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Updated: 23 अक्टूबर, 2015 04:47 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
  @parulchandraa
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दर्द क्या होता है, कैसा होता है और कब तक सहना होता है, वो एसिड अटैक विक्टिम से बेहतर भला कौन बता सकता है. जीवन भर का दर्द लिए ये लड़कियां हर पल खुद को संभालने की कोशिश करती रहती हैं. सरकार के पास हर दर्द की दवा है. इन्हीं में से एक है सरकारी नौकरी, जो हमेशा से ही असरदार रही है.

एसिड विक्टिम के जख्मों पर दिल्ली सरकार ने भी यही मरहम लगाया है. दिल्ली सरकार 6 एसिड अटैक विक्टिम को सरकारी नौकरी देने जा रही है. यही नहीं केजरीवाल साहब ने आने वाले तीन महीनों में ऐसी ही 35 लड़कियों को नौकरी देने का वादा भी किया है. दिल्ली महिला आयोग ने एसिड अटैक पीडितों के लिए एक और राहत भी दी है. आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों को पीडितों का मुफ्त इलाज करने के निर्देश दिए हैं.

ये आदेश देकर दिल्ली सरकार ने इन लड़कियों का भविष्य तो निश्चित तौर पर सुधारा है बल्कि तालियां भी बहुत बटोरी हैं, लेकिन इन तालियों के पीछे एक आवाज अभी भी सुनाई आती है. वो ये कि 'एसिड बैन क्यों नहीं करते?? 'Acid should be banned!! पर अफसोस कि ये 'बीफ बैन' या 'पॉर्न बैन' तो है नहीं, जिस पर हमारा समाज नारे लगाता है, न इस पर बहस होती है और न सोशल मीडिया पर बयानबाजी. एसिड देश की राजनीति पर भी कोई प्रभाव नहीं डालता, न ही किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है. कोई हल्ला नहीं होता, क्योंकि इससे सिर्फ कुछ ही लड़कियों का वास्ता है, बदकिस्मती से इनकी संख्या कुछ 300 के करीब ही है.

उड़ रही हैं सरकारी फरमान की धज्जियां

ऐसा नहीं है कि सरकार ने कुछ नहीं किया. ऐसिड अटैक पीड़ित लक्ष्मी की याचिका के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट भले ही ये फैसला सुना चुका है कि एसिड की बिक्री को रेग्यूलेट किया जाएगा, लेकिन एसिड फिर भी धड़ल्ले से बिक रहा है. दिल्ली एनसीआर में एसिड 'टॉयलेट क्लीनर' के तौर पर गली गली बिकता दिख रहा है. ये एसिड बेचने वाले लोग उन रजिस्टर्ड डीलरों से अलग हैं जिनका रिकॉर्ड प्रशासन के पास है। ये लोग डीलरों से हार्ड एसिड खरीदते हैं और उसमें अपने हिसाब से पानी मिला कर घर-घर बेचते हैं। इन लोगों से किसी तरह का पहचान पत्र ब्यौरे के तौर पर नहीं लिया जाता। कोई चाहे तो मनचाहे पैसा देकर इनसे हार्ड एसिड भी खरीद सकता है, वो भी घर बैठे. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अनुसार पॉइज़न एक्ट 119 में टॉयलेट क्लीनर को भी शामिल किया जाता है, उसे भी रेग्युलेट करके ही बिकना चाहिए, लेकिन निर्देश ही तो हैं, जरूरी नहीं है कि पालन हो.

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                                                            धड़ल्ले से बिक रहा है एसिड

क्या हैं आंकड़े 

भारत में 2010 में एसिड अटैक के 57 मामले दर्ज किए गए थे, 2012 में 85, जो 2014 तक आते आते 309 हो गए. मतलब तीन सालों में ये मामले 300% बढ़ गए. जिस दर से ये मामले बढ़ रहे हैं, उस हिसाब से 2015 के आंकड़े शायद और भी चौंकाने वाले हों.

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पर क्या फर्क पड़ता है. सरकार के पास बहुत सारे मरहम हैं, जैसे- मुआवजा, सरकारी नौकरी, मुफ्त इलाज. दुख चाहे किसी तरह का भी हो, चाहे जान जाए या जिन्दगी मौत के समान हो जाये, ये हमेशा सरकार का साथ निभाते हैं. ये कुछ चीजें पीड़ितों की जिन्दगी आसान तो कर सकती हैं पर ये समस्या का हल कभी नहीं हो सकतीं. सरकार नियम तो बना लेती है पर उसका सख्ती से पालन हो इसमें चूक जाती है. एक एसिड अटैक विक्टिम ने हिम्मत कर याचिका लगाई तो ये नियम बना दिया गया कि एसिड की बिक्री रैग्यूलेट होगी. पर एसिड की खुले आम बिक्री पर लगाम कसने के लिए सरकार को और कितनी एसिड अटैक विक्टिम की याचिकाएं चाहिए? समस्या की जड़ को खत्म करने के बजाए सरकार समस्या के बाद होने वाली परेशानियां पर काम कर रही है. ये पीडितों के लिए तो अच्छा है पर उन लड़कियों का क्या जो हर रोज एसिड अटैक के डर में जीती हैं? क्या उन्हें सरकार की इस पहल पर खुश होना चाहिए?

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लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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