016 06:30 PM
  • 07 मार्च, 2016 06:30 PM
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एक टीवी पत्रकार होने के नाते मुझे पता है कि ये संभव नहीं था कि कन्हैया के भाषण को पहले रिकॉर्ड किया जाता और फिर उसका प्रसारण. टीवी चैनलों ने कन्हैया को आरोपी, पीड़ित, राजनीति का शिकार मानने के बजाए सिर्फ 'मैन आफ द मोमेंट' माना, जिसके बारे में लोग जानना चाह रहे थे.

क्‍या आपने भी सुना है? ...कन्हैया ने जेएनयू में एक बार फिर भाषण दिया है, लेकिन कहीं दिखायी-सुनायी नहीं दिया. किसी चैनल पर लाइव प्रसारण भी नहीं हुआ. बाद में भी किसी ने रिपीट भी नहीं किया. सुना है इस बार उसने काली जैकेट और उसके अंदर गोल गले वाली टीशर्ट भी नहीं पहनी थी. बल्कि इसके बजाए कुर्ता पहना था. शायद नया सिलवाया होगा. लेकिन हुआ क्या? क्या अचानक पूरा मीडिया राष्ट्रवादी हो गया, जिसने 'कामरेड कन्हैया' को ब्लैक आउट कर दिया. या फिर मीडिया के ज्ञानचक्षु खुल गए कि एक 'राष्ट्रद्रोही' को इतना फुटेज नहीं मिलना चाहिए. या फिर जेल में 'जन्मे' कन्हैया के ग्लैमर का सफर इतना ही था.

दरअसल, मीडिया में इसके पहले इतना स्पष्ट विभाजन कभी नहीं था. इसलिए मुझे डर है कि जब मैं अपना टीवी ज्ञान या एक टीवी पत्रकार के तौर पर अपनी बात लिखूंगा तो मुझे मूढ़ मान लिया जाएगा. लेकिन टीवी न्यूज की गूढ़ बात तो यही है. उस दिन वो टीवी की मजबूरी थी कि कन्हैया घंटे भर तक प्राइम टाइम में बिना ब्रेक के लौंडे के लिबाज में लाइव भाषण देता रहा. और अब ये टीवी की हकीकत ही है कि वो नेताओं की तरह कुर्ता पहनकर आया और टीवी पर लोग देख भी नहीं पाए कि 'कामरेड कन्हैया' दरअसल कुर्ते में लगते कैसे हैं.

जब कन्हैया चूका और न्यूज चैनल भी..

उस दिन भाषण देते वक्त चूक कन्हैया से भी हुई थी और भाषण दिखाने वाले न्यूज चैनलों से भी. लेकिन फायदा उस दिन कन्हैया ने भी उठाया और न्यूज चैनलों ने भी. कन्हैया ने अपने 50 मिनट के भाषण में नेता बनने और पीएम मोदी के आलोचक होने का खिताब तो हासिल कर लिया. लेकिन अपने ऊपर लगे देशद्रोह के दाग को धोने का मौका गंवा दिया.

अदालत के फैसले से पहले लोगों की निगाह में बेगुनाह साबित होने का बेहतरीन मौका कन्हैया के पास था अगर वो तरन्नुम में लगाए 'आजादी' के नारों में चंद शब्द और जोड़ देता. अफजल गुरु के विरोध के नारे या आतंकवाद का विरोधमात्र देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं है. लेकिन ऐसे माहौल में जब आप अपने ऊपर लगे आरोपों से अपना बचाव...

क्‍या आपने भी सुना है? ...कन्हैया ने जेएनयू में एक बार फिर भाषण दिया है, लेकिन कहीं दिखायी-सुनायी नहीं दिया. किसी चैनल पर लाइव प्रसारण भी नहीं हुआ. बाद में भी किसी ने रिपीट भी नहीं किया. सुना है इस बार उसने काली जैकेट और उसके अंदर गोल गले वाली टीशर्ट भी नहीं पहनी थी. बल्कि इसके बजाए कुर्ता पहना था. शायद नया सिलवाया होगा. लेकिन हुआ क्या? क्या अचानक पूरा मीडिया राष्ट्रवादी हो गया, जिसने 'कामरेड कन्हैया' को ब्लैक आउट कर दिया. या फिर मीडिया के ज्ञानचक्षु खुल गए कि एक 'राष्ट्रद्रोही' को इतना फुटेज नहीं मिलना चाहिए. या फिर जेल में 'जन्मे' कन्हैया के ग्लैमर का सफर इतना ही था.

दरअसल, मीडिया में इसके पहले इतना स्पष्ट विभाजन कभी नहीं था. इसलिए मुझे डर है कि जब मैं अपना टीवी ज्ञान या एक टीवी पत्रकार के तौर पर अपनी बात लिखूंगा तो मुझे मूढ़ मान लिया जाएगा. लेकिन टीवी न्यूज की गूढ़ बात तो यही है. उस दिन वो टीवी की मजबूरी थी कि कन्हैया घंटे भर तक प्राइम टाइम में बिना ब्रेक के लौंडे के लिबाज में लाइव भाषण देता रहा. और अब ये टीवी की हकीकत ही है कि वो नेताओं की तरह कुर्ता पहनकर आया और टीवी पर लोग देख भी नहीं पाए कि 'कामरेड कन्हैया' दरअसल कुर्ते में लगते कैसे हैं.

जब कन्हैया चूका और न्यूज चैनल भी..

उस दिन भाषण देते वक्त चूक कन्हैया से भी हुई थी और भाषण दिखाने वाले न्यूज चैनलों से भी. लेकिन फायदा उस दिन कन्हैया ने भी उठाया और न्यूज चैनलों ने भी. कन्हैया ने अपने 50 मिनट के भाषण में नेता बनने और पीएम मोदी के आलोचक होने का खिताब तो हासिल कर लिया. लेकिन अपने ऊपर लगे देशद्रोह के दाग को धोने का मौका गंवा दिया.

अदालत के फैसले से पहले लोगों की निगाह में बेगुनाह साबित होने का बेहतरीन मौका कन्हैया के पास था अगर वो तरन्नुम में लगाए 'आजादी' के नारों में चंद शब्द और जोड़ देता. अफजल गुरु के विरोध के नारे या आतंकवाद का विरोधमात्र देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं है. लेकिन ऐसे माहौल में जब आप अपने ऊपर लगे आरोपों से अपना बचाव यह कहकर कर रहे हैं कि आपने वो नारे लगाए ही नहीं तो फिर एक घंटे में आपको अपने ऊपर लगे देशद्रोह के आरोपों को धोने का मौका था. लगा देते आतंकवाद, नक्सलवाद और अफजल के खिलाफ नारे. मार देते तमाचा उन चेहरों पर जो देशद्रोह के नाम पर शोर मचा रहे हैं. जाहिर है ऐसा नहीं किया तो ईगो की बात तो नहीं ही रही होगी. जरूर कुछ सियासी खुराफात हुई होगी. क्योंकि सियासी रणनीतिकार और टीवी की नब्ज को समझने वाले आपके सलाहकार में शुमार हो चुके होंगे.

अब बात न्यूज चैनलों की चूक की, जो समझ ही नहीं पाए कि उनका इस्तेमाल हो रहा है. मीडिया ने यह देखा ही नहीं कि कन्हैया है कौन. यह सोचा ही नहीं कि क्यों उसके एक घंटे के भाषण को लाइव दिखाया जाए. अगर देखा सोचा होता तो कन्हैया को 5-10 मिनट से ज्यादा नहीं मिलते क्योंकि कन्हैया कोई आंदोलन खड़ा करने वाला नेता नहीं था जिसने लाठी डंडे खाये हों या फिर किसी मुद्दे को लेकर लंबा संषर्ष या योगदान रहा हो. उसकी पहचान सिर्फ एक ऐसे छात्र नेता की थी जो देशद्रोह के आरोप में जेल गया. और इस बात को लेकर विवाद है कि उस पर देशद्रोह का केस झूठा है या सच्चा.

न्यूज चैनलों के पास एक मौका और था जब वो अपनी चूक को संभाल सकते थे और वो तब जब यह पता चला कि कन्हैया ने तो अपने भाषण की पूरी लाइन ही बदल ली थी. अगर किसी को ऐसा लगता भी है कि कन्हैया ने बहुत अच्छा भाषण दिया तो क्या बेहतर यह नहीं होता कि पहले उसके पूरे भाषण को रिकॉर्ड किया जाता. फिर उसे प्ले करते. भले ही पूरा का पूरा कर देते. क्योंकि जो भी हो कन्हैया देशद्रोह का आरोपी था. वो भी नारे लगाने का आरोपी, पता नहीं एक बार फिर वो कुछ ऐसी वैसी बात लाइव प्रसारण के दौरान कह देता. फिर इसका ज़िम्मेदार कौन होता.

एक टीवी पत्रकार होने के नाते मुझे पता है कि संभव नहीं था कि कन्हैया के भाषण को पहले रिकॉर्ड किया जाता और फिर उसका प्रसारण. टीवी चैनलों ने कन्हैया को आरोपी, पीड़ित, राजनीति का शिकार मानने के बजाए सिर्फ 'मैन आफ द मूमेंट' माना, जिसके बारे में लोग जानना चाह रहे थे. इसीलिए तिहाड़ से लेकर जेएनयू तक लगभग हर चैनल ने अपनी दस दस कैमरा टीम लगाई और तकनीकी खराबी से पार पाने के लिए जेएनयू में एक से ज्यादा लाइव दिखाने वाले उपकरणों का इंतजाम भी किया. क्योंकि कोई भी चैनल टीआरपी की रेस में पीछे नहीं रहना चाहता, वो भी प्राइम टाइम में. अब आप इसे टीवी की दुनिया की मजबूरी कहिए, स्वार्थ कहिए या फिर विशुद्ध कारोबार, हकीकत यही है.

मिजाज टीवी का

अब बात टीवी न्यूज के मिजाज की. जब भी टीवी न्यूज को दिलचस्प बनाने के तरीक पढ़ाए जाते हैं तो हर टीचर दो बातें जरूर बताता है. वो भी अंग्रेजी में और वो ये कि 'टीवी न्यूज इज अ टीम वर्क' और 'टीवी न्यूज इज आल अबाउट अ ड्रामा'. अब इस कसौटी पर कसिये उस दिन के भाषण और उसके लाइव प्रसारण को, जिसमें सबकुछ था, इमोशन, ट्रेजडी, कॉमेडी, मिमक्री सबकुछ. अब ड्रामा खत्म हो गया. मानिए आप न्यूज चैनलों को माफ कर देंगे.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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