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ऐसा होने से येदियुरप्पा जैसों के लिए खुला मैदान ही मिल जाएगा!

    • आईचौक
    • Updated: 05 अक्टूबर, 2018 01:59 PM
  • 05 अक्टूबर, 2018 01:59 PM
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अर्जेंट सुनवाई को लेकर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने नया निर्देश जारी किया है. अब सिर्फ फांसी होने की हालत जैसी इमरजेंसी में ही ये सुविधा उपलब्ध हो पाएगी, जब तक कि इसके मानदंड तय नहीं कर लिये जाते.

कोई भी समझ सकता है, मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई का मुकाबला अब उन्हीं चुनौतियों से हो रहा है, जिसे लेकर वो जनवरी में जजों की प्रेस कांफ्रेंस का हिस्सा बने थे. ये जरूर है कि चीफ जस्टिस गोगोई ताबड़तोड़ उन्हें सुधारने में भी लगे हैं.

इसी क्रम में मुख्य न्यायाधीश का एक निर्देश अर्जेंट सुनवाई से जुड़ा है - जिसमें सिर्फ फांसी होने की हालत जैसी इमरजेंसी में ही अब ये सुविधा उपलब्ध हो पाएगी, जब तक कि इसके मानदंड तय नहीं कर लिये जाते.

फिलहाल आधी रात की सुनवाई में शर्तें लागू रहेंगी

मास्टर ऑफ रोस्टर बनते ही मिला अपना रोल निभाने के साथ ही जस्टिस गोगोई ने अपने तेवर भी दिखाने शुरू कर दिये हैं. 'कैप्टन ऑफ ज्यूडिशियरी' बताते हुए एक वकील ने जब उन्हें बधाई दी तो डांट दिया, 'ये बधाई देने की जगह नहीं, काम करने की जगह है.' बाकियों को भी लगे हाथ साफ कर ही दिया है - मैं जैसा हूं, वैसा हूं - बदलने वाला तो बिलकुल नहीं.

ये नये मिजाज की अदालत है, वो सब नहीं चलेगा

चीफ जस्टिस ने बड़े ही साफ शब्दों में निर्देश दिया है कि जब तक कुछ मानदंड तय नहीं कर लिए जाते, तब तक मामलों के तत्काल उल्लेख की अनुमति नहीं दी जाएगी. जस्टिस गोगोई ने कहा, "हम मानदंड तय करेंगे, उसके बाद देखेंगे कि कैसे मामलों का उल्लेख किया जाएगा. अगर किसी को कल फांसी दी जा रही हो या उसे घर से बाहर निकाला जा रहा हो तब हम समझ सकते हैं."

जस्टिस गोगोई के शुरुआती शिकार बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय और सीनियर वकील प्रशांत भूषण हो गये. चुनावी मामलों के जल्द निपटारे सहित कई मांगों से भरी अश्विनी उपाध्याय की याचिका तो खारिज हुई ही, रोहिंग्या पर याचिका खारिज करते वक्त सीनियर वकील प्रशांत भूषण को ये सलाह भी मिली कि कोई कामकाज के तरीके सिखाने की जुर्रत न करे. ये बता...

कोई भी समझ सकता है, मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई का मुकाबला अब उन्हीं चुनौतियों से हो रहा है, जिसे लेकर वो जनवरी में जजों की प्रेस कांफ्रेंस का हिस्सा बने थे. ये जरूर है कि चीफ जस्टिस गोगोई ताबड़तोड़ उन्हें सुधारने में भी लगे हैं.

इसी क्रम में मुख्य न्यायाधीश का एक निर्देश अर्जेंट सुनवाई से जुड़ा है - जिसमें सिर्फ फांसी होने की हालत जैसी इमरजेंसी में ही अब ये सुविधा उपलब्ध हो पाएगी, जब तक कि इसके मानदंड तय नहीं कर लिये जाते.

फिलहाल आधी रात की सुनवाई में शर्तें लागू रहेंगी

मास्टर ऑफ रोस्टर बनते ही मिला अपना रोल निभाने के साथ ही जस्टिस गोगोई ने अपने तेवर भी दिखाने शुरू कर दिये हैं. 'कैप्टन ऑफ ज्यूडिशियरी' बताते हुए एक वकील ने जब उन्हें बधाई दी तो डांट दिया, 'ये बधाई देने की जगह नहीं, काम करने की जगह है.' बाकियों को भी लगे हाथ साफ कर ही दिया है - मैं जैसा हूं, वैसा हूं - बदलने वाला तो बिलकुल नहीं.

ये नये मिजाज की अदालत है, वो सब नहीं चलेगा

चीफ जस्टिस ने बड़े ही साफ शब्दों में निर्देश दिया है कि जब तक कुछ मानदंड तय नहीं कर लिए जाते, तब तक मामलों के तत्काल उल्लेख की अनुमति नहीं दी जाएगी. जस्टिस गोगोई ने कहा, "हम मानदंड तय करेंगे, उसके बाद देखेंगे कि कैसे मामलों का उल्लेख किया जाएगा. अगर किसी को कल फांसी दी जा रही हो या उसे घर से बाहर निकाला जा रहा हो तब हम समझ सकते हैं."

जस्टिस गोगोई के शुरुआती शिकार बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय और सीनियर वकील प्रशांत भूषण हो गये. चुनावी मामलों के जल्द निपटारे सहित कई मांगों से भरी अश्विनी उपाध्याय की याचिका तो खारिज हुई ही, रोहिंग्या पर याचिका खारिज करते वक्त सीनियर वकील प्रशांत भूषण को ये सलाह भी मिली कि कोई कामकाज के तरीके सिखाने की जुर्रत न करे. ये बता रहा है कि उनकी नियुक्ति के साथ सरकार ने लोकतंत्र बचाने का जो संकल्फ लिया है - उसे वो लगातार आगे बढ़ाते रहेंगे.

सुप्रीम कोर्ट में नयी व्यवस्था लागू होने के बाद येदियुरप्पा की तरह अगर किसी ने फिर से जबरन कुर्सी पर बैठने की कोशिश की तो अदालत आधी रात को सुनवाई तो नहीं करने वाली.

आधी रात की सुनवाई में अभी शर्तें लागू रहेंगी

येदियुरप्पा भारतीय राजनीति के वो किरदार हैं जिनके पूर्वज चुनावों के शेषन आयोग बनने से पहले बूथ कैप्चरिंग को अंजाम दिया करते थे. जब से शेषन और केजे राव जैसे उनके उत्तराधिकारियों ने दिल्ली से लेकर चुनावी इलाकों में नियमों के बाड़ और कायदों की मोर्चेबंदी कर दी, ऐसे किरदारों का नामोनिशान मिटने लगा. अब तो वे विलुप्त प्रजाति की कैटेगरी में रखा जा चुके हैं.

जब बूथ की तरह कुर्सी पर कब्जे की कोशिश हुई!

कर्नाटक विधानसभा के चुनाव नतीजे अपने खिलाफ जाने के बावजूद बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा ने राजभवन से न्योता हासिल कर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी लगाम कसी कि पतली गली से भागना पड़ा.

ये सब मुमकिन भी सिर्फ और सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में आधी रात को हुई सुनवाई के चलते ही हो पाया. कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी और उनकी टीम ने जरूरी दस्तावेजों के साथ जो सटीक दलीलें दी - वो जबरन कुर्सी हथियाने की तमाम साजिशों पर भारी पड़ीं - और येदियुरप्पा को बेआबरू होकर विधानसभा से बाहर निकलना पड़ा.

आधी रात की सुनवाई के तो कई मामले हैं लेकिन येदियुरप्पा केस की ही तरह पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने पिछले महीने सुधा भारद्वाज की गिरफ्तारी पर सुनवाई की थी. सुधा भारद्वाज को पांच वामपंथी विचारकों के साथ पुणे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन हाई कोर्ट के दखल के बाद उन्हें पुलिस को उनके घर लेकर जाना पड़ा. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सुधा सहित पांचों वामपंथी कार्यकर्ताओं को घर पर नजरबंद रखने का आदेश दिया - जो अभी जारी है.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई के ताजा फरमान से चाहे जो कोई भी चिंतित हो, कम से कम शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया और रमन सिंह तो बेफिक्र ही होंगे. दरअसल ये तीनों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं जहां कुछ ही महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

हाल फिलहाल कर्नाटक जैसा वाकया तो दोहराये जाने से रहा. कम से कम चुनाव तक तो दूर दूर तक ऐसी कोई संभावना नहीं है. मगर, चुनाव बाद क्या होगा, क्या मालूम?

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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