सियासत

 |  7-मिनट में पढ़ें  |   16-07-2017
बिजय कुमार
बिजय कुमार
  @bijaykumar80
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भारत और चीन के रिश्तों में हाल के दिनों में खासी तल्खी देखने को मिली है, वजह है पिछले महीने से सिक्किम के निकट जारी गतिरोध. दोनों देश इस तल्खी को कम करने और पहले जैसा माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इस दिशा में फिलहाल कुछ ठोस नहीं हो सका है. दशकों पुराने सीमा विवाद और हाल के घटनाक्रम ने दोनों देशों के संबंधो को 1962 के बाद एक बार फिर संशय में डाल दिया है.  

मीडिया में आ रही खबरों और विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच युद्ध हो सकता है, तो वहीं कुछ की नजर में ऐसा नहीं होगा क्योंकि हालात पहले जैसे नहीं रहे. वैसे मौजूदा वक्त दोनों देशों से संयम और परिपक्वता की मांग करता है. इतना तो जरूर है कि ये दोनों देश इस गतिरोध को दूर कर लेंगे पर ये इतनी जल्द होता नहीं दिख रहा, क्योंकि जैसे चीन ने आक्रामक रूप दिखाया है ठीक उसी के लहजे में भारत ने भी जवाब दिया है और पीछे हटने को तैयार नहीं है.

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लगभग महीने भर से जारी इस गतिरोध के दौरान दोनों देशों के बीच काफी कुछ हुआ, जिसपर चीन और भारत दोनों की नजर है. वन बेल्ट-वन रोड अभियान में भारत का शामिल न होना, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमरीका यात्रा, उसके बाद दोनों देशों की ओर से जारी बयानबाज़ी के बीच प्रधानमंत्री मोदी की इस्रायल यात्रा और फिर जर्मनी में दोनों देशो के नेताओं की बातचीत. भारत, अमेरिका और जापान की नौसेनाओं के बीच जारी मालाबार युद्धाभ्यास भी चीन की नजरों में चुभ रहा है.

ऐसा नहीं है कि चीन और भारत के रिश्ते बहुत मधुर रहे हैं, क्योंकि सीमा विवाद के अलावा भारत की अन्य चिंताओं का समाधान ढूंढने की कोशिश चीन की ओर से शायद ही की गई है. समय-समय पर चीन ने भारत विरोधी रुख दिखाया है. चाहे वो सयुंक्त राष्ट्र में पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जैश ए मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित कराने की राह में रुकावट खड़ी करना हो या फिर परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(एनएसजी) में भी भारत की सदस्यता करने का विरोध हो. हर बार चीन ने इन मामलों में भारत का समर्थन नहीं किया. हाल ही में तो चीन ने जारी गतिरोध को कश्मीर से जोड़कर यहां तक कह दिया कि जिस तरह भारत भूटान की तरफ से इस मामले में दखल दे रहा है ठीक उसी तरह पाकिस्तान की पहल पर किसी तीसरे देश की सेना कश्मीर में घुस सकती है.

पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमरीका यात्रा के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मिले. भारत और अमरीका की दोस्ती को शुरू से ही चीन संदेह की नजर से देखता रहा है, और यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमरीका यात्रा के दौरान भी दिखा, जब चीन की सरकारी मीडिया ने कहा है कि अमरीका से मिलकर चीन के मुकाबले खड़े होने की भारत की कोशिश उसके हित में नहीं है. साथ ही चीन ने इसके ‘विनाशकारी परिणाम की धमकी भी दी. चीन के सरकारी समाचार पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि चीन के बढ़ते प्रभाव से अमरीका और भारत दोनों ही देश चिंतित हैं. चीन ने भारत को 1962 के युद्ध से सबक लेने की सलाह दे दी. इस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की और रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने चीन को जवाब देते हुए कहा कि 2017 का भारत 1962 से अलग है. रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि सिक्किम सेक्टर में भारतीय और चीनी सेना के बीच तनातनी की शुरूआत चीन की ओर से हुई है.

क्या है मौजूदा विवाद

सिक्किम की सीमा पर डोकलाम इलाका इस बार विवाद का केंद्र बना है. यहां चीन, भारत और भूटान की सीमाएं मिलती है और इसी इलाके में चीन सड़क का निर्माण कर रहा था. भूटान और चीन दोनों इस इलाके पर अपना दावा करते हैं और भारत, भूटान के दावे का समर्थन करता है. भारत ने चीन को सड़क का निर्माण रोकने को कहा. सड़क बनने से रोके जाने के बाद चीनी सेना ने भारत के दो बंकर नष्ट कर दिए और इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया.

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यहां भारत का कहना है कि ये सड़क बनने से भारत के पूर्वोतर राज्यों को देश से जोड़ने वाले 20 किलोमीटर के गलियारे पर चीन की पहुंच बढ़ जाएगी. ये इलाका सामरिक रूप से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और यह बात चीन बहुत अच्छी तरह से जानता और समझता है. इधर भूटान ने भारत की मदद से चीन के सामने अपनी चिंता ज़ाहिर की क्योंकि चीन और भूटान के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं.

यहां यह भी समझना बेहद जरूरी है कि चीन की विस्तारवादी नीति पर समूचे विश्व की नजर है. चीन की विस्तारवादी सोच और नीति की वजह से उसके पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंध सहज नहीं हैं. इसमें एक अपवाद पाकिस्तान जरूर है. पाकिस्तान के साथ चीन की दोस्ती की मुख्य वजह भारत के साथ उसके संबंध हैं. चीन की मंशा हमेशा से ही छोटे पड़ोसी देशों पर दबाव बनाकर, उनसे अपनी बात मनवाने की रही है. सीमा विवाद से जुड़े मुद्दों में पिछले कुछ समय से चीन यही करता रहा है और इस बार भूटान के इस इलाके पर चीन की नजर है.

समुद्री सीमा से जुड़े विवाद चीन के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय हैं, क्योंकि समुद्री सीमा पर स्थित कई देशों से चीन को चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई, इंडोनेशिया और ताइवान जैसे दक्षिण-पूर्वी देशों ने चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

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बात करें दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग पर तो यह बीते कुछ सालों में और मजबूत हुआ है. वर्ष 2000 में यह 2.9 बिलियन डॉलर का था जो 2016 आते-आते 70.8 बिलियन डॉलर का हो गया है. ऐसे में चीन के लिए यह संभव नहीं है कि वो मौजूदा मुद्दे का समाधान करने के बजाए भारत के साथ युद्ध की सोचे.

वैसे वर्तमान मोदी सरकार द्वारा पिछले वर्ष पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में किये गए सर्जिकल स्ट्राइक ने भी पूरे विश्व में ये संदेश भेजा कि भारत अपने हित के लिए पीछे नहीं हटेगा साथ ही रक्षा मंत्री जेटली का हाल का बयान भी चीन को सोचने पर मजबूर कर रहा है तो वहीं सर्वदलीय बैठक में भी सब ने इस मुद्दे पर सरकार का साथ दिया था. यही वजह है कि दोनों देशों के बीच फिलहाल शब्दों के बाण चल रहे हैं और दोनों ही देश 'इंतजार करो और देखो' की नीति पर चल रहे हैं. कौन अपने कदम पहले वापस खींचेगा शायद इसी बात पर दोनों की नजर है. समय की मांग भी यही है कि इस गतिरोध को जल्द से जल्द दूर किया जाए. वैसे भी विश्व के दूसरे देश यह कभी नहीं चाहेंगे कि एशिया के ऐसे दो बड़े देशों के बीच लड़ाई के आसार भी पैदा हों, जिन्होंने समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था को संभाला है.

सबकी नजर अब इस बात पर टिकी है कि आखिर कब तक यह मुद्दा खिंचेगा, कुछ उम्मीद इस महीने की 27 और 28 तारीख को देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल  की चीन यात्रा से भी है, डोवाल ब्रिक्स सम्मलेन के तहत चीन जा रहे हैं. देखना है कि आखिर कौन अपने कदम पहले पीछे करता है.

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लेखक

बिजय कुमार बिजय कुमार @bijaykumar80

लेखक आजतक में एसोसिएट प्रोड्यूसर हैं

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