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Updated: 27 अगस्त, 2017 03:38 PM
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बलात्कार के दोषी गुरमीत राम रहीम को 28 अगस्त को सजा सुनायी जानी है. सजा सुनाने के लिए विशेष अदालत भी उस जेल में ही लगेगी जहां राम रहीम को रखा गया है. कानूनी जानकार की राय में सजा सात से लेकर दस साल तक की हो सकती है.

महत्वपूर्ण ये नहीं लगता कि उसे इस केस में क्या सजा सुनायी जाती है, बल्कि खास बात ये है कि एक लंबी लड़ाई के बाद राम रहीम को जेल भेजा जा सका है.

अब वो कानून के शिकंजे में है

किसी भी अपराधी के लिए सजा को लेकर अब तक यही धारणा रही है कि सजा ऐसी होनी चाहिये की दोबारा कोई भी दुस्साहस करे तो उसका कलेजा कांप उठे. किसी भी अपराधी के लिए अदालत कानूनी प्रावधानों के हिसाब से सजा तय करती है. संगीन जुर्म के कई मामलों में मौत की सजा की भी व्यवस्था दी गयी है. हालांकि, फांसी की सजा को क्रूरतम बता कर इसके खिलाफ नये सिरे से बहस चल रही है.

gurmeet ram rahimकानून का शिकंजा...

राम रहीम के रसूख को देखते हुए कुछ लोगों को आशंका जरूर हो रही है कि कानूनी दावपेंचों का फायदा उठाकर वो फिर जेल से बाहर आ सकता है. लेकिन बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं. अब अगर वो बाहर भी आता है तो कानून के दायरे में ही जमानत पर छूटेगा - और ये अधिकार भी हर किसी को कानून के तहत ही मिला हुआ है.

बचाने की कोशिश तो होगी ही

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक राम रहीम के वकीलों उम्मीद नहीं थी कि राम रहीम को अदालत दोषी मान लेगी. हालांकि, कोर्ट के सामने जो सबूत रखे गये थे उससे उन्हें 50-50 का चांस लगा था. अब बचाव पक्ष कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहा है जिसके हिसाब से आगे की कानूनी लड़ाई की रणनीति तैयार की जा सके.

राम रहीम के मुकदमे की पैरवी जाने माने वकील एसके गर्ग नरवाना कर रहे हैं. हाईकोर्ट ने जब नरवाना से पूछा कि क्यों न हिंसा में हुए नुकसान की भरपाई डेरे की संपत्ति से की जाये, तो उन्होंने हिंसा में डेरा वालों का हाथ होने से इंकार कर दिया. नरवाना कबीरपंथी राम पाल की ओर से हाई कोर्ट में एक मामले में पैरवी कर चुके हैं और आसाराम के बेटे नारायण साई भी अपने खिलाफ यौन शोषण के मामले में संपर्क कर चुके हैं.

security forcesडेरा की गतिविधियों पर चला कानून का डंडा

ये तो तय है कि राम रहीम को बचाने के उपाय भी जोर शोर से चल रहे हैं - मालूम नहीं कितने लोग इसमें दिमाग लगा रहे होंगे? वश चला तो कानून से इतर भी तरीके सोचे जा रहे होंगे. जिस तरीके से राम रहीम के सुरक्षा कर्मियों ने करनाल के आईजी से कोर्ट में दुर्व्यवहार किया, बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है.

खबरें बता ही रही हैं कि मामले को दबाने के लिए कितने उपाय किये गये. कैसे कैसे सीबीआई अफसरों पर दबाव बनाये गये कि केस ही बंद हो जाये. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. हाईकोर्ट की निगरानी के चलते अफसरों का भी हौसला बुलंद रहा और उन्होंने किसी बात की परवाह नहीं की.

ध्यान रहे, राम रहीम को अभी सिर्फ एक मामले में दोषी पाया गया है - मामले अभी और भी हैं. अगले महीने भी उसी स्पेशल कोर्ट में एक अन्य केस में सुनवाई होनी है.

और कितने मामले हैं?

जिस केस में राम रहीम को दोषी माना गया है उसके अलावा भी कई मामले चल रहे हैं. सीबीआई के स्पेशल कोर्ट के अलावा दूसरी अदालतों में भी राम रहीम के खिलाफ केस चल रहे हैं. साध्वियों से बलात्कार के अलावा पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या का मामला, डेरा प्रबंधन समिति के सदस्य रणजीत सिंह मर्डर केस, डेरा के मैनेजर फकीरचंद की गुमशुदगी का मामला और डेरे के 400 लोगों को नपुंसक बनाने का मामला भी इनमें शामिल है.

द क्विंट वेबसाइट ने नपुंसक बनाये गये कुछ लोगों से बात कर रिपोर्ट प्रकाशित की है. बातचीत में एक पीड़ित हंसराज ने बताया है कि अक्‍टूबर, 2000 की एक रात अचानक उन्हें ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया. वहां पीने के लिए उन्हें एक गिलास में कोल्ड ड्रिंक दिया गया जिसे पीते ही वो बेहोश हो गये. दो दिन बाद जब होश में आये तो देखा उनके अंडकोष निकाल लिये गये थे. बाद में उन्होंने पाया कि हार्मोन के असंतुलन के चलते न तो उनकी मूंछें उग पाती हैं और न ही दाढ़ी.

इन मामलों के अलावा, जयपुर के एक शख्स ने राजस्थान हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस दाखिल कर अपनी पत्नी को राम रहीम के कब्जे से छुड़ाने की गुहार लगायी है.

राम रहीम से मिलने गयी महिला लौटी ही नहीं!

राम रहीम के प्रभाव के चलते पुलिस अब तक इस मामले की जांच ही नहीं कर पायी है. पुलिस ने अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट में कहा है कि उसे डेरा में जाने की परमिशन ही नहीं मिल पाई. अब 7 सितंबर को अदालत में सभी पक्षों को कोर्ट में तलब किया गया है.

security forcesकटने लगे डेरे के कन्क्शन...

मई, 2015 में जयपुर के जवाहर नगर के रहने वाले कमलेश ने अदालत में दाखिल अर्जी में कहा कि 26 साल की अपनी पत्नी और बच्चों के साथ वो सिरसा के डेरे में गये थे. कमलेश के अनुसार वो 23 से 25 मार्च, 2015 तक वो डेरे में ठहरे थे और इसी दौरान वहां का इंचार्ज उनकी पत्नी को राम रहीम से मिलवाने ले गया. कमलेश ने काफी इंतजार किया लेकिन पत्नी नहीं लौटीं तो फिक्र होने लगी. जब पत्नी के बारे में उन्होंने पूछा तो डेरे से भगा दिया गया. थक हार कर कमलेश ने हाईकोर्ट की शरण ली है.

बहरहाल, अंशुल को भी अब यकीन हो चला है कि उनके पिता पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को भी अब इंसाफ जरूर मिलेगा. साध्वियों की भी उम्मीद अब पक्की हो गयी होगी कि उनके भाई को न्याय अवश्य मिलेगा. कमलेश को भी उम्मीद बंध गयी होगी कि उनकी पत्नी को पुलिस डेरे से सुरक्षित बाहर जरूर निकाल लाएगी.

लोगों का ये विश्वास इसीलिए बढ़ा है क्योंकि राम रहीम को दोषी करार दिया गया है और उसे सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है. सच में ये मामूली बात नहीं है.

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