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सियासत

 |  5-मिनट में पढ़ें  |   15-07-2017
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महागठबंधन के आम के दाम मिल चुके हैं, बस गुठली के बचे हुए हैं. फिलहाल उसी का वसूली अभियान चल रहा है. अब तक आपने आम एपिसोड देखा, अब आगे गुठली एपिसोड है. गुठली में दम भी काफी है और दाम भी भारी है. सीधी सी बात है कोई छोड़े भी तो क्यों?

फिलहाल तो ऐसा लग रहा है कि महागठबंधन पर कोई खतरा नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे तेजस्वी के तात्कालिक राजनीतिक भविष्य का फैसला लिखा जा चुका है. सामने आने से पहले, बस थोड़ी हेर फेर और समीक्षा के दौर से गुजर रहा है.

नेमप्लेट में क्या रखा है

तेजस्वी के इस्तीफे की मांग के बावजूद उस दिन वो कैबिनेट की मीटिंग में पहुंचे थे. बाहर निकले तो बड़ी ही मासूमियत से समझाने की कोशिश की - भला बिना मूंछों के कोई लड़का ऐसा घपला कर सकता है क्या? मीडिया ने कुछ और भी सवाल-जवाब किये तो पत्रकारों को गुंडा बताते हुए तेजस्वी के लोग टूट पड़े. बाद में सफाई देने के अंदाज में तेजस्वी ने एक वीडियो शेयर कर अपने को पाक साफ बताने की कोशिश भी की.

हाल फिलहाल लालू प्रसाद और उनके परिवार के खिलाफ लगातार आक्रामक रहे बीजेपी नेता सुशील मोदी ने एक ट्वीट किया - जिसमें निर्भया के बलात्कारी का जिक्र तो था लेकिन किसके लिए ये नाम नहीं था.

कैबिनेट मीटिंग के बाद ये पहला मौका था जब तेजस्वी को किसी सरकारी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ शामिल होना था. कार्यक्रम से काफी पहले ही सस्पेंस का माहौल बन गया.

tejashwi yadav name on invitationकार्ड तो पहले ही छप चुके थे...

निमंत्रण पत्र पर नाम तो था ही, मंच पर नेम प्लेट भी लग चुका था. पहले तो नेमप्लेट ढक दिया गया लेकिन जब तेजस्वी के नहीं आने की बात कंफर्म हो गयी तो उसे हटा लिया गया.

tejashwi name plateऔर नेमप्लेट...

कार्यक्रम में नीतीश कुमार तो आये लेकिन तेजस्वी ने खुद न आकर कयासों, चर्चाओं और सवालों की लंबी फेहरिस्त छोड़ दी. सबसे बड़ा सवाल तो यही कि क्या अब तेजस्वी का इस्तीफा पक्का है? अगर तेजस्वी का इस्तीफा पक्का है तो क्या रोहिणी आचार्य ही तेजस्वी की जगह लेंगी या कोई और? रोहिणी लालू प्रसाद की छोटी बेटी हैं जिन पर मीसा की तरह न तो किसी भ्रष्टाचार के दाग हैं न राजनीति से कोई सक्रिय वास्ता है. हां, पटना के लोग उनकी शादी जरूर याद रखते हैं जब शो रूम से नई नई गाड़ियां उठाकर बारात के स्वागत में लगा दी गयी थीं.

महागठबंधन का रोहिणी फॉर्मूला प्लान बी, सी और डी में से कौन है कहना मुश्किल है. जब जेडीयू की ओर से तेजस्वी के इस्तीफे का दबाव बढ़ाया गया तो इस बात की चर्चा होने लगी कि आरजेडी के सभी मंत्री इस्तीफा दे देंगे. अब लालू ने खुद ऐसी बातों को बकवास बता डाला है. कसमें, वादे प्यार वफा - ये सब राजनीति में भी बातें हैं बातों का क्या!

गुठली अभी बाकी है!

महागठबंधन के आम और गुठली के किस्से में नजर तो यही आ रहा है कि सारी कवायद गुठली पर जा टिकी है. आम तो पूरा चूसा जा चुका है. शायद ये ऐसा आम है जिसकी गुठली में भी काफी रस है.

वैसे नीतीश कुमार और उनकी टीम की ताजा गतिविधियों को देखें तो ऐसा लगता है उन्हें गुठली से कोई परहेज तो नहीं लेकिन ज्यादा दिलचस्पी भी नहीं है. हो सकता है सोनिया गांधी की सक्रियता की वजह से अपनी रणनीति में थोड़ी बहुत तब्दीली कर लें. अब तक नीतीश वे सारी तरकीबें अपना रहे थे जिनकी मंजिल प्रधानमंत्री की कुर्सी होती. बिहार चुनाव के बाद नीतीश ने असम में महागठबंधन खड़ा करने की कोशिश की. बात नहीं बनी क्योंकि कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने अड़ंगा लगा दिया. यूपी में तो नीतीश ने असम से कहीं ज्यादा प्रयास किये, लेकिन आखिर में सब छोड़ कर पटना में बैठ गये. यहां तक कि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भी उन्होंने पहल की. ये पहल भी असल में 2019 के लिए रिहर्सल थी. जब नीतीश को लगा कि कांग्रेस ही उनके विपक्ष के सर्वमान्य नेता बनने में बाधा बन रही है तो उन्होंने गच्चा दे दिया. ये मौका भी ऐसा था जो काफी असरदार साबित हुआ.

ऐसा देखा जाये तो नीतीश के मौजूदा हर कदम बुरी तरह फंसे लालू प्रसाद को सिमटे रहने को मजबूर करने और कांग्रेस को अपनी अहमियत समझाने जैसे इशारे कर रहा है.

संभव है नीतीश कुमार को भी लगने लगा हो आम तो पूरा चूसा ही जा चुका है - और गुठली में उनकी कोई दिलचस्पी न हो. इसलिए नीतीश कुमार इस वक्त सिर्फ और सिर्फ अपनी इमेज पर फोकस कर रहे हैं - जिसे उनकी टीम नये सिरे से गढ़ने में जुटी हुई है.

जिन परिस्थितियों में ये गठबंधन बना, कहना मुश्किल होगा कि किसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी? चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि ये सभी के लिए संजीवनी बूटी ही साबित हुआ. ये भी बहुत महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस ने ही इस गठबंधन को अमलीजामा पहनाया था - और अब भी कांग्रेस ही पैबंद भी लगा रही है.

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