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2 दिन की छुट्टी ही अब आधार से चीजें डी-लिंक करा सकती है!

    • बिलाल एम जाफ़री
    • Updated: 28 सितम्बर, 2018 03:47 PM
  • 28 सितम्बर, 2018 03:47 PM
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आधार पर फैसला देने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आम आदमी की दिक्कत दोबारा बढ़ा दी है अब आदमी को आधार से हर चीज डी लिंक कराने के लिए दफ्तर से दफ्तर दौड़ना होगा.

फाइनली अब उन फोन कॉल, उन टेक्स्ट मैसेज से राहत मिल गई. जिनके अनुसार हमें अपने जीवन से जुड़ी हर एक चीज को आधार से लिंक करना था. हर चीज को आधार से जोड़ने के लिए तमाम सर्विस प्रोवाइडर्स ने खून पी रखा था, वो न सिर्फ इरिटेटिंग. था बल्कि कभी कभी तो लगता था कि हमारी सरकार इसे भगवान या खुदा बनाने में जुट गई है. भला हो सुप्रीम कोर्ट का उसने हम आम आदमियों की परेशानी को समझा. एक बड़ा फैसला सुनाया और हमें परेशानी से राहत दी.

ध्यान रहे कि जहां एक तरफ कोर्ट ने स्कूलों, बैंक खातों, मोबाइल सिम इत्यादि के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता समाप्त कर दी है. तो वहीं दूसरी तरफ कोर्ट ने सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार को आवश्यक माना है. चूंकि आधार पर कोर्ट ने फैसला सुना दिया है अब हम जैसे आम आदमियों के लिए काम बढ़ गया है. हो सकता है कि इसे पढ़कर आदमी सवालों की झड़ी लगा दे और उत्तर तलाश करते हुए कहे कि इतनी अच्छी खबर के बाद परेशानी किस बात की ?

तो स्वाभाव से भोले और मन से जिज्ञासु ऐसे लोगों को आगे कुछ बताने से पहले, ये बताना बेहद जरूरी है कि वो तत्काल प्रभाव में लीव अप्लाई कर लें. आज बल्कि इसी पल आप अपने बॉस से या फिर उस संस्थान में जहां आप काम करते हों, कह दीजिये कि चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाए आप नहीं आएंगे. बता दीजिये उन्हें कि आपको हर कीमत पर छुट्टी की दरकार है. ऐसा इसलिए क्योंकि अब तक आपने हर चीज को आधार से जोड़ने के लिए संघर्ष किया था. अब बारी हर चीज से आधार डी लिंक करने की है. यकीन करिए चीजों में से आधार डी लिंक करना, हर चीज में आधार लिंक करने से ज्यादा जटिल है.

भले ही हम इंडिया को न्यू इंडिया बनाने की बातें कर रहे हों. अपने को विकासशील से विकसित मान रहे हों. डिजिटल बनने के दावे कर रहे हों. मगर जमीनी हकीकत यही है कि अब भी काम स्टोर से स्टोर, दुकान से दुकान और ऑफिस से ऑफिस दौड़ने में ही होता. आधार को चीजों से डीलिंक कराना जिस लेवल की समस्या है, कहना गलत नहीं है ये कुछ वैसा ही है जैसे 9 रुपए के समान के लिए उसे लाने ले जाने में 90 रुपए खर्च...

फाइनली अब उन फोन कॉल, उन टेक्स्ट मैसेज से राहत मिल गई. जिनके अनुसार हमें अपने जीवन से जुड़ी हर एक चीज को आधार से लिंक करना था. हर चीज को आधार से जोड़ने के लिए तमाम सर्विस प्रोवाइडर्स ने खून पी रखा था, वो न सिर्फ इरिटेटिंग. था बल्कि कभी कभी तो लगता था कि हमारी सरकार इसे भगवान या खुदा बनाने में जुट गई है. भला हो सुप्रीम कोर्ट का उसने हम आम आदमियों की परेशानी को समझा. एक बड़ा फैसला सुनाया और हमें परेशानी से राहत दी.

ध्यान रहे कि जहां एक तरफ कोर्ट ने स्कूलों, बैंक खातों, मोबाइल सिम इत्यादि के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता समाप्त कर दी है. तो वहीं दूसरी तरफ कोर्ट ने सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार को आवश्यक माना है. चूंकि आधार पर कोर्ट ने फैसला सुना दिया है अब हम जैसे आम आदमियों के लिए काम बढ़ गया है. हो सकता है कि इसे पढ़कर आदमी सवालों की झड़ी लगा दे और उत्तर तलाश करते हुए कहे कि इतनी अच्छी खबर के बाद परेशानी किस बात की ?

तो स्वाभाव से भोले और मन से जिज्ञासु ऐसे लोगों को आगे कुछ बताने से पहले, ये बताना बेहद जरूरी है कि वो तत्काल प्रभाव में लीव अप्लाई कर लें. आज बल्कि इसी पल आप अपने बॉस से या फिर उस संस्थान में जहां आप काम करते हों, कह दीजिये कि चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाए आप नहीं आएंगे. बता दीजिये उन्हें कि आपको हर कीमत पर छुट्टी की दरकार है. ऐसा इसलिए क्योंकि अब तक आपने हर चीज को आधार से जोड़ने के लिए संघर्ष किया था. अब बारी हर चीज से आधार डी लिंक करने की है. यकीन करिए चीजों में से आधार डी लिंक करना, हर चीज में आधार लिंक करने से ज्यादा जटिल है.

भले ही हम इंडिया को न्यू इंडिया बनाने की बातें कर रहे हों. अपने को विकासशील से विकसित मान रहे हों. डिजिटल बनने के दावे कर रहे हों. मगर जमीनी हकीकत यही है कि अब भी काम स्टोर से स्टोर, दुकान से दुकान और ऑफिस से ऑफिस दौड़ने में ही होता. आधार को चीजों से डीलिंक कराना जिस लेवल की समस्या है, कहना गलत नहीं है ये कुछ वैसा ही है जैसे 9 रुपए के समान के लिए उसे लाने ले जाने में 90 रुपए खर्च करना.

चीजों से आधार को डी लिंक कराना भी लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है

आज रसोई गैस से लेकर पैन कार्ड, बैंक अकाउंट, मोबाइल का सिम, पेटीएम, ऑनलाइन शॉपिंग सब कुछ आधार से लिंक है. कहीं कहीं स्कूल वालों ने भी पेरेंट्स से आधार लिया है. ऐसे में कोर्ट के आदेश के बाद हमारे लिए ये जरूरी हो जाता है कि हम उसे फौरन डीलिंक करें. अब जब बात डी लिंक की चल रही है तो छत्तीस किस्म की फॉर्मेलिटी होगी. उन फॉर्मेलिटीज को पूरा करने के लिए हमें इन स्थानों की यात्रा कर वहां घंटों लाइन में लगकर अपना समय बर्बाद करना ही होगा. अब ये बात शीशे की तरह साफ हो जाती है कि जब समस्या इस हद तक होगी तो हमें इन कामों को दुरुस्त करने के लिए छुट्टी तो चाहिए ही होगी.

इतनी बातों के बाद तर्क ये भी आ सकता है कि, चीजों को आधार से डी लिंक कराने के लिए दफ्तर से दफ्तर दौड़ने की क्या जरूरत. आप सीधे कस्टमर केयर को कॉल करें वो आपकी समस्या का निवारण कर देंगे. तो वो लोग जो ये बात कह रहे हैं. या फिर ऐसा करने पर विचार कर रहे हैं वो एक बार अपने दिल पर हाथ रखें. खुद से सवाल करें और पूछें अपने आप से कि आजतक कितनी बार ऐसा हुआ कि उन्होंने कस्टमर केयर को कॉल की हो और उनकी परेशानी छू मंतर हुई हो?

शायद 100 में से कोई एक ही ऐसा होगा जिसे ये कस्टमर केयर वाले संतुष्ट कर पाए हों बाक़ी 99 के हाथ में निराशा ही लगी है और उन्होंने उन दफ्तरों के चक्कर लगाए हैं जिनके कस्टमर केयर से टेलीफोन पर उनकी तीखी झड़पें हुई हैं.

अंत में बस इतना ही कि अब भी वक़्त है छुट्टी अपलाई कर दीजिये कहीं ऐसा न हो जब तक आप को बात समझ में आए आपका सामना लम्बी कतारों और उन कतारों में छिपे जेब कतरों से हो जो लाइन में लगे ही इसलिए हैं कि वो सब कुछ चुरा कर आपका आधार ही मिटा दें.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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