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जानिए कैसे काम करता है कंपनियों का कार्टेल

    • राहुल मिश्र
    • Updated: 18 नवम्बर, 2015 07:34 PM
  • 18 नवम्बर, 2015 07:34 PM
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इंडस्ट्री एसोसिएशन कंपनियों को प्लैटफॉर्म मुहैया कराती है जहां कारोबारी फायदे के लिए उनका तालमेल बन जाता है. इसी तालमेल को पश्चिमी देशों में कार्टेल कहा जाता है और यह कार्टेल कंपनियों के लिए अतिरिक्त मुनाफे का पर्यायवाची बन चुका है. जानिए कैसे काम करते हैं ये कार्टेल..

आमतौर पर सभी इंडस्ट्री में एक एसोसिएशन मौजूद रहती है, जो उस इंडस्ट्री की कंपनियों को एक ऐसा प्लैटफॉर्म मुहैया कराती है जहां कारोबारी फायदे के लिए उनका तालमेल बन जाता है. इसी तालमेल को पश्चिमी देशों में कार्टेल कहा जाता है और यह कार्टेल कंपनियों के लिए अतिरिक्त मुनाफे का पर्यायवाची बन चुका है.

मुक्त व्यापार की धारणा के चलते किसी इंडस्ट्री की विरोधी कंपनियों में अपना मार्केट शेयर बढ़ाने के लिए बेहतर प्रोडक्ट को उचित दरों पर बेचने का एकमात्र जरिया है. इससे उपभोक्ताओं के लिए किसी भी प्रोडक्ट के कई विकल्प उचित दरों पर बाजार में उपलब्ध रहते हैं. लेकिन इंडस्ट्री एसोसिएशन के जरिए बन रहे यह कार्टेल उपभोक्ताओं के हितों को नजरअंदाज करते हुए अपनी जेब भरने के लिए काम करते हैं. इससे जहां बाजार में प्रोडक्ट की कीमत हमेशा डिमांड-सप्लाई के लॉजिक से अलग आसमान पर बैठी रहती है वहीं उपभोक्ताओं को बाजार में विकल्प नहीं मिलता और अक्सर उन्हें ऊंची दरों पर घटिया क्वॉलिटी का प्रोडक्ट खरीदना पड़ता है.

लिहाजा, यह जानना जरूरी है कि देश में यह कार्टल किस तरह काम करते हैं. आमतौर पर कंपनियों का ऐसा गठजोड़ चार स्तर पर काम करता है.

1. प्राइस फिक्सिंग- अक्सर किसी इंडस्ट्री की अग्रणी कंपनियां प्रोडक्ट की कीमत आम सहमति से निर्धारित करने की सहमति बन लेते हैं. ऐसे में सभी कंपनियां एक साथ प्रोडक्ट की कीमत कम या फिर ज्यादा करते हैं. साथ ही सभी कंपनियां प्रोडक्ट की सेल के लिए डिस्काउंट ऑफर लाने और हटाने का भी फैसला आम सहमति से करती हैं. इसके अलावा मार्केट से लो कॉस्ट प्रोडक्ट हटाने का भी फैसला आपस में मिलजुल कर किया जाता है.

2. मार्केट शेयरिंग- ऐसे में किसी एक इंडस्ट्री की सभी कंपनियां मार्केट को एरिया के आधार पर बांटकर आपस में उपभोक्ताओं का बंटवारा कर लेती हैं. यह स्थिति प्राइस फिक्सिंग की स्थिति से ज्यादा खतरनाक रहती है क्योंकि यहां उपभोक्ताओं को एक निश्चित प्रोडक्ट की खरीदने को मिलता है लिहाजा ऐसे बाजार में किसी तरह की प्रतियोगिता के लिए कोई जगह...

आमतौर पर सभी इंडस्ट्री में एक एसोसिएशन मौजूद रहती है, जो उस इंडस्ट्री की कंपनियों को एक ऐसा प्लैटफॉर्म मुहैया कराती है जहां कारोबारी फायदे के लिए उनका तालमेल बन जाता है. इसी तालमेल को पश्चिमी देशों में कार्टेल कहा जाता है और यह कार्टेल कंपनियों के लिए अतिरिक्त मुनाफे का पर्यायवाची बन चुका है.

मुक्त व्यापार की धारणा के चलते किसी इंडस्ट्री की विरोधी कंपनियों में अपना मार्केट शेयर बढ़ाने के लिए बेहतर प्रोडक्ट को उचित दरों पर बेचने का एकमात्र जरिया है. इससे उपभोक्ताओं के लिए किसी भी प्रोडक्ट के कई विकल्प उचित दरों पर बाजार में उपलब्ध रहते हैं. लेकिन इंडस्ट्री एसोसिएशन के जरिए बन रहे यह कार्टेल उपभोक्ताओं के हितों को नजरअंदाज करते हुए अपनी जेब भरने के लिए काम करते हैं. इससे जहां बाजार में प्रोडक्ट की कीमत हमेशा डिमांड-सप्लाई के लॉजिक से अलग आसमान पर बैठी रहती है वहीं उपभोक्ताओं को बाजार में विकल्प नहीं मिलता और अक्सर उन्हें ऊंची दरों पर घटिया क्वॉलिटी का प्रोडक्ट खरीदना पड़ता है.

लिहाजा, यह जानना जरूरी है कि देश में यह कार्टल किस तरह काम करते हैं. आमतौर पर कंपनियों का ऐसा गठजोड़ चार स्तर पर काम करता है.

1. प्राइस फिक्सिंग- अक्सर किसी इंडस्ट्री की अग्रणी कंपनियां प्रोडक्ट की कीमत आम सहमति से निर्धारित करने की सहमति बन लेते हैं. ऐसे में सभी कंपनियां एक साथ प्रोडक्ट की कीमत कम या फिर ज्यादा करते हैं. साथ ही सभी कंपनियां प्रोडक्ट की सेल के लिए डिस्काउंट ऑफर लाने और हटाने का भी फैसला आम सहमति से करती हैं. इसके अलावा मार्केट से लो कॉस्ट प्रोडक्ट हटाने का भी फैसला आपस में मिलजुल कर किया जाता है.

2. मार्केट शेयरिंग- ऐसे में किसी एक इंडस्ट्री की सभी कंपनियां मार्केट को एरिया के आधार पर बांटकर आपस में उपभोक्ताओं का बंटवारा कर लेती हैं. यह स्थिति प्राइस फिक्सिंग की स्थिति से ज्यादा खतरनाक रहती है क्योंकि यहां उपभोक्ताओं को एक निश्चित प्रोडक्ट की खरीदने को मिलता है लिहाजा ऐसे बाजार में किसी तरह की प्रतियोगिता के लिए कोई जगह नहीं रहती है.

3. आउटपुट रेस्ट्रिक्शन- ऐसे समझौते के तहत किसी एक क्षेत्र की कंपनियां उत्पादन को कम करने का फैसला कर लेती हैं. इस फैसले से बाजार में प्रोडक्ट की उपलब्धता प्रभावित होती है जिसके चलते कंपनियां मनमानी कीमत पर अपना प्रोडक्ट बेचते हैं.

4. बिड रिगिंग- ऐसा कदम किसी सरकारी या गैर-सरकारी टेंडर की स्थिति में उठाया जाता है. ऐसे में कंपनियां पहले से तय करके या तो टेंडर की एक ही बोली लगाती है या फिर क्रम के आधार पर कंपनियां टेंडर की फिक्सिंग कर लेती हैं.

 

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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