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क्या जश्न के बूते ही कांग्रेस हासिल करेगी मिशन 75

    • आईचौक
    • Updated: 07 अप्रिल, 2016 06:51 PM
  • 07 अप्रिल, 2016 06:51 PM
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असम में बीजेपी की दमदार दस्तक और एआईयूडीएफ की रणनीति ने तरुण गोगोई की मुश्किलें जरूर बढ़ा दी हैं, लेकिन...

असम में बीजेपी के सत्ता में आने की चर्चा है, लेकिन जश्न का माहौल गुवाहाटी के कांग्रेस मुख्यालय में है. बतौर सीएम तीन टर्म पूरा कर चुके 80 साल के तरुण गोगोई चुनावी अखाड़े में अकेले दम पर उतरे हैं.

गोगोई का दांव

वैसे भी गोगोई इस बार अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती फेस कर रहे हैं. शायद इसलिए भी कि आला कमान की गठबंधन की इच्छा को ठुकराते हुए उन्होंने अकेले 126 सीटों पर मैदान में उतरने का फैसला किया. नीतीश की पहल पर प्रशांत किशोर ने गोगोई से कई बार मुलाकात की लेकिन उन्होंने गठबंधन के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया. नीतीश और कांग्रेस आलाकमान भी इस इस बात के पक्षधर रहे कि बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन हो जाए.

इसे भी पढ़े: मोदी-शाह को कहीं भारी न पड़े बीजेपी में बगावत और बाजी मार लें गोगोई!

गोगोई की स्ट्रैटेजी के बारे में इंडिया टुडे में कौशिक डेका लिखते हैं - मझे हुए राजनीतिज्ञ गोगोई जानते हैं कि एआईयूडीएफ के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन होने से हिंदू और आदिवासी वोट बीजेपी के पक्ष में चले जाएंगे. एआईयूडीएफ से गठबंधन के खिलाफ गोगोई के डटे रहने की वजह भी निश्चित रूप से यही होगी.

गोगोई का सबसे बड़ा सियासी दांव

राज्य में बीजेपी की दमदार दस्तक और एआईयूडीएफ की रणनीति ने गोगोई की मुश्किलें जरूर बढ़ा दी हैं. लोक सभा चुनाव में बीजेपी ने जहां 14 में से सात सीटें झटक लिए वहीं कांग्रेस के खाते में...

असम में बीजेपी के सत्ता में आने की चर्चा है, लेकिन जश्न का माहौल गुवाहाटी के कांग्रेस मुख्यालय में है. बतौर सीएम तीन टर्म पूरा कर चुके 80 साल के तरुण गोगोई चुनावी अखाड़े में अकेले दम पर उतरे हैं.

गोगोई का दांव

वैसे भी गोगोई इस बार अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती फेस कर रहे हैं. शायद इसलिए भी कि आला कमान की गठबंधन की इच्छा को ठुकराते हुए उन्होंने अकेले 126 सीटों पर मैदान में उतरने का फैसला किया. नीतीश की पहल पर प्रशांत किशोर ने गोगोई से कई बार मुलाकात की लेकिन उन्होंने गठबंधन के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया. नीतीश और कांग्रेस आलाकमान भी इस इस बात के पक्षधर रहे कि बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन हो जाए.

इसे भी पढ़े: मोदी-शाह को कहीं भारी न पड़े बीजेपी में बगावत और बाजी मार लें गोगोई!

गोगोई की स्ट्रैटेजी के बारे में इंडिया टुडे में कौशिक डेका लिखते हैं - मझे हुए राजनीतिज्ञ गोगोई जानते हैं कि एआईयूडीएफ के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन होने से हिंदू और आदिवासी वोट बीजेपी के पक्ष में चले जाएंगे. एआईयूडीएफ से गठबंधन के खिलाफ गोगोई के डटे रहने की वजह भी निश्चित रूप से यही होगी.

गोगोई का सबसे बड़ा सियासी दांव

राज्य में बीजेपी की दमदार दस्तक और एआईयूडीएफ की रणनीति ने गोगोई की मुश्किलें जरूर बढ़ा दी हैं. लोक सभा चुनाव में बीजेपी ने जहां 14 में से सात सीटें झटक लिए वहीं कांग्रेस के खाते में एआईयूडीएफ के बराबर तीन सीटें ही आईं. इंडिया टुडे से बातचीत में गोगोई कहते हैं, "कांग्रेस 75 सीटें जीतेगी."

ज्यादा वोटिंग बोले तो...

4 अप्रैल को पहले चरण के चुनाव में 82.20 फीसदी वोटिंग हुई, जबकि लोक सभा चुनाव में ये आंकड़ा 80.16 फीसदी रहा. तो ज्यादा वोटिंग किसके पक्ष में हुई? कांग्रेस या बीजेपी के?

बीजेपी के सीएम कैंडिडेट सर्बानंद सोनवाल इसे बीजेपी और सहयोगी दलों के प्रति जबरदस्त रुझान बता रहे हैं. बीजेपी ने बोडोलैंड्स पीपुल्स फ्रंट और असम गण परिषद के साथ गठबंधन किया है. बोडोलैंड्स पीपुल्स फ्रंट बोडो जनजातीय मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करती है. असम गण परिषद 1985-

इसे भी पढ़े: क्या असम में बदरुद्दीन का रोल वैसा ही है जैसा बिहार में ओवैसी का था?

1990 और 1996 में सरकार बना चुकी है. सोनवाल असम के मूल निवासियों के बीच 'जातीय बीर' के रूप में जाने जाते हैं. छात्र राजनीति से ही सक्रिय सोनवाल ने अवैध प्रवासियों को लेकर बने विवादास्पद कानून का विरोध किया था, जिसे 2005 में खत्म कर दिया गया. कानून के विरोधियों का तर्क था कि वो बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों को संरक्षण देता है.

2006 में एआईयूडीएफ के गठन से पहले असम में मुस्लिम वोट कांग्रेस को ही मिलते रहे. एआईयूडीएफ ने 2006 में शानदार सफलता हासिल की थी. कांग्रेस नेताओं का दावा है कि पहले चरण में हुए 65 सीटों के मतदान में उसे 40-45 सीटें मिल सकती है. कांग्रेस नेताओं का मानना है कि उनकी पार्टी को 90 फीसदी अल्पसंख्यक वोट जरूर मिलेंगे.

खुद गोगोई भी कह रहे हैं कि वोटिंग परसेंटेज ज्यादा होने का मतलब ये तो नहीं कि वो सत्ता विरोधी ही हो. बात में दम है, जब तक नतीजे नहीं आ जाते.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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