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Updated: 13 मई, 2021 07:29 PM
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और उनकी सरकार को अनुपम खेर से ऐसी अपेक्षा तो नहीं रही होगी - वो भी तब जब उनकी पत्नी किरण खेर बीजेपी की ही सांसद हैं, लेकिन एक टीवी इंटरव्यू में अनुपम खेर के मन की बात सुनने के बाद ये तस्वीर काफी साफ लगने लगी है.

एक इंटरव्यू में जाने माने अभिनेता अनुपम खेर ने कहा है - 'महज अपनी छवि गढ़ने ज्यादा जरूरी लोगों की जिंदगी है. मेरा मानना है कि कई मामलों में सरकार की आलोचना सही है.'

अनुपम खेर का ये बयान एकबारगी तो काफी अजीब लगा - क्योंकि वो तो बात बात पर मोदी-मोदी करने लगते हैं. फर्क इस बात से नहीं पड़ता कि मुद्दा क्या है, माहौल क्या है या फिर मंच कौन सा है?

सवाल ये हि अनुपम खेर के मन में ये बात आई कहां से? जो बातें अभी चल रही हैं और कोरोना संकट में जिस तरीके से मोदी सरकार चारों तरफ से निशाने पर है - ये तो काफी दिनों से चल रहा है. फिर अनुपम खेर को किस बात से मोहभंग हुआ है?

अनुपम खेर की निजी राय बदलने की वजह जो भी हो, लेकिन ये तो है कि अनुपम खेर ने वही बात कही है जो हाल के दिनों में सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक हर तरफ महसूस की जा रही है - देखा जाये तो अनुपम खेर का बयान लोगों के मन की बात का ही प्रतिनिधित्व करता है.

मोदी सरकार और बीजेपी समर्थकों के बदले रुख को विपक्ष भी अच्छी तरह महसूस कर रहा है - और विधानसभा चुनाव के बाद सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) का केंद्र सरकार पर हमला और कोरोना संकट के दौरान बदइंतजामियों के लिए सिस्टम की जगह मोदी सककार को दोषी ठहराने की बात से विपक्षी खेमे के तमाम नेता इत्तेफाक रखते नजर आ रहे हैं - तभी तो विपक्ष के सोनिया की पहल पर शरद पवार (Sharad Pawar) सहित कई विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी को मिल कर पत्र लिखा है.

मोदी सरकार पर विपक्ष की हावी होने की कोशिश

पश्चिम बंगाल की ही तरह उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के नतीजे आये. दोनों नतीजों की मूल वजह भले ही अलग अलग रही हो, लेकिन कॉमन बात तो यही रही कि बीजेपी की शिकस्त हुई.

पश्चिम बंगाल को लेकर कह सकते हैं कि ममता बनर्जी ने बीजेपी के विजय रथ को सरेराह रोक कर वापस भेज दिया, लेकिन उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के नतीजे तो कोरोना संकट में मोदी और योगी सरकारों के कामकाज पर अपनी राय ही जाहिर कर दी - और तो और अयोध्या, मथुरा और काशी में भी बीजेपी को मुंह की खानी पड़े, तो भला क्या समझा जाये?

narendra modi, sonia gandhi, sharad pawarमोदी सरकार के खिलाफ सोनिया गांधी को आखिरकार मिल ही गया शरद पवार का साथ

बंगाल सहित बाकी विधानसभा के चुनावों तक तो राहुल गांधी अकेले ही हमलावर नजर आते रहे, लेकिन नतीजे आने के बाद सोनिया गांधी का आक्रामक रूप दिखा है - कोरोना से मचे कोहराम के लिए सीधे सीधे मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए, सोनिया गांधी ने देश के मौजूदा हालात पर विचार के लिए सर्व दलीय बैठक बुलाने की भी मांग की थी.

सोनिया गांधी की बातों का काउंटर करने के लिए प्रकाश जावड़ेकर मीडिया के जरिये सामने भी आये और इंडियन एक्सप्रेस में लेख लिख कर एक तरीके से सरकार का बचाव करते हुए सफाई भी पेश की. प्रकाश जावड़ेकर के लेख की मिसाल देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दावा भी किया है कि कोरोना संकट से देश को उबारने के लिए मोदी सरकार लगातार काम कर रही है - ये सब सोनिया गांधी के हमले का जवाब नहीं तो क्या है?

अमित शाह कोविड संकट में विपक्ष पर राजनीति के आरोप के बीच NSUI के राष्ट्रीय महासचिव नागेश करियप्पा ने दिल्ली पुलिस में अमित शाह के लापता हो जाने की शिकायत दर्ज करायी है. नागेश करियप्पा का कहना है कि जब देश घातक महामारी से पीड़ित है और देश के नागरिक संकट में हैं, ऐसे में राजनेताओं का ये कर्तव्य है कि वो भारत सरकार या बीजेपी सरकार के प्रति ही नहीं बल्कि पूरे देश के प्रति जवाबदेह हों.

जिन 12 विपक्षी दलों के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्‌ठी लिखी है उनमें सोनिया गांधी और शरद पवार भी हैं. विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी को 9 सुझाव दिये हैं - साथ ही, मोदी सरकार पर विपक्षी दलों के सुझावों को नजरअंदाज करने का आरोप भी लगाया है.

साफ है कि नेतृत्व सोनिया गांधी ही कर रही हैं - क्योंकि मोदी सरकार को ज्यादातर सुझाव तो सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम जैसे कांग्रेस नेताओं की तरफ से ही दिये गये हैं. समझना मुश्किल नहीं है, सोनिया गांधी विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश कर रही हैं, जबकि राहुल गांधी और उनकी टीम मोदी सरकार के खिलाफ धीरे धीरे ज्यादा आक्रामक होती जा रही है.

ध्यान देने वाली बात ये है कि कांग्रेस नेतृत्व को पहली बार घोषित तौर पर विपक्ष का साथ मिलता नजर आ रहा है. वैसे तो 2020 में भी जिस तरीके से केंद्र सरकार से पहले ही लॉकडाउन लागू करने को लेकर गैर बीजेपी सरकार में होड़ मची हुई थी, मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष की अघोषित लामबंदी महसूस की जा रही थी, लेकिन इस बार की कोशिश काफी अलग लग रही है.

जो शरद पवार चीन के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस नेतृत्व को नसीहतें दिये जा रहे थे, वो सोनिया गांधी के साथ मिल कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी पर दस्तखत कर मांग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार को सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट होल्ड कर लेना चाहिये. चीन के मुद्दे पर न सही, लेकिन किसानों के मुद्दे पर और कोरोना संकट में शरद पवार कांग्रेस के साथ खड़े जरूर हैं. किसानों के मुद्दे पर राहुल गांधी के साथ राष्ट्रपति से मिलने गये - और तीनों कृषि कानूनों की वापसी की मांग में उनका मौन समर्थन ही नजर आया. हालांकि, उससे पहले वो किसानों की समस्याओं के लिए अपनी पुरानी योजना के बारे में बता रहे थे.

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को बंद कराये जाने को लेकर दायर याचिका पर केंद्र सरकार दिल्ली हाई कोर्ट से कह रही है कि उसे खारिज कर दिया जाये. जैसे लखनऊ के भैंसाकुंड श्मशान में जलती लाशें देख कर छवि खराब होने से रोकने के लिए योगी सरकार ने टिन की चादर से ढकवा दिया था - मोदी सरकार ने भी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पर रोक लगा दी है.

विपक्षी नेताओं के समानांतर 65 सिविल सोसायटी और पर्यावरण संगठनों ने केंद्र सरकार से सेंट्रल विस्टा का काम रोकने की अपील की है - और आग्रह किया है कि सरकार फिलहाल अपने सारे संसाधनों का इस्तेमाल कोरोना महामारी से लड़ाई में करे. विपक्षी नेताओं की डिमांड है कि सेंट्रल विस्टा के निर्माण का काम तुरंत रोका जाये और उस पर खर्च होने वाली रकम का इस्तेमाल ऑक्सीजन और वैक्सीन खरीदने में हो.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखी चिट्ठी पर कांग्रेस की तरफ से सोनिया गांधी, जेडीएस से पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, एनसीपी नेता शरद पवार, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे, तृणमूल कांग्रेस लीडर ममता बनर्जी, द्रमुक नेता एमके स्टालिन, JMM नेता हेमंत सोरेन, नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता फारुक अब्दुल्ला, समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, सीपीआई नेता डी राजा और सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने हस्ताक्षर किया है.

अब अगर कोई नाम इस लिस्ट में गायब है तो वो है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का - और यही वो बात है जो विपक्षी एकता में सबसे बड़ा लूप होल है.

अनुपम खेर को मोहभंग क्यों हुआ?

'डियर प्राइम मिनिस्टर!' के शुरुआती संबोधन के साथ विपक्षी नेताओं ने पत्र में लिखा है - 'पहले भी निजी और साझा तौर पर बार-बार आपका ध्यान दिलाने की कोशिश हुई है. अफसोस की बात है कि आपकी सरकार ने या तो हमारे सभी सुझावों को नजरअंदाज कर दिया या फिर नकार दिया.

विपक्षी नेताओं ने चिट्ठी के जरिये मोदी सरकार से देश भर में फौरन फ्री वैक्सीनेशन कैंपेन शुरू करने की सलाह दी है. सलाह है कि देश में वैक्सीन प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए लाइसेंस देने जैसे जरूरी कदम उठाये जायें और बजट में दिये गये 35 हजार करोड़ रुपये वैक्सीन पर खर्च किये जायें - और पीएम केअर्स फंड में जमा सारा पैसा वैक्सीन, ऑक्सीजन और मेडिकल उपकरण खरीदने के लिए जारी किये जायें.

एक ऐसी भी मांग है जिस पर कांग्रेस की एक्सक्लूसिव छाप दिखायी पड़ती है - बेरोजगारों को हर महीने 6 हजार रुपये दिये जायें - ऐसी मांग पहले भी राहुल गांधी या तो खुद करते रहे हैं या फिर नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी या आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के साथ वीडियो चैट के जरिये उठाते रहे हैं. कहा गया है कि केंद्र सरकार के गोदामों में एक करोड़ टन से ज्यादा अनाज सड़ रहा है - इसलिए जरूरतमंदों को ये अनाज मुफ्त में बांटा जाये. साथ ही, चिट्ठी के जरिये किसानों के सपोर्ट में कृषि कानूनों को भी रद्द करने की मांग की गयी है.

आखिर में एक नोट भी है, 'आपके दफ्तर या आपकी सरकार की तरफ से ऐसा कोई चलन तो नहीं रहा है, फिर भी हम देश हित और लोक हित में अपने सुझावों पर आपसे जवाब की उम्मीद रखते हैं.'

सवाल ये है कि आखिर अनुपम खेर का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर अचानक हृदय परिवर्तन क्यों हुआ?

हाल ही में अरुंधति रॉय ने लिखा था, 'भारत में लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे हिंदुओं के रूप में वोट करें - लेकिन फिर उन्हें बेकार मानकर मरने के लिए छोड़ देते हैं.'

कोरोना वायरस की दूसरी लहर आने के बाद से देश में पैदा हुए हालात को लेकर विदेशी मीडिया में में भी मोदी सरकार के प्रति आलोचनात्मक लेख प्रकाशित हुए हैं जिस पर सरकार की तरफ से बयान देकर खारिज करने की कोशिश हुई है. एक बात ऐसे सभी ओपिनियन पीस और संपादकीय में देखने को मिली है कि मोजूदा हालात के लिए मोदी सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया गया है. टाइम मैगजीन की एक कवर स्टोरी राणा अय्यूब ने लिखी है, वैसे वो हमेशा से ही मोदी विरोधियों की कतार में खड़ी पायी जाती रही हैं.

विदेशी मीडिया के ज्यादातर लेख हरिद्वार में कुंभ मेले के आयोजन और विधानसभा चुनाव के दौरान रैलियों में कोविड प्रोटोकॉल पर अमल न किये जाने को ही हालात के इस कदर बेकाबू हो जाने के लिए जिम्मेदार माना गया है.

WHO ने एक बयान में किसी खास वाकये का नाम तो नहीं लिया है, लेकिन ये जरूर कहा है कि कई धार्मिक और राजनीतिक आयोजनों में भारी भीड़ जुटना भी कोविड संक्रमण बढ़ने के कारणों में शामिल है.

ये तो नहीं कहा जा सकता कि विदेशी मीडिया का भारत सरकार के प्रति आलोचनात्मक नजरिया पहली बार देखने को मिल रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर भी ऐसे कंटेंट विदेशी मीडिया में देखने को मिले हैं. टाइम मैगजीन के पत्रकार को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर भी एक लेख के लिए वापस भेज दिया गया था - लेकिन मोदी सरकार को लेकर इतने बड़े पैमाने पर ये सब एक साथ पहली बार जरूर देखने को मिला है - जिसमें शमशान घाटों में जगह की कमी, ऑक्सीजन के लिए परेशान मरीज और उनके घरवाले, आईसीयू बेड और अस्पताल में दाखिल होने को लेकर दर दर की ठोकरें खाते लोग और अब नदियों में बह रही लाशे भी देखने को मिल रही हैं.

मेडिकल जर्नल लैंसेट ने भी हाल ही में लिखा था - 'मोदी सरकार संकट को रोकने पर ध्यान देने के बजाय अपने खिलाफ आलोचना और खुली बहस को दबाने में अधिक वक्त दे रही है.

जनवरी, 2021 में ही वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के मंच से दावोस मीट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया था - 'भारत ने कोरोना महामारी पर काबू पा लिया है और इस तरह से दुनिया को एक बड़े संकट से बचा लिया है... सरकार ने महामारी से निपटने के लिए एक मजबूत हेल्थ सिस्टम भी बना लिया है.'

लगता है दुनिया की तरह अब अनुपम खेर को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा भी आपराधिक मामलों को सॉल्व करते वक्त पुलिस के दावों जैसा लगने लगा है - और ये भी कि आम लोग यूं ही निराश नहीं हो रहे हैं. 2014 से पहले अनुपम खेर भी दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना आंदोलन के मंच पर मौजूद थे - और तब वो मनमोहन सरकार से वैसे ही निराश थे जैसे अभी मोदी सरकार से.

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