स्पोर्ट्स

 |  5-मिनट में पढ़ें  |   08-09-2016
आईचौक
आईचौक
  @iChowk
  • Total Shares

इसमें कोई शक नहीं कि उसेन बोल्ट जब रेस की ट्रैक पर होते हैं तो उनका जलवा देखने के लिए पूरी दुनिया थम जाती है. बोल्ट को दौड़ते देखना किसी रोमांच से कम नहीं. हाल ही में रियो ओलंपिक में सबने उनका जलवा देखा भी. लेकिन क्या आपने आयरलैंड के जेसन स्मिथ, अमेरिका के जेरिड वालेस या क्यूबा की ओमारा ड्यूरंड को दौड़ते देखा है? ये तीनों भी बोल्ट की तरह ही 100 मीटर इवेंट के चैंपियन हैं. लेकिन बोल्ट से बिल्कुल अलग और बेहद खास.

जेसन स्मिथ को ठीक से दिखाई नहीं देता. 2008 के बीजिंग पैरालंपिक में स्मिथ ने दो गोल्ड मेडल अपने नाम किए. पहला पुरुष 100 मीटर टी-13 और दूसरा 200 मीटर टी-13 वर्ग में.

blind0650_090816052000.jpg
 बीजिंग पैरालंपिक में गोल्ड जीतने वाले जेसन स्मिथ

जेरिड वालेस का दायां पैर नहीं है और वो अपने वर्ग में 100 मीटर रेस के विश्व रिकॉर्ड धारक हैं. पिछले साल टोरंटों में एक इवेंट में उन्होंने 100 मीटर के लिए 10.71 सेकेंड निकाला.

runner-1-650_090816052127.jpg
 कृत्रिम पैर से ट्रैक में चुनौती देते हैं वालेस

जबकि क्यूबा की ओमारा भी जेसन स्मिथ की तरह नेत्रहीन हैं, लेकिन 2012 के लंदन पैरालंपिक में उन्होंने 100 मीटर टी-13 और 400 मीटर टी-13 वर्ग में गोल्ड मेडल जीता.

blind--2-650_090816052211.jpg
 नेत्रहीन हैं ओमारा लेकिन फिर दौड़ने में कोई सानी नहीं

इन तीनों की चर्चा इसलिए कि ब्राजील के रियो डी जनेरो की सड़कों का रंगरूप बदला-बदला नजर आने लगा है. कुछ दिनों पहले तक ओलंपिक रिंग्स से पटा इस शहर पर अब अगिटोस के सिंबल नजर आने लगे हैं. अगिटोस- एक लैटिन भाषा का शब्द जिसका अर्थ होता है 'आई मूव'. ये पैरालंपिक खेलों का चिन्ह है. मतलब, ओलंपिक के समकक्ष एक ऐसा आयोजन जिसमें विशेष रूप से सक्षम एथलीट हिस्सा लेते हैं.

paralympics-650_090816051736.jpg
 पैरालंपिक का शुभंकर..

वैसे, ये बात भी सही है कि पैरालंपिक्स के जज्बे का तो हम सब सम्मान करते हैं लेकिन इसकी लोकप्रियता और इसे लेकर कोई खास लगाव नहीं है. जो खेल भावना और स्पोर्ट्स कल्चर की बात करते हैं, उनके लिए भी इससे खुद को जोड़ना मुश्किल लगता है. तभी तो #FillTheSeats अभियान चलाने की जरूरत पड़ जाती है ताकि टिकटों की बिक्री में थोड़ी बढ़ोत्तरी आए. तो वहीं कई देशों में इन खेलों के लाइव प्रसारण की भी सुविधा नहीं है. इनमें भारत भी शामिल है.

यह भी पढ़ें- रियो में पाया कुछ भी नहीं , खोया सबकुछ

इन सब चुनौतियों के बावजूद यहां एक से बढ़कर एक कई ऐसे खिलाड़ी मिल जाएंगे जिनकी कहानी तो दिल तोड़ने वाली है लेकिन उनकी हिम्मत हर किसी के जज्बे को नई राह दिखा जाएगी. भारत के जैवलिन थ्रोअर (भाला फेंक) देवेंद्र झाझरिया का ही उदाहरण लीजिए.

devendra_090816052758.jpg
 जैवलिन थ्रो करते देवेंद्र

महज आठ या नौ साल की उम्र में ही इनका बायां हाथ बिजली का करंट लगने से बेकार हो गया. उसे अलग करना पड़ा. लेकिन जैवलिन थ्रो का वर्ल्ड रिकॉर्ड उनके नाम है. ऐसे ही बिहार के शरद पैरालंपिक में हाई जम्प में भारत की ओर से चुनौती पेश कर रहे हैं. 2 साल की उम्र में ही शरद के पैर में पैरालाइसिस हो गया था.

कब और कैसे शुरू हुआ पैरालंपिक

पैरालंपिक खेलों की शुरुआत का श्रेय पैरालंपिक मूवमेंट को जाता है. दूसरे विश्व युद्धा के बाद 1948 में लंदन में ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ. इधर ब्रिटेन के एक डॉक्टर लुडविंग गटमेन को भी एक आइडिया आया. उन्होंने अपने अस्पताल में व्हीलचेयर एथलीट्स के लिए कुछ प्रतियोगिताएं आयोजित करवाईं. इसमें द्वितीय विश्व युद्ध में घायल हुए कुछ सैनिकों ने हिस्सा लिया. धीरे-धीरे ये एक बड़ा मूवमेंट बन गया. इसके बाद रोम में 1960 में हुए ओलंपिक गेम्स के ठीक एक हफ्ते बाद पहली बार पैरालंपिक खेल आयोजित कराए गए. 1964 के टोक्यों ओलंपिक के बाद भी यही हुआ.

यह भी पढ़ें- रियो की यह 5 लापरवाही जारी रही तो आगे मेडल मिलना नामुमकिन

लेकिन 1968 में मेक्सिको ने ओलंपिक के बाद पैरालंपिक खेलों की मेजबानी से मना कर दिया. इसके बाद 1988 में ये खेल इजरायल के तेल अवीव शहर में आयोजित हुए. उसके बाद तो ये चलन ही चल पड़ा. पैरालंपिर खेल ओलंपिक की मेजबान करने वाले शहरों से अलग कहीं और आयोजित किए जाते. लेकिन 1988 में चीजें बदली. सियोल में तब ओलंपिक के बाद उन्हीं जगहों पर पैरालंमिक खेल आयोजित किए गए और तब से ऐसा ही हो रहा है. 2001 में ये आधिकारिक हो गया कि जो शहर ओलंपिक की मेजबानी करेगा उसे ही पैरालंपिक की भी मेजबानी करनी होगी.

दरअसल, ओलंपिक और पैरालंपिक दोनों अलग हैं और दोनों की गवर्निंग बॉडी भी. पैरालंपिक गोम्स के लिए इंटरनेशनल पैरालंपिक कमेटी काम करती है जबकि इंटरनेशल ओलंपिक कमेटी पर ओलंपिक खेलों के आयोजन की जिम्मेदारी है.

पैरालंपिक में भारत

ओलंपिक खेलों के व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत को पहला गोल्ड मेडल 2008 में मिला था. तब कमाल अभिनव बिंद्रा ने किया था. लेकिन पैरालंपिक में भारत इस मामले में कहीं बेहतर है. व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत को पहला गोल्ड 2004 में ही मिल गया था. ऐथेंस में हुए उस पैरालंपिक के भाला फेंक में देवेंद्र झाझरिया ने भारत को तब गोल्ड मेडल दिलाया था. देवेंद्र रियो पैरालंपिक में भी हिस्सा ले रहे हैं. ये उनका चौथा पैरालंपिक होगा.

indian-team-paralymp_090816052416.jpg
 रियो भारतीय पैरालंपिक दल

गौरतलब है कि भारत ने पैरालंपिक खेलों में अब तक आठ मेडल हासिल किए हैं. इसमें दो गोल्ड, तीन सिल्वर और तीन ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं.

ओलंपिक की तरह पैरालंपिक में भी भारत ने इस बार अपना सबसे बड़ा दल भेजा है. 19 पैरा-एथलीट रियो में है जो 18 सितंबर तक चलने वाले पैरालंपिक गेम्स के 10 अलग-अलग वर्गों में भारत की दावेदारी पेश करेंगे.

यह भी पढ़ें- क्या एथलीट शांति सौंदाराजन को 10 साल बाद मिल पाएगा न्याय?

लेखक

आईचौक आईचौक @ichowk

इंडिया टुडे ग्रुप का ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय