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सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |   16-02-2017

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के कुख्यात बाहुबली पूर्व सांसद मोहम्महद शहाबुद्दीन को सीवान जेल से दिल्ली की तिहाड़ जेल शिफ्ट करने का आदेश दे दिया है. ये महज संयोग ही है कि शहाबुद्दीन ऐसे दूसरे कुख्यात राजनेता है जिन्हें बिहार के जेलों से दिल्ली के तिहाड़ जेल शिफ्ट करने का आदेश कोर्ट ने दिया है. इससे पहले सांसद पप्पु यादव को पटना के बेउर जेल से दिल्ली के तिहाड जेल में शिफ्ट किया गया था. वो भी सुप्रीम कोर्ट का आर्डर था और ये भी सुप्रीम कोर्ट का ही आर्डर है. पप्पु यादव को सुप्रीम कोर्ट ने 14 फरवरी 2005 को तिहाड शिफ्ट करने का आदेश दिया था जबकि शहाबुद्दीन को ठीक 12 साल एक दिन बाद 15 फरवरी को बिहार सरकार को एक सप्ताह के अंदर तिहाड़ भेजने की व्यवसाथा करने का आदेश दिया है.

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इतिहास अपने आप को दोहराता है. पप्पु यादव को भी यही आदेश मिला था कि एक हफ्ते के अंदर तिहाड़ शिफ्ट किया जाए. फर्क सिर्फ इतना है कि 2005 में जब सुप्रीम कोर्ट ने पप्पु यादव को शिफ्ट करने का आदेश दिया था उस समय बिहार में विधानसभा के चुनाव चल रहे थे. उस समय शासन तो चुनाव आयोग का था लेकिन ज्यादा प्रभाव लालू और राबडी के 15 वर्ष के शासन का था. अब बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की सरकार है. हांलाकि उस समय स्पष्ट जनादेश न मिलने के कारण चुनाव आयोग को फिर से उसी साल 2005 अक्टूबर में चुनाव कराना पडे थे, उसके बाद बिहार में नीतीश कुमार का शासन आया जो अबतक जारी है. पर 12 साल के इस अंतराल में क्या वाकई कुछ नहीं बदला. सुप्रीम कोर्ट को फिर आदेश देना पड़ा कि शहाबुद्दीन को तिहाड़ शिफ्ट किया जाए. जैसे पप्पु यादव को किया था.

2005 नवंबर में जब नीतीश कुमार की सरकार आई थी तो सबसे पहले आरजेडी के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन पर कार्रवाई हुई थी. 11 सालों तक वो सलाखों के पीछे रहा. लेकिन इसमें 10 सालों तक किसी ने शहाबुद्दीन की चर्चा तक नहीं सुनी. लेकिन बिहार में राजनैतिक परिस्थियां बदलते ही शहाबुद्दीन की चर्चाएं शुरू हो गईं. जेल में उनके दरबार की चर्चा मुलाकातियों की चर्चा, और इस बीच में घटनाएं भी हुईं. सीवान में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या हो गई. शहाबुद्दीन को एक-एक कर सभी मामलों में जमानत मिलती गई. सरकार ने शहाबुद्दीन की जमानत याचिका रदद् कराने में वो रूचि नहीं दिखाई. जब पीडित परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई तब सरकार की नींद खुली. ये तमाम बातें सोचने पर मजबूर करती हैं.

इन 12 वर्षों का आंकलन करें तो नीतीश कुमार के 2005 में सत्ता संभालने के बाद बिहार में स्थितियां बदली थीं. शहाबुद्दीन भी जेल गए और लम्बे समय के लिए गए. बिहार में कानून का राज चला 93 हजार अपराधियों को स्पीडी ट्रायल करा कर जेल भेजा गया. अपराध का ग्राफ नीचे गिरा. लोग अमन चैन से रहने लगे. 2010 में फिर नीतीश कुमार भारी मतों से चुने गए, जनता ने उन पर विश्वास कर भरपूर समर्थन दिया. लेकिन इसके बावजूद इसे पुलिस की कमजोरी कहें या फिर कोर्ट का फैसला कि एक-एक कर सारे आरोपी जेल से बाहर आते गए. 2005 के शासन में जो पकड़ थी वो 2010 में ढीली पड़ती गई. इसकी वजह राजनीति कहें या फिर कुछ और, इस बीच राजनीति ने भी अपना पूरा रंग दिखाया. जनता दल यू और बीजेपी का गठबंधन टूटा. जीतनराम मांझी की सरकार बनी फिर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और 2015 में महागठबंधन बना जिसमें नीतीश कुमार की पार्टी के साथ साथ लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लडा. जनता ने फिर नीतीश कुमार पर अपना विश्वास दिखाया और बिहार में नए युग की शुरूआत हुई. जनता आरजेडी से थोडी डरी थी लेकिन नीतीश कुमार ने विश्वास दिलाया कि उनके रहते कुछ नहीं होगा. महागठबंधन की सरकार बनी और उसके बाद पहिया फिर घूमकर वहीं पहुंच गया जहां 12 वर्ष पहले था. सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पडा कि आरजेडी के बाहुबली पूर्व सांसद को दिल्ली के तिहाड जेल शिफ्ट किया जाये.

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सुप्रीम कोर्ट ने चंदा बाबू और पत्रकार राजीव रंजन की पत्नी आशा रंजन की अपील पर बिहार से बाहर की जेल में शहाबुद्दीन को ट्रांसफर करने का फैसला सुनाया और बिहार सरकार से कहा कि वह उन्हें तिहाड़ भेजने का इंतजाम करे. ऐसे में एक बार 10 सितंबर, 2016 की वह तस्वीार जेहन में कौंधती है, जब शहाबुद्दीन को भागलपुर कैंप जेल जमानत पर रिहा किया गया था. वह शनिवार की सुबह थी और जेल के बाहर कई चमचमाती गाड़ियां और झक सफेद लिबास पहने नेता बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, शहाबुद्दीन का. सैकड़ों गाड़ियों का काफिला जुलूस की शक्ल में निकला, रास्तों के सारे टोल नाके खोल दिए गए थे. तब मीडिया से बातचीत में शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार को ‘परिस्थितिजन्य मुख्यममंत्री’ कह दिया था.

शहाबुद्दीन 11 साल से कई आपराधिक मामलों में बिहार के जेलों में बंद थे. लेकिन इस बीच कभी भी शहाबुद्दीन को सीवान से शिफ्ट करने की मांग नहीं उठी. उनके वकील अभय कुमार रंजन के मुताबिक पांच अपराधिक मामले में निचली अदालत से शहाबुद्दीन को सजा हो चुकी है. 2014 में सीवान में हुई राजीव रोशन हत्या कांड में पटना उच्च न्यायालय ने 7 सितंबर 2016 को जमानत मंजूर कर ली.

शहाबुद्दीन पर कुल 26 मामले अंतिम सुनवाई के लिए अदालत में लंबित है. इन सभी में इनको जमानत मिल चुकी है. इनमें 9 मामले वे भी हैं जो फैसले के खिलाफ दायर आपराधिक अपील है. 16 अगस्त 2004 को सीवान के चंद्रशेखर प्रसाद के दो पुत्र गिरीश और सतीश का अपहरण उनके गौशाला रोड स्थित मकान से कर लिया गया था. उन दोनों को प्रतापपुर गांव लाया गया और तेजाब उड़ेल दिया गया. नतीजतन दोनों की मौत हो गई थी. इनका तीसरा भाई राजीव रंजन भागने में सफल रहा. यह इन दोनों हत्या का चश्मदीद था. जिसकी हत्या 14 जून 2014 में सीवान में ही कर दी गई. इसी मामले में बंदी थे. उसी में जमानत पटना उच्च न्यायलय से मिली थी. जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था. उससे ठीक पहले 13 मई को सीवान में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या हुई थी. इस मामले में शहाबुद्दीन का कितना हाथ है, इसकी जांच सीबीआई कर रही है. लेकिन जमानत रदद होने बाद भी शहाबुद्दीन को सीवान जेल में ही रखा गया. पीडित चंदा बाबू और पत्रकार की पत्नी आशारंजन ने बार-बार ये कहा कि सीवान जेल में शहाबुद्दीन को रखने से उनकी जान को खतरा है लेकिन सरकार ने इन्हें अनसुना कर दिया.

हांलाकि रौशन और राजदेव रंजन हत्याकांड के समय शहाबुद्दीन सीवान जेल के अंदर थे. उनके वकील अदालत में ये दलील देते है. 1996 से 2004 तक सीवान से चार दफा लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी की टिकट पर चुनाव जीत सांसद बने शहाबुद्दीन बिहार पुलिस की सूची का ए क्लास हिस्ट्रीशीटर है. ऐसे में महागठबंधन की सरकार उन्हें सीवान से कैसे शिफ्ट करती अंत में सुप्रीम कोर्ट को ही फैसला लेना पडा. रही बात पप्पु यादव की तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने सीपीएम के पूर्णिया विधायक अजित सरकार हत्याकांड के आरोप में दिल्ली के तिहाड जेल शिफ्ट करने का आदेश दिया था. लेकिन पप्पु यादव अब उस मामले से बरी हो चूके हैं. पीडित परिवार सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से खुश है कि अब वो बिना खौफ के सीवान में रह सकेंगे. लेकिन बिहार के लिए यह दुर्भाग्य है कि फिर एक बार लोगो में शासन को लेकर अविश्वास क्यों हो रहा है.

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लेखक

सुजीत कुमार झा सुजीत कुमार झा @suj.jha

लेखक आजतक में पत्रकार हैं

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