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पॉलिटिक्स में 'कठपुतली का खेल'

    • मोहित चतुर्वेदी
    • Updated: 16 फरवरी, 2017 12:55 PM
  • 16 फरवरी, 2017 12:55 PM
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कठपुतली शासकों की फहरिस्‍त में एक नाम और जुड़ गया- ई. पलानीसामी. शशिकला के भरोसेमंद पलानी अब उनकी ओर से तमिलनाडु की सत्‍ता संभालेंगे. जयललिता की कठपुतली रहे पनीरसेल्‍वम का खेल खत्‍म.

जैसे जयललिता के लिए ओ पनीरसेल्‍वम (ओपीएस) थे, वैसे ही अब जेल जा चुकीं शशिकला के लिए ई पलानीसामी (ईपीएस) होंगे. इस बात का फैसला चेन्‍नई के करीब एक रिसॉर्ट में बंद सौ से अधिक aiadmk विधायकों की मौजूदगी में शशिकला ने पहले ही कर दिया है. और तमिलनाडु गवर्नर ने संख्‍याबल के आधार पर इसे मंजूरी भी दे दी है. लेकिन, सवाल यह है कि 'गुलाम' शासकों की यह परंपरा कब तक चलेगी.

कठपुतली की डोर किसी के हाथ में होती है और वो अपने हिसाब से उसे नचाता है और जो चाहे वो कराता है. सियासत में भी ऐसा ही है. यहां भी पद किसी का होता है और बागडोर किसी और के हाथ में. ये कठपुतली का खेल किसी से छुपा नहीं है. लोग भी सोशल मीडिया पर जमकर मजाक भी उड़ाते हैं.

अम्मा की कठपुतली

जयललिता को जब कभी भी सीएम पद छोड़ना पड़ा तो उन्होंने पन्नीरसेल्वम को ही मुख्यमंत्री बनाया. जयललिता के सबसे खास और भरोसेमंद रहे पन्नीरसेल्वम ने 2001 में पहली बार सीएम पद संभाला था. बता दें कि 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने जयललिता के सीएम बने रहने पर रोक लगा दी थी. छह महीने बाद ही पन्नीरसेल्वम ने सीएम पद जयललिता के लिए छोड़ दिया था. 2014 में एक बार फिर आय से अधिक संपत्ति मामले में जयललिता के दोषी पाए जाने पर पन्नीरसेल्वम ने अम्मा की तस्वीर के साथ सीएम पद संभाला था. सात महीने बाद ही पन्नीरसेल्वम ने इस्तीफा दे दिया और जयललिता फिर से सीएम बन गईं. उनको 'कठपुतली सीएम' भी कहा जाता है और कई ऐसे फोटो भी आए जहां पन्नीरसेल्वम जयललिता को दंडवत प्रणाम कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

जब कांग्रेस सरकार सत्ता में...

जैसे जयललिता के लिए ओ पनीरसेल्‍वम (ओपीएस) थे, वैसे ही अब जेल जा चुकीं शशिकला के लिए ई पलानीसामी (ईपीएस) होंगे. इस बात का फैसला चेन्‍नई के करीब एक रिसॉर्ट में बंद सौ से अधिक aiadmk विधायकों की मौजूदगी में शशिकला ने पहले ही कर दिया है. और तमिलनाडु गवर्नर ने संख्‍याबल के आधार पर इसे मंजूरी भी दे दी है. लेकिन, सवाल यह है कि 'गुलाम' शासकों की यह परंपरा कब तक चलेगी.

कठपुतली की डोर किसी के हाथ में होती है और वो अपने हिसाब से उसे नचाता है और जो चाहे वो कराता है. सियासत में भी ऐसा ही है. यहां भी पद किसी का होता है और बागडोर किसी और के हाथ में. ये कठपुतली का खेल किसी से छुपा नहीं है. लोग भी सोशल मीडिया पर जमकर मजाक भी उड़ाते हैं.

अम्मा की कठपुतली

जयललिता को जब कभी भी सीएम पद छोड़ना पड़ा तो उन्होंने पन्नीरसेल्वम को ही मुख्यमंत्री बनाया. जयललिता के सबसे खास और भरोसेमंद रहे पन्नीरसेल्वम ने 2001 में पहली बार सीएम पद संभाला था. बता दें कि 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने जयललिता के सीएम बने रहने पर रोक लगा दी थी. छह महीने बाद ही पन्नीरसेल्वम ने सीएम पद जयललिता के लिए छोड़ दिया था. 2014 में एक बार फिर आय से अधिक संपत्ति मामले में जयललिता के दोषी पाए जाने पर पन्नीरसेल्वम ने अम्मा की तस्वीर के साथ सीएम पद संभाला था. सात महीने बाद ही पन्नीरसेल्वम ने इस्तीफा दे दिया और जयललिता फिर से सीएम बन गईं. उनको 'कठपुतली सीएम' भी कहा जाता है और कई ऐसे फोटो भी आए जहां पन्नीरसेल्वम जयललिता को दंडवत प्रणाम कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

जब कांग्रेस सरकार सत्ता में थी, तब भले ही सविंधान और कानून की नज़र में सोनिया गांधी एक साधारण सांसद थीं, लेकिन असल में वह ही सबकी मुखिया थीं. संजय बारू की किताब में इस बात का उल्‍लेख है कि एक आईएएस अफसर की यही जिम्‍मेदारी थी कि वे पीएमओ की महत्‍वपूर्ण फाइलों को 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी के घर ले जाएं. और उनसे सलाह लें.

यह पत्र यूपीए (PA) के पहले सत्र, वर्ष 2008 का है. तब सोनिया गांधी राय बरेली से एक सांसद थी. गौर करें कि वह मानव संसाधन मंत्री नहीं थीं, जिसके अंतर्गत सभी विश्वविद्यालय आ सकें. इसके बावजूद वह 'विश्वविद्यालयों के मामलों' से जुड़े मामलों में प्रधानमंत्री के हवाले से स्वयं पुष्टि किया करती थीं. यदी हम प्रक्रिया को जानें तो ये जिम्मेदारी मानव संसाधन मंत्रालय की थी.

इस पत्र में सोनिया गांधी गुजरात के एक विश्वविद्यालय को 'अनुदान की प्रारंभिक मंजूरी' देने की पुष्टी कर रही हैं. जबकि संविधान के अनुसार वह न ही ऐसा कर सकती थी और न ही उन्हें ऐसा करने का अधिकार प्राप्त था.

 

कार्टूनिस्ट अबू अबराहम का बनाया हुआ पूर्व राष्ट्रपति फकरुद्दीन का कार्टून

26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था. तत्कालीन राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर आधी रात को भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा की थी. उस दौरान के कार्टूनिस्ट अबू अबराहम ने फकरुद्दीन का ऑर्डिनेंस बिल पर साइन करते हुए कार्टून बनाया था, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया था.

मुख्‍यमंत्री राबड़ी देवी

लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया गया था. राबड़ी देवी के पास राजनीति का कोई अनुभव नहीं था. राबड़ी को पत्नी होने का लाभ मिला. राबड़ी देवी जब मुख्यमंत्री बनीं तो उनके चुनाव न लड़ने को लेकर भी सवाल उठे थे. बस राबड़ी को यह फायदा था कि जेल में बैठे लालू प्रसाद यादव उस समय उनको पॉलिटिक्स का क, ख, ग सिखा रहे थे. मुख्‍यमंत्री राबड़ी देवी जब लालू से मिलने जेल जाती थीं तो प्रोटोकॉल के तहत मुख्‍यमंत्री के साथ चलने वाला महकमा, जिसमें मुख्‍य सचिव और डीजीपी शामिल हैं, जेल के बाहर इंतजार करते थे.

सीएम आनंदीबेन पटेल

नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद गुजरात में सीएम सीट खाली थी. मोदी के बाद गुजरात में कोई ऐसा बड़ा नाम बीजेपी में नहीं था जो गुजरात को संभाल सके. ऐसे में आनंदीबेन पटेल को लाया गया जिनका नाम पहले ही किसी ने सुना हो, उनके आने के बाद गुजरात में कई ऐसी घटनाएं हुई जो मोदी के रहते नहीं हुई थी. पाटीदार आंदोलन, दलितों पर हमले, गौरक्षकों का आतंक, दलित आंदोलन जैसी घटनाएं गुजरात में आनंदीबेन के रहते हुईं जिससे गुजरात में बीजेपी कमजोर पड़ती दिखी. उन्होंने भी जल्द सीएम पद छोड़ना सही समझा.

सीएम अखिलेश यादव

नाम मुलायम सिंह का काम शिवपाल का, जिसमें अखिलेश यादव की भूमिका कठपुतली से कुछ बेहतर ही रहना थी. इसमें शक नहीं कि अखिलेश यादव ने साढ़े चार साल तक काफी कुछ काम अपने पिता की इच्छा को ध्यान में रखकर ही किए. इसमें कहीं-कहीं उनकी अपनी प्रतिष्ठा को चोट पहुंची तो उसे भी बर्दाश्त कर गए. कहा भी जाता है कि बड़ों के बीच अखिलेश फैसला लेने से पहले सलाह मशवरा लेते हैं. इस पूरे कार्यकाल के दौरान यूपी सरकार को 'साढ़े चार मुख्‍यमंत्री' वाली सरकार कहा जाता था. जिसमें आधा कद अखिलेश यादव का होता था.

सीएम मनोहर जोशी

शिव सेना ने 1995 में मनोहर जोशी को महाराष्ट्र का सीएम बनाया. उनको भले ही सीएम पद दे दिया हो पर पूरे महाराष्ट में शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे का ही आदेश माना जाता था. सीएम हाउस से सारी जानकारी बाल ठाकरे के पास उनके निवास मातोश्री जाती थी जिसके बाद फैसला बाल ठाकरे ही सुनाया करते थे. 

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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