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 |  5-मिनट में पढ़ें  |   19-09-2017
श्रुति दीक्षित
श्रुति दीक्षित
  @shruti.dixit.31
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हर कोई यूपीए और एनडीए सरकार के दौर में रही क्रूड ऑडल की कीमत की तुलना कर रहा है. वॉट्सएप, फेसबुक, ट्विटर पर हर कोई अपना गणित लगाने पर तुला हुआ है. अपनी गणित का परिचय देते हुए सभी ने पेट्रोल की कीमतों को बता दिया. आधे लोग इस बात पर जोर दे रहे हैं कि पेट्रोल पर जीएसटी लगा दिया जाए. क्योंकि इससे पेट्रोल 38 रुपए तक हो जाएगा. पहली बात तो ये सिर्फ दिमागी तौर पर संभव है.. क्यों? उसकी गणित नीचे देख लीजिए. और दूसरा ये कि इससे भी देश को कोई खास फायदा नहीं होगा, बल्कि नुकसान ही होगा.

मौजूदा पेट्रोल कीमतें और सरकार का फायदा...

केंद्र सरकार की तरफ से एक्साइज ड्यूटी पेट्रोल और डीजल पर लगाई जाती है. ये सभी को पता है. PPAC (पेट्रोलियम प्लानिंग और एनालिसिस सेल) के अनुसार 2014 से ये ड्यूटी 54 प्रतिशत तक बढ़ा दी गई है. डीलर की कमीशन भी 73 प्रतिशत तक बढ़ गई है. (इसे ज्यादा न समझिए 73% बढ़ने के बाद भी ये 3-5 रुपए के बीच ही है)

पेट्रोल, मोदी सरकार, डीजल, अरुण जेटली

खैर, डीजल में ये एक्साइज ड्यूटी 154 प्रतिशत तक बढ़ गई है. वैट 48 प्रतिशत और डीलर की कमीशन 73 प्रतिशत बढ़ गई है. ये 2014 से लेकर अभी तक 12 बार बढ़ाई गई है.

डीलर कमीशन लगाकर भी बिना एक्साइज ड्यूटी के पेट्रोल की कीमत कुछ 33 - 35 रुपए के आस-पास होगी. (इस कीमत में कोई टैक्स नहीं लगा है)

अगर जीएसटी लग गया पेट्रोल पर तो....

अगर अब जीएसटी की बात करें तो 28-30 रुपए मान लिया रिफाइनरी से कीमत होती है पेट्रोल की. (ये हाल में 29.30 है). अब डीलर कमीशन तो जुड़ेगी ही इसमें तो वो 3-5 रुपए. कुल पेट्रोल की कीमत 33 रुपए मान लेते हैं हम.

अगर जीएसटी 12% के हिसाब से लगा तो पेट्रोल 38.1 रुपए हो जाएगा (दिल्ली में), 18% के हिसाब से लगा तो 41 रुपए और अगर 28% लगा तो 44 रुपए तक पहुंच जाएगा. अब अगर इसपर सेस भी लगाया गया जो कि उम्मीद की जा रही है कि लगेगा तो ये कीमत कुछ 51-52 रुपए के बीच आ जाएगी यानि अभी के रेट से 20 रुपए सस्ता.

यही गणित डीजल में भी लगेगा और डीजल की कीमत 10-12 रुपए कम हो जाएगी. सारे गणित सही हैं. बिलकुल सरकार को फायदा हो रहा है, लेकिन सरकार का ये फैसला खराब पॉलिटिक्स हो सकती है, लेकिन खराब इकोनॉमिक्स नहीं.

अगर 40 रुपए हो गया पेट्रोल तो?

1. पेट्रोल की खपत बहुत बढ़ जाएगी....

पेट्रोल खरीदने में भारत की करंसी का अधिकतर हिस्सा जाता है. ये एक्सचेंज रेट के हिसाब से होता है. विदेशी मुद्रा यानि डॉलर में पेट्रोल खरीदा जाता है. हर दिन भारत में लगभग 9.5 करोड़ लीटर पेट्रोल की खपत होती है. ये 2016 में साल भर की 196.48 मिलियन टन रही. ये तब है जब पेट्रोल 70 पार है. अब खुद ही सोचिए कि गाड़ियों की बढ़ती संख्या जो ट्रैफिक जाम से लेकर प्रदूषण तक हर बात के लिए जिम्मेदार है वो किस हद तक बढ़ जाएंगी. फिर तो दिल्ली से मुंबई की रोड ट्रिप लोग ज्यादा करेंगे. ट्रेन, मेट्रो, बस, हवाईजहाज जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कम हो जाएगा.

2. जितना खर्च अभी पेट्रोल पर सरकार कर रही है वो बढ़ जाएगा....

इसे समझने के लिए कोई गणित लगाने की जरूरत नहीं. पेट्रोल की खपत बढ़ने के साथ-साथ पेट्रोल पर सरकारी खर्च भी बढ़ेगा. अभी जब पेट्रोल महंगा है तब सरकार ने पेट्रोल खरीदने के लिए 70 बिलियन डॉलर पेट्रोल खरीदने के लिए दिए. अगर दुनिया के तीसरे सबसे ज्यादा पेट्रोल की खपत करने वाले देश की खपत बढ़ेगी तो क्रूड ऑयल के दाम भी बढ़ेंगे. साथ ही सरकार का खर्च भी बढ़ेगा. और रेवेन्यु जो पेट्रोल के बढ़े हुए दामों से मिल रहा है वो भी नहीं रहेगा. सरकार पर बोझ बढ़ेगा तो सब्सिडी और बाकी इंफ्रास्ट्रक्चर पर जो खर्च हो रहा है वो भी कम हो जाएगा. तो अर्थव्यवस्था के हिसाब से दाम 40 रुपए तक घटाना देश को और गड्ढे में ढकेल देगा.

3. नए एनर्जी रिसोर्स के बारे में भी कोई सोचे...

ये मेरा नहीं बल्कि खुद सरकार का तर्क है. कई देश हैं जहां पेट्रोल के दाम भारत से भी ज्यादा महंगे हैं. वो देश अपने नागरिकों को नए एनर्जी सोर्स की तरफ ले जा रहे हैं. देश में 57000 पेट्रोल/डीजल आउटलेट हैं और सिर्फ 1094 सीएनजी आउटलेट. पाइप गैसलाइन के यूजर्स भी 32.8 लाख हैं और एलपीजी के 18 करोड़.

जब अभी ये हाल है तो जरा सोचिए पेट्रोल के दाम अगर कम हो गए तो बाकी एनर्जी रिसोर्स जिन्हें क्लीन एनर्जी कहा जाता है उसका क्या हाल होगा.

न ही मैं मोदी भक्त हूं और न ही उनकी विरोधी. जो गलत है वो गलत है, मोदी सरकार ने हर काम सही नहीं किया और ऐसा भी नहीं है कि पेट्रोल के दाम बिलकुल भी घटाए नहीं जा सकते. सरकार का इतना टैक्स लगाना पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि थोड़ी राहत लोगों को भी देनी चाहिए, अगर सिर्फ सरकारी खजाने को भरेंगे तो भी लोग परेशान ही होंगे. ये अर्थव्यवस्था के लिए सही हो सकता है, लेकिन लोगों के लिए नहीं. पर अगर दाम एकदम से कम कर दिए तो अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी. यूपीए के समय जब 90 डॉलर प्रति बैरल तेल था तब सरकार घाटे में चल रही थी और अभी दाम क्रूड ऑयल के कम हुए हैं, लेकिन आम लोगों के लिए पेट्रोल और डीजल उतना ही है. इससे जो रिजर्व बना है वो कई काम में इस्तेमाल हो सकता है.

ये रिजर्व अगर बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए इस्तेमाल किया जाए तो डेफिनेट है कि लोगों को और सरकार को दोनों को फायदा होगा. ये रिजर्व बनना जरूरी है, लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि दाम बिलकुल भी कम नहीं किए जा सकते हैं. अगर पेट्रोल को जीएसटी के अंतरगत ला दिया गया जैसा कि धर्मेंद्र प्रधान चाह रहे हैं तो लोगों को भी फायदा होगा और सरकार को भी. तर्क दोनों ही पक्ष के बेहतर हैं, लेकिन सिर्फ अपनी जेब के बारे में न सोचते हुए अगर देश और अर्थव्यवस्था के बारे में सोचा जाएगा तो शायद समस्या थोड़ी कम होगी.

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श्रुति दीक्षित श्रुति दीक्षित @shruti.dixit.31

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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