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2017 में यूपी को मिल सकता है मुस्लिम डिप्टी सीएम, अगर...

    • मृगांक शेखर
    • Updated: 21 अक्टूबर, 2016 05:27 PM
  • 21 अक्टूबर, 2016 05:27 PM
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मुस्लिम वोटरों से डायरेक्ट कनेक्ट बनाने के लिए बीएसपी की ओर से भाईचारा मीटिंग की जा रही हैं. जिम्मेदारी अफजल सिद्दीकी को सौंपी गयी है.

‘दम मारो दम…’ यूपी की सियासत में आज कल हर पार्टी इसी ताल पर थिरक रही है. सिर्फ बीजेपी को छोड़ कर – क्योंकि उस पर तो फिर से ‘हरे रामा, हरे कृष्णा… ’ धुन सवार हो चुकी है.  

यकीन न हो तो मायावती की हाल की रैलियां और बीएसपी नेताओं की भाईचारा मीटिंग की खबरें टटोलिये – और हां ‘मौलाना’ मुलायम से इमाम साहब की ताजा मुलाकात भी याद जरूर रखियेगा.

हर एक ‘कायद’ जरूरी होता है

नये मिजाज के इस चुनाव में दम का नया मतलब भी खोज लिया गया है. दम का मतलब दलित-मुस्लिम वोट से है. इसी दम फैक्टर के बूते मायावती समाजवादी पार्टी को बेदम किये हुए हैं.

इसे भी पढ़ें: देश का सबसे बड़ा मुस्लिम नेता यूपी का या कोई और?

सितंबर में सहारनपुर की रैली में मायावती ने मुजफ्फरनगर के जरिये समाजवादी पार्टी और अयोध्या कांड के जरिये बीजेपी को कठघरे में खड़ा किया – लगे हाथ ये भी समझा दिया कि अगर कभी कमान सौंपने की नौबत आई [मायावती का मतलब 2019 में किसी संयोगवश उनके प्रधानमंत्री बन जाने की सूरत में] तो सिर्फ दलित या मुस्लिम ही उसका हकदार होगा. ये बात यूपी ही नहीं दूसरे राज्यों में भी बीएसपी की सरकार बनी तो लागू होगी.

बीएसपी के दूसरे नेता भी इसी बात को अपने अपने तरीके से मुस्लिम समुदाय को समझा रहे हैं. समझाने वालों में ज्यादा मुखर बीएसपी विधायक अतर सिंह राव नजर आ रहे हैं. 

मुस्लिम वोटरों से डायरेक्ट कनेक्ट होने के लिए बीएसपी की ओर से भाईचारा मीटिंग आयोजित की जा रही हैं जिनकी जिम्मेदारी अफजल सिद्दीकी को सौंपी गयी है. ऐसी हर मीटिंग के शुरू होने से पहले अफजल सुनिश्चित करते हैं कि कुरान की आयतें जरूर पढ़ी जाएं. अफजल सीनियर बीएसपी लीडर नसीमुद्दीन...

‘दम मारो दम…’ यूपी की सियासत में आज कल हर पार्टी इसी ताल पर थिरक रही है. सिर्फ बीजेपी को छोड़ कर – क्योंकि उस पर तो फिर से ‘हरे रामा, हरे कृष्णा… ’ धुन सवार हो चुकी है.  

यकीन न हो तो मायावती की हाल की रैलियां और बीएसपी नेताओं की भाईचारा मीटिंग की खबरें टटोलिये – और हां ‘मौलाना’ मुलायम से इमाम साहब की ताजा मुलाकात भी याद जरूर रखियेगा.

हर एक ‘कायद’ जरूरी होता है

नये मिजाज के इस चुनाव में दम का नया मतलब भी खोज लिया गया है. दम का मतलब दलित-मुस्लिम वोट से है. इसी दम फैक्टर के बूते मायावती समाजवादी पार्टी को बेदम किये हुए हैं.

इसे भी पढ़ें: देश का सबसे बड़ा मुस्लिम नेता यूपी का या कोई और?

सितंबर में सहारनपुर की रैली में मायावती ने मुजफ्फरनगर के जरिये समाजवादी पार्टी और अयोध्या कांड के जरिये बीजेपी को कठघरे में खड़ा किया – लगे हाथ ये भी समझा दिया कि अगर कभी कमान सौंपने की नौबत आई [मायावती का मतलब 2019 में किसी संयोगवश उनके प्रधानमंत्री बन जाने की सूरत में] तो सिर्फ दलित या मुस्लिम ही उसका हकदार होगा. ये बात यूपी ही नहीं दूसरे राज्यों में भी बीएसपी की सरकार बनी तो लागू होगी.

बीएसपी के दूसरे नेता भी इसी बात को अपने अपने तरीके से मुस्लिम समुदाय को समझा रहे हैं. समझाने वालों में ज्यादा मुखर बीएसपी विधायक अतर सिंह राव नजर आ रहे हैं. 

मुस्लिम वोटरों से डायरेक्ट कनेक्ट होने के लिए बीएसपी की ओर से भाईचारा मीटिंग आयोजित की जा रही हैं जिनकी जिम्मेदारी अफजल सिद्दीकी को सौंपी गयी है. ऐसी हर मीटिंग के शुरू होने से पहले अफजल सुनिश्चित करते हैं कि कुरान की आयतें जरूर पढ़ी जाएं. अफजल सीनियर बीएसपी लीडर नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बेटे हैं.

  बीएसपी का नया मुस्लिम चेहरा

एक भाईचारा मीटिंग की बानगी देखिये – अतर सिंह राव समझाते हैं, “आपका हदीस कहता है कि मुसाफिरों के एक समूह को अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए एक ‘कायद’ की जरूरत होती है.” कायद का मतलब नेता होता है.

राव विस्तार से समझाते हैं - जो समुदाय पांच हजार साल तक गुलाम रहा हो, वो आपकी ही हदीस पर अमल कर एक बड़े मुकाम पर पहुंच गया.

राव का मतलब दलितों से है. राव बताते हैं कि दलितों ने कायद का कायदा समझ लिया और एकजुट होकर एक नेता और बैनर के तले चले हैं. राव खुद दलित हैं और यहां मायावती को कायद की नजीर के तौर पर पेश कर रहे हैं.

इसे भी पढ़ें: मुख्तार अंसारी से गठजोड़ सिर्फ तोडने के लिए ही था?

राव सवाल उठाते हैं कि आखिर हदीस से दलित सीख सकते हैं तो मुस्लिम उसे क्यों भूल जा रहे हैं.

कौन बनेगा डिप्टी सीएम?

फिर राव बड़ा सवाल उठाते हैं और साथ में चुनौती देते हैं – ‘नमाज और जनाजे के लिए आप एक साथ आते हैं, लेकिन वोट के समय बिखर जाते हैं.’

असल में, राव यही समझाना चाहते हैं कि दलितों की तरह मुस्लिमों को भी एक कायद की सख्त जरूरत क्यों आ पड़ी है.

ये सब समझाने के बाद बीएसपी नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी को एक मजबूत कायद के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाता है. समझाया जाता है कि मायावती शासन में उनका कैसा रुतबा और हैसियत रही – तब उनके पास 18 पोर्टफोलियो रहे. लोग बड़े गौर से सुनते हैं.

एक भाईचारा मीटिंग में खुद नसीमुद्दीन भी कहते हैं कि 30 करोड़ की आबादी होने के बावजूद मुसलमानों का कोई सियासी कायद नहीं होने की वजह से उनकी हालत बदतर है.

 नसीमुद्दीन होंगे कायद-ए-आला?

‘सियासत वो चाभी है, जिससे हर ताला खुल जाता है,’ कहते हुए नसीमुद्दीन समझाते हैं कि किस तरह कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और जनता दल ने वोट बैंक की तरह उनका इस्तेमाल किया और सब्जी में तेजपत्ते की तरह निकाल कर बाहर कर दिया.

बीएसपी फिलहाल नसीमुद्दीन को ही कायद-ए-आला के तौर पर प्रोजेक्ट कर रही है. चूंकि बीएसपी में कायद-ए-आजम तो मायावती ही हैं इसलिए नसीमुद्दीन को इस बार बीएसपी की सरकार बनने पर डिप्टी सीएम का ओहदा दिये जाने के संकेत देने की कोशिश हो रही है. बीएसपी नेताओं के हवाले से आ रही खबरों में जब तब इस बात का जिक्र भी आ रहा है. हालांकि, ईकनॉमिक टाइम्स ने जब यूपी बीएसपी चीफ राम अचल राजभर से असलियत जाननी चाही तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि सहारनपुर की रैली में जो बहन जी ने कहा उसके अलावा सब बातें सिर्फ कयास हैं.

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कहने को तो बीजेपी भी रामधुन के बीच प्रगतिशील पंचायत कर रही है. समाजवादी पार्टी तो अभी घर के झगड़े से ही नहीं उबर पाई है – जहां तक समाजवादी पार्टी की बात है तो उसके पास तो वैसे भी उसके अपने कायद और आजम हैं ही – बाकी आगे आगे देखिये होता है क्या?

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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