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सियासत

गुजरात में लौह पुरुष के लिए सियासी दौड़

    • बिजय कुमार
    • Updated: 30 अक्टूबर, 2017 10:58 PM
  • 30 अक्टूबर, 2017 10:58 PM
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सरदार पटेल की कीमत उनकी ही कांग्रेस पार्टी भले ही समझ नहीं पाई हो लेकिन भाजपा ने गांधी परिवार के बाहर भी लोगों को देखना सिखाया. इसी में से एक हैं सरदार पटेल.

केंद्र सरकार लौह पुरुष के नाम से मशहूर सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती को देशभर में राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मना रही है. सरदार पटेल देश के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे. स्वतंत्रता की लड़ाई में उन्होंने अहम् भूमिका निभाई थी. साथ ही देश को एकता के सूत्र में बांधने में उनके योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता. उनकी जयंती पर दिल्ली के पटेल चौक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें श्रद्धांजलि देंगे.

प्रधानमंत्री ने रविवार को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में सरदार पटेल का जिक्र करते हुए कहा कि- 'देश के इस महान संतान की असाधारण यात्रा से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं और सरदार पटेल नए भारत के दृष्टिकोण के लिए प्रेरक हैं.' प्रधानमंत्री ने कहा कि- 'सरदार ने जरूरत के अनुसार, मान-मनौव्वल और बल प्रयोग किया जिससे कारण ही वो जटिल समस्याओं का व्यावहारिक हल निकालने में कामयाब रहे.'

सरदार पटेल को उनकी पार्टी ने नहीं पहचाना

सरदार पटेल की जयंती के मौके पर 'रन फॉर यूनिटी' का भी आयोजन किया जाएगा, जिसकी शुरुआत खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे. इस मौके पर कई खिलाडियों सहित अन्य मशहूर हस्तियां मौजूद रहेंगी. 'रन फॉर यूनिटी' का आयोजन दिल्ली के शाहजहां रोड स्थित नेशनल स्टेडियम से इंडिया गेट तक किया जायेगा. ये दूरी करीब डेढ़ किलो मीटर की है. इस मौके पर रेल मंत्रालय करीब 1,500 रेलवे स्टेशनों पर कार्यक्रम आयोजित करेगा. केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल और दिल्ली पुलिस की ओर से राष्ट्रीय एकता दिवस के मौके पर मार्च पास्ट का आयोजन भी होगा. जबकि भारतीय दूतावासों में भी इस मौके पर सरदार पटेल को श्रद्धांजलि दी जाएगी.

यही नहीं सभी राज्यों में सरदार पटेल की जयंती के मौके पर कार्यक्रमों का आयोजन करने को कहा गया है. केंद्रीय युवा...

केंद्र सरकार लौह पुरुष के नाम से मशहूर सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती को देशभर में राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मना रही है. सरदार पटेल देश के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे. स्वतंत्रता की लड़ाई में उन्होंने अहम् भूमिका निभाई थी. साथ ही देश को एकता के सूत्र में बांधने में उनके योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता. उनकी जयंती पर दिल्ली के पटेल चौक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें श्रद्धांजलि देंगे.

प्रधानमंत्री ने रविवार को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में सरदार पटेल का जिक्र करते हुए कहा कि- 'देश के इस महान संतान की असाधारण यात्रा से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं और सरदार पटेल नए भारत के दृष्टिकोण के लिए प्रेरक हैं.' प्रधानमंत्री ने कहा कि- 'सरदार ने जरूरत के अनुसार, मान-मनौव्वल और बल प्रयोग किया जिससे कारण ही वो जटिल समस्याओं का व्यावहारिक हल निकालने में कामयाब रहे.'

सरदार पटेल को उनकी पार्टी ने नहीं पहचाना

सरदार पटेल की जयंती के मौके पर 'रन फॉर यूनिटी' का भी आयोजन किया जाएगा, जिसकी शुरुआत खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे. इस मौके पर कई खिलाडियों सहित अन्य मशहूर हस्तियां मौजूद रहेंगी. 'रन फॉर यूनिटी' का आयोजन दिल्ली के शाहजहां रोड स्थित नेशनल स्टेडियम से इंडिया गेट तक किया जायेगा. ये दूरी करीब डेढ़ किलो मीटर की है. इस मौके पर रेल मंत्रालय करीब 1,500 रेलवे स्टेशनों पर कार्यक्रम आयोजित करेगा. केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल और दिल्ली पुलिस की ओर से राष्ट्रीय एकता दिवस के मौके पर मार्च पास्ट का आयोजन भी होगा. जबकि भारतीय दूतावासों में भी इस मौके पर सरदार पटेल को श्रद्धांजलि दी जाएगी.

यही नहीं सभी राज्यों में सरदार पटेल की जयंती के मौके पर कार्यक्रमों का आयोजन करने को कहा गया है. केंद्रीय युवा मामलों और खेल मंत्रालय, मानव विकास संसाधन मंत्रालय के सहयोग से देश के 623 जिलों के केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों में कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे. पटेल की जयंती को यादगार बनाने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 'नेशन सेल्यूट्स सरदार बल्लभ भाई पटेल द यूनिफायर ऑफ इंडिया' विषय पर कार्यक्रम कराने का निर्णय भी लिया है. सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का लक्ष्य छात्रों के जरिये भारत की एकता का संदेश शहर से लेकर गांवों तक फैलाने का है.

सरदार पटेल की जयंती मनाने को लेकर कांग्रेस पार्टी ने मौजूदा बीजेपी सरकार की आलोचना भी की थी. कांग्रेस का कहना था कि सरदार पटेल कांग्रेस के नेता थे और वो संघ के खिलाफ रहे थे. यहां बता दें कि साल 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आयी, तभी से वो सरदार पटेल की जयंती को धूमधाम से मनाती आ रही है. गौरतलब है कि 31 अक्टूबर को ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी है. 2014 के पहले तक इस दिन उन्हीं की याद में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम होते आए थे. सरदार पटेल की तुलना में सरकारें 31 अक्टूबर को होने वाले कार्यक्रमों में इंदिरा गांधी को ज्यादा महत्व दिया करती थीं. 

ऐसा नहीं है की मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरदार पटेल की जयंती को लेकर कोई आज इतना बड़ा आयोजन कर रहे हैं. बल्कि 31 अक्टूबर 2013 को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती के मौके पर तब उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नर्मदा जिले में सरदार वल्लभ भाई पटेल के स्मारक का शिलान्यास किया था. जिसका नाम स्टैच्यू ऑफ यूनिटी रखा गया है.

भाजपा ने उनके नाम को अपने लिए भुना लिया

आइए एक नजर डालते हैं लौह पुरुष के जीवन पर... सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में एक लेवा गुर्जर प्रतिहार कृषक परिवार में हुआ था. झवेरभाई पटेल और लाडबा देवी की चौथी संतान वल्लभ ने लंदन जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई की और भारत वापस आकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे.

महात्मा गांधी के विचारों में दिलचस्पी के कारण पटेल ने सब कुछ छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. स्वतंत्रता आंदोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा संघर्ष में था. गुजरात का खेड़ा खण्ड उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था. किसानों द्वारा अंग्रेज सरकार से कर में छूट की मांग को स्वीकार नहीं किये जाने पर सरदार पटेल, गांधीजी एवं अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर नहीं देने के लिये प्रेरित किया. आख़िरकार सरकार को झुकना पड़ा और करों में राहत देनी पड़ी.

साल 1928 में गुजरात में हुए बारदोली सत्याग्रह का नेतृत्व वल्लभ भाई पटेल ने किया था. उस समय प्रांतीय सरकार ने किसानों के लगान में तीस प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी थी, जिसका पटेल ने भारी विरोध किया और आंदोलन शुरू किया. सरकार ने इस सत्याग्रह आंदोलन को कुचलने के लिए कई कठोर कदम उठाए. पर विवश होकर उसे किसानों की मांगों को मानना पड़ा था. इस आंदोलन के सफल होने के बाद वहां की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को 'सरदार' की उपाधि दी थी.

देश को आजादी मिलने के बाद बंटवारे के कारण देश के कई हिस्सों में फैली निराशा और आक्रोश को थामने का काम वल्लभ भाई पटेल ने गृहमंत्री के तौर पर बखूबी किया था. आजादी के बाद विभिन्न रियासतों में बिखरे भारत के भू-राजनीतिक एकीकरण में इन्होंने सफलता पूर्वक केंद्रीय भूमिका निभाई थी और इसी वजह से इन्हें भारत का बिस्मार्क और लौह पुरूष भी कहा जाता है. 15 दिसम्बर 1950 को इस महान शख्सियत का निधन हो गया. उन्हें भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा गया है.

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