New

होम -> सियासत

 |  3-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 22 दिसम्बर, 2015 05:49 PM
अल्‍पयू सिंह
अल्‍पयू सिंह
  @alpyu.singh
  • Total Shares

नेशनल हेराल्ड मामले में पेशी के दौरान अभिवादन के लिए लोगों की तरफ हाथ हिलाते आत्मविश्वासी मुद्रा लिए कोर्ट में दाखिल होतीं सोनिया गांधी. एक अर्से बाद हर पीढ़ी के कांग्रेसियों का एक साथ, एक जैसी ऊर्जा के साथ दिखना. दरअसल जब कुछ दिन पहले सोनिया गांधी ने कोर्ट में पेशी के सवाल पर कहा था कि 'मैं इंदिरा की बहू हूं और किसी से डरने वाली नहीं. तब शायद उनके जेहन में वही नजारा था जो शनिवार को लुटियंस की दिल्ली में दिखाई पड़ा.

सोनिया गांधी कम बोलती हैं. लेकिन जब भी बोलती हैं तो राजनीतिक विश्लेषणों से लेकर मीडिया में भी उसके कई मायने निकाले जाते हैं. नेशनल हेराल्ड मामले में पेशी से पहले उन्होंने सास इंदिरा का नाम लिया तो इतिहास के पन्ने पलटे जाने लगे, इंदिरा और सोनिया के बीच के भावनात्मक रिश्ते की बात की जाने लगी. लेकिन मामला सिर्फ भावनात्मक ही नहीं है, इसके पीछे अनुभव का वह पक्का रंग है जो सोनिया गांधी पर उस वक्त से ही चढ़ना शुरू हो गया था, जब वह अपनी सास इंदिरा के राजनीतिक जीवन की गवाह बनी थीं.

जेवियर मोरो की किताब 'द रेड साड़ी' के मुताबिक, 'बात 1977 की है जब आपातकाल के बाद हुए चुनाव में हार के बाद इंदिरा गांधी बेहद हताश हो गईं थी. तब पत्रकार डोम मोरेस ने इंदिरा से पूछा था कि क्या आप फिर से राजनीति में आना चाहेंगी तो उन्होंने कहा था- 'नहीं, मुझे महसूस होता है कि एक भारी बोझ मेरे कंधे से उतर गया है. मैं राजनीति में वापस नहीं आना चाहती.' 59 साल की उम्र में इंदिरा गांधी शायद अपने जीवन के सबसे कठिन संकट से गुज़र रही थीं.

लेकिन 3 अक्टूबर 1977 की एक शाम कुछ ऐसा हुआ जिसने इंदिरा गांधी की राजनीतिक दिशा को एक बार फिर से बदल डाला. शाम पांच बजे सीबीआई अधिकारी एन.के. सिंह 12 वेंलिग्डन क्रीसेंट पहुंचे और उन्होंने इंदिरा से कहा कि उन्हें भ्रष्टाचार के कई आरोपों के लिए अदालत में पेश होना है और वह उन्हें लेने आए हैं. तब इंदिरा गांधी ने सोनिया गांधी से कहा कि वह जाएं और उनका सूटकेस पैक करें. रात 8 बजे यानी तीन घंटे बाद इंदिरा गांधी बाहर आईं तो उन्होने बहुत सलीके से साड़ी पहनी हुई थी. वे बेहद गरीमामयी लग रही थीं. उन्होंने एन.के. सिंह से कहा कि वो उन्हें हथकड़ियां पहनाकर ले जाएं लेकिन वे उनके हठ करने के बाद भी नहीं माने. कार में बैठने से पहले इंदिरा ने पत्रकारों से कहा कि उनके खिलाफ ये राजनीतिक बदले की गिरफ्तारी है, आरोपों से उनका कोई लेना-देना नहीं.' (द रेड साड़ी के मुताबिक)

उसके बाद की कहानी सब जानते हैं कि इंदिरा अदालत में अगले दिन पेश हुईं और उन्हें तकनीकी आधार पर बरी भी कर दिया गया. इंदिरा गांधी के घर लौटने के बाद सोनिया गांधी को समझ आया कि उनकी सास गिरफ्तारी को लेकर इतनी सयंत क्यों लग रहीं थीं? वो इतनी आत्मविश्वासी क्यों लग रही थीं? साफ था कि इंदिरा ने आपातकाल में जो देश का विश्वास खोया था उसे वो लोगों की सहानुभूति के जरिए वापस पाना चाहती थीं. यानी वो जो साबित करना चाहती थीं उसमें कामयाब भी रहीं.

तो क्या कांग्रेस और सोनिया गांधी 38 साल पहले के इस अतीत के जरिए वर्तमान को पकड़ना चाह रहे हैं. क्या सोनिया गांधी ये अच्छी तरह से नहीं जानती कि ऐसे मौके राजनीतिक जीवन में उस पड़ाव का काम करते हैं जिसके आगे मंजिल बहुत करीब दिखाई पड़ती है. आत्मविश्वास से लबरेज होकर सत्ता पर तीखे पलटवार के पीछे के संकेतों को समझना मुश्किल नहीं. बयानों में सास इंदिरा का नाम भावनात्मक रिश्ते का कम इस बात की झलक ज्यादा दिखला जाता है. राजनीति की पाठशाला के जो सबक उन्हें जो इंदिरा से मिले हैं वो उनका बाखूबी इस्तेमाल करना जानती हैं.

दरअसल कहा जाता है कि इंदिरा गांधी नेपोलियन के सेनापति डेसैक्स के उन शब्दों से बेहद प्रभावित थीं जो उसने मैरग्नो के युद्ध में कहे थे, 'बेशक इस समय दोपहर के दो बजे हैं और हम हार गए हैं लेकिन रात होने से पहले हम दोबारा जीत सकते हैं.'

तो क्या शनिवार को जो कुछ दिखा वो आगे की रणनीति की झलक भर है?

लेखक

अल्‍पयू सिंह अल्‍पयू सिंह @alpyu.singh

लेखक आज तक न्यूज चैनल में एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर हैं.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय