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Updated: 22 जुलाई, 2017 07:23 PM
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फेमिनिज्म. ये ऐसा शब्द जो न सिर्फ आज के तारीख में कई लोगों के लिए सिर का दर्द बन चुका है बल्कि अधिकतर लोगों को तो इसका असली मतलब भी नहीं पता. और मजेदार बात ये है कि इसमें उनका कोई दोष भी नहीं है! आखिर इस फेमिनिज्म शब्द का राज पहले मुर्गी आया या फिर अंडे की ही तरह है जिसमें लोग ये समझ ही नहीं पाते की विरोध किस बात का करना है और किसका नहीं. और फिर इस शब्द का लोगों ने इतना बेड़ा गर्क कर दिया है कि अब इसके असली मतलब क्या है ये खुद ही किसी रॉकेट साइंस की तरह का कठिन सवाल बन गया है. चलिए तो हम सारे झंझट को खत्म कर देते हैं और आपको बताते हैं कि आखिर फेमिनिज्म वास्तव में है क्या? आप तो जानते ही हैं कि ये स्त्री और पुरूष के बीच के प्राकृतिक अंतर को दरकिनार करते हुए समान अधिकारों की बात करता है. इसका सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि चाहे जो भी हो जाए पुरुष और महिला बराबर हैं.

हालांकि ये उतना भी आसान नहीं है. कभी-कभी जब महिलाएं बराबरी की बात करती हैं तो ये भूल जाती हैं कि हर चीज हमारी ही सुविधा के अनुसार नहीं होती. हमारी सुविधानुसार नियम और शर्तों को लागू नहीं किया जा सकता है.

आप जानते हैं कि सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए फेमिनिज्म शब्द का उपयोग करने से क्या साबित होता है? Pseudo feminist यानी आप फेमिनिस्ट होने का दिखावा करते हैं. हम यहां 'फेमिनाज़ी' के बारे में बात नहीं कर रहे हैं, तो क्या बातें आपको दिखावटी फेमिनिस्ट बनाते हैं जानिए वो बातें:

Feminism, Womanफेमिनिज्म के नाम पर फेक होना बंद कीजिए

फेमिनिज्म का दिखावा करने वाले कभी फेमिनिज्म वाले काम नहीं करते-

बहुत मुमकिन है कि आपने शहर में हुए हर विरोध में हिस्सा लिया हो, गले फाड़-फाड़कर नारे लगाए हों. लेकिन क्या इतने से आप एक फेमिनिस्ट हो जाती हैं? नहीं. बिल्कुल नहीं.

जब आप अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ती हैं और सिर्फ अपने दोस्तों के सामने कूल दिखने के लिए फेमिनिज्म शब्द का प्रयोग करते हैं तो खुद-ब-खुद आप एक दिखावटी फेमिनिस्ट बन जाती हैं. आपको समान अधिकार चाहिए, है ना? तो फिर क्यों न इस लड़ाई को हकीकत में लड़ा जाए. सिर्फ कहने भर के लिए बराबरी की लड़ाई लड़ना असली लड़ाई नहीं होती.

गंदगी साफ करने के लिए आपको कीचड़ में उतरना होगा और उसे साफ करना होगा.

अपने आस-पास के सेक्सिज्म से आंखें मूंद लेना-

अगर आप अपने परिवार में, यहां तक ​​कि खुद में गहरे तक पैठ जमाए सेक्सिज्म की अनदेखी करते हैं, तो बड़े ही अफसोस के साथ मुझे ये कहना पड़ेगा कि आप दिखावटी फेमिनिस्ट हैं. लेकिन उसके पहले आपको ये जानना होगा कि सेक्सिज्म आखिर है क्या.

जब आपका ब्यॉयफ्रेंड या आपके दोस्त आपको कहते हैं कि लड़कियों को गाड़ी नहीं चलानी चाहिए क्योंकि 'लड़कियां ड्राइव नहीं कर सकतीं', तो क्या आप उनका विरोध करते हैं? या फिर क्या आप ऐसी बातों को हंसी में उड़ा देती हैं और चुपचाप उनकी बात से सहमत हो जाते हैं? क्या आपको यहां कोई प्रॉब्लम दिखती है? हम समझ सकते हैं कि ऐसी बात सिर्फ एक मजाक है, जिसे मजाक के रूप में ही लिया जाना चाहिए. लेकिन हम आपको साफ-साफ बता देते हैं कि सेक्सिज्म कभी भी मजाकिया नहीं होता.

जब आप ऐसी चीजों पर हंसते हैं, तो दरअसल आप समाज की उस गहरी सोच में अपना योगदान करते हैं जिससे ये त्रस्त है. चाहे वो आपके माता-पिता हों, भाई-बहन, दोस्त या फिर खुद आप- सेक्सिज़्म, सेक्सिज्म ही होता है. आपको याद तो होगा ही जब इवांका ट्रम्प ने महिलाओं के मुद्दे पर अपने पिता डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन किया था. तब बहुत गुस्सा आया होगा ना? इसलिए इवांका ट्रम्प मत बनिए.

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सिर्फ फेमिनिज्म के नाम पर किसी भी बात पर उंगली ना उठाएं-

मान लीजिए कि आपकी गर्ल गैंग ने सिर्फ इसलिए आपका मजाक बनाया क्योंकि आप सेक्सी कपड़े नहीं पहनतीं तो कोई दिक्कत नहीं है. ये बिल्कुल भी सेक्सिस्ट बयान नहीं है. लेकिन अगर आपने उस बात को दिल पर ले लिया और जवाब में कहा- 'लेकिन दोस्त ये फेमिनिज्म नहीं है' तो आपने अपना मजाक खुद ही बना लिया.

आपको पता है ये सिर्फ एक फैशन के लिए सलाह थी. हो सकता है कि ये सलाह कुछ कठोर लहजे में दिया गया हो, लेकिन इसका मकसद आपको नीचा दिखाना कतई नहीं था.

चलिए हम आपको एक और उदाहरण देते हैं. क्या आपने कभी किसी को किसी महिला का मजाक बनाने या उसपर भद्दे कमेंट करने के लिए झाड़ लगाई है, लेकिन शर्टलेस आदमियों के लिए खुद वही कमेंट आपने पास किए हों? अगर हाँ तो यही होता है फेमिनिज्म का दिखावा करना. अगर आपको लगता है कि महिलाओं के शरीर को लेकर भद्दे कमेंट करना गलत है तो उसी तरह पुरुषों के शरीर पर भी कमेंट करना गलत है.

दूसरे की पसंद आपकी पसंद से ना मिले तो दिक्कत-

एक मजबूत स्वतंत्र महिला होने का मतलब हम समझते हैं, जो अपनी रोटी खुद कमाती हैं और इस पर गर्व करती हैं. लेकिन अगर कोई महिला गृहिणी होना चुनती है तो उसे एक कमतर महिला नहीं माना जा सकता. लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब आप दूसरों के पसंद-नापंसद के बिनाह पर उनके बारे में अपनी राय बनाने लगते हैं. ये पूरी तरह से उनका फैसला है कि अपने लिए वो गृहिणी बनना पसंद करती है या फिर एक कामकाजी महिला होना चुनती है.

सिर्फ इसलिए कि उसकी पसंद आपके पसंद से मेल नहीं खाती वो गलत साबित नहीं हो जाती. आप को पता होगा कि हर किसी को अपना करियर बनाने लायक पढ़ाई नसीब हो जरुरी नहीं. कुछ लोग जितना चाहें उतनी पढ़ाई कर सकते हैं लेकिन नौकरी नहीं करना चाहते, ये भी उनकी ही पसंद है. हां, अगर कोई उन्हें उनकी नौकरी छोड़ने के लिए विवश करता है तब दिक्कत है.

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पुरुषों के भी रेप होते हैं ये बात मानने से इंकार करना-

जी हां, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि समाज क्या सोचता है, लेकिन ये एक कड़वी सच्चाई है कि पुरुषों के भी बलात्कार होते हैं. भले ही कानून की नजरों में ये सच्चाई न हो लेकिन पीड़ित के लिए ये एक कड़वी सच्चाई है. आप जानते हैं क्यों? क्योंकि यौन अपराध किसी जेंडर के द्वारा परिभाषित नहीं होते हैं.

इसी तरह अगर कोई पुरुष रोता है या फिर अपनी भावनाओं को दिखाता है तो इसका मतलब ये नहीं कि वो कमजोर है. आखिरकार हमारे यहां महिलाओं की तरह पुरुषों पर भी एक डिफाइन्ड तरीके से रहने और व्यवहार करने का दबाव होता है. इसलिए अगर कोई पुरुष संवेदनशील नहीं है तो इसका ये मतलब नहीं है कि वो कमजोर है. वो भी हर इंसान की तरह ही एक आम इंसान है और उसे भी अपने ढंग से व्यवहार करने का पूरा अधिकार है.

तो इसलिए अब आगे से आपर पागल मत बनिए और फर्जी फेमिनिज्म के झंडे मत बुलंद कीजिए. इस शब्द को समझें, इसके बारे में थोड़ा पढ़ें और सबसे महत्वपूर्ण बात इसे किसी हथियार की तरह प्रयोग न करें.

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