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इरोम ने राजनीति में आकर मुश्किलें जरूर बढ़ा ली हैं

    • आईचौक
    • Updated: 09 फरवरी, 2017 09:32 PM
  • 09 फरवरी, 2017 09:32 PM
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खुरई से उनके चुनाव न लड़ने की खास वजह है - वहां के लोगों का इरोम के प्रचार में दिलचस्पी न लेना. वे लोग मानते हैं कि वैसे उम्मीदवार के लिए काम क्या करना जो न घर का हो न घाट का.

इरोम शर्मिला ने पहले घरेलू पिच खुरई से तो चुनाव लड़ने का फैसला किया. फिर उन्होंने मणिपुर के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह को भी उनके इलाके में चुनौती देने की घोषणा की. अब वो इबोबी की विधानसभा सीट थोउबल से तो चुनाव लड़ेंगी, लेकिन खुरई से इरादा त्याग दिया है.

खुरई से उनके चुनाव न लड़ने की खास वजह है - वहां के लोगों का इरोम के प्रचार में दिलचस्पी न लेना. वे लोग मानते हैं कि वैसे उम्मीदवार के लिए काम क्या करना जो न घर का हो न घाट का.

न घर न ठिकाना

इरोम के अपनों ने तो दूरी तभी बना ली जब उन्होंने आंदोलन के आगे का रास्ता राजनीति के जरिये तय करने का ऐलान कर दिया. अस्पताल से जब घर लौटीं तब न तो मोहल्ले वालों ने घास डाली ने घर वालों ने दरवाजा खोला. आगे कितनी मुश्किल आने वाली है इस बात का अंदाजा तो इरोम को हो गया लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

न घर न ठिकाना...

हफिंग्टन पोस्ट से बातचीत में इरोम अपने इस दर्द बड़े ही सहज ढंग से बयान करती हैं, "मेरे पास इस वक्त रहने के लिए घर नहीं है." ठुकराये जाने के बावजूद इरोम खुरई से चुनावी तैयारियों में जुटी रहीं, लेकिन आखिरकार उन्हें रणनीति बदलने को मजबूर होना पड़ा. इरोम बताती हैं कि इलाके जब इलाके के लोग कहने लगे कि क्या कह कर वोट मांगे जिसके रहने का ही कोई ठिकाना न हो. सही बात तो यही थी कि इरोम के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था - और उन्होंने एक ही जगह से चुनाव लड़ने का फैसला किया - थोउबल से.

सीटी बजाओ...

16 साल तक भूख पर काबू पाकर लड़ने वाली इरोम शर्मिला अक्सर इंफाल से 35 किलोमीटर साइकिल चला कर थोउबल पहुंचती हैं - और फिर चुनाव प्रचार में जुट जाती हैं. वहां उनके समर्थक आस पास के लोगों को जुटा कर छोटी छोटी मीटिंग करते हैं. इस तरह की...

इरोम शर्मिला ने पहले घरेलू पिच खुरई से तो चुनाव लड़ने का फैसला किया. फिर उन्होंने मणिपुर के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह को भी उनके इलाके में चुनौती देने की घोषणा की. अब वो इबोबी की विधानसभा सीट थोउबल से तो चुनाव लड़ेंगी, लेकिन खुरई से इरादा त्याग दिया है.

खुरई से उनके चुनाव न लड़ने की खास वजह है - वहां के लोगों का इरोम के प्रचार में दिलचस्पी न लेना. वे लोग मानते हैं कि वैसे उम्मीदवार के लिए काम क्या करना जो न घर का हो न घाट का.

न घर न ठिकाना

इरोम के अपनों ने तो दूरी तभी बना ली जब उन्होंने आंदोलन के आगे का रास्ता राजनीति के जरिये तय करने का ऐलान कर दिया. अस्पताल से जब घर लौटीं तब न तो मोहल्ले वालों ने घास डाली ने घर वालों ने दरवाजा खोला. आगे कितनी मुश्किल आने वाली है इस बात का अंदाजा तो इरोम को हो गया लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

न घर न ठिकाना...

हफिंग्टन पोस्ट से बातचीत में इरोम अपने इस दर्द बड़े ही सहज ढंग से बयान करती हैं, "मेरे पास इस वक्त रहने के लिए घर नहीं है." ठुकराये जाने के बावजूद इरोम खुरई से चुनावी तैयारियों में जुटी रहीं, लेकिन आखिरकार उन्हें रणनीति बदलने को मजबूर होना पड़ा. इरोम बताती हैं कि इलाके जब इलाके के लोग कहने लगे कि क्या कह कर वोट मांगे जिसके रहने का ही कोई ठिकाना न हो. सही बात तो यही थी कि इरोम के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था - और उन्होंने एक ही जगह से चुनाव लड़ने का फैसला किया - थोउबल से.

सीटी बजाओ...

16 साल तक भूख पर काबू पाकर लड़ने वाली इरोम शर्मिला अक्सर इंफाल से 35 किलोमीटर साइकिल चला कर थोउबल पहुंचती हैं - और फिर चुनाव प्रचार में जुट जाती हैं. वहां उनके समर्थक आस पास के लोगों को जुटा कर छोटी छोटी मीटिंग करते हैं. इस तरह की मीटिंग के लिए सभी का ध्यान इस बात पर होता है कि सब कुछ कम से कम खर्च में निपट जाये.

ये सफर...

इरोम की पार्टी पीपल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस अलाएंस जिसे संक्षेप में प्रजा कहा जा रहा उसे चुनाव चिह्न मिला है - सीटी.

सीटी बजाओ!

जिस तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने अपने सिंबल झाडू का प्रचार किया था, कुछ उसी अंदाज में इरोम की पार्टी लोगों से इंसाफ के लिए खड़े होने, AFPSA हटाने के लिए आगे आने के साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ और बदलाव के लिए सीटी बजाने की अपील कर रही है.

राजनीतिक पार्टी शुरू करने से पहले इरोम ने दिल्ली पहुंच कर अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी, जिसमें उन्होंने खास टिप्स दिये थे. केजरीवाल ने भी दिल्ली में सबसे पहले शीला दीक्षित को चैलेंज किया और शिकस्त दी. चैलेंज तो केजरीवाल ने बनारस जाकर नरेंद्र मोदी को भी किया था लेकिन वहां उन्हें मुहंकी खानी पड़ी. इरोम भी शायद उसी तरह इबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं.

मौजूदा सियासी समीकरण

हफपोस्ट-सी वोटर के एक सर्वे में मणिपुर की 60 में से 23 सीटें जीतते हुए दिखाया गया है. सर्वे में सत्ताधारी कांग्रेस के खाते में महज 19 सीटें देखी गई हैं. इस तरह छोटे दलों को भी 18 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है.

इबोबी सिंह तीन बार से मणिपुर के मुख्यमंत्री हैं और इस बार भी उन्हें सत्ता में लौटने का भरोसा है.

जंग तो जारी है...

जहां तक मणिपुर की छोटी पार्टियों की बात है तो उनकी भी दावेदारी यूं ही नहीं खारिज की जा सकती. जिन उम्मीदवारों को बीजेपी और कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया वे नेशनल पीपल्स पार्टी में चले गये हैं. ये पार्टी लोक सभा के पूर्व अध्यक्ष पीए संगमा ने बनायी थी जिसकी 30 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने की योजना है.

मैदान में मणिपुर पीपल्स पार्टी भी है जो इस बार 39 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. नगा पीपल्स फ्रंट भी जिस तरीके से अंगड़ाई ले रहा है उससे साफ है कि बीजेपी और कांग्रेस का सिर दर्द बढ़ने वाला है.

जहां सत्ता हासिल करने को लेकर ऐसा गला काट संघर्ष छिड़ा हो वहां इरोम शर्मिला साइकिल चलाकर कितना सफर तय कर पाएंगी. इरोम के लिए ये सब तब बहुत आसान होता जब उनके अपने साथ होते. इरोम मैती समुदाय से आती है जिसकी मणिपुर में सरकार बनवाने में निर्णायक भूमिका होता है.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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