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Updated: 06 मई, 2016 06:17 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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हर खामोशी किसी न किसी तूफान के आने का इशारा करती है - और हर शोर किसी साइलेंट-सरप्राइज का. यूपी में कांग्रेस के चेहरे को लेकर जो शोर शराबा सुनाई पड़ रहा है उसमें से भी कुछ सरप्राइज एलिमेंट है क्या?

मीडिया के माध्यम से प्रशांत किशोर जो स्ट्रैटेजिक टेस्ट फायर कर रहे हैं वे निशाने पर तो लग ही रहे हैं, ये बात अलग है कि अभी उसे मिसफायर ट्रीट किया जा रहा है.

हर वोट पर नजर

क्या प्रशांत वोटिंग पैटर्न के हिसाब से स्ट्रैटेजी बनाते हैं - और उनका खास जोर स्विंग वोटर्स पर रहता है?

बिहार चुनाव को ही लें. प्रशांत को ये तो अच्छी तरह मालूम था कि डेडिकेटेड वोट कहीं नहीं जाने वाले. यानी लालू के जो यादव वोट हैं वे उन्हें मिलेंगे ही. जो तबका नीतीश को पसंद करता है, या उन्हें उनके कामकाज के लिए पसंद करता है वो उन्हें वोट देगा ही. रही बात महिलाओं की तो जेडीयू सरकार की योजनाओं के साथ साथ नीतीश कुमार की शराबबंदी की घोषणा काफी वोट सुनिश्चित कर चुका था.

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अब बचे वे थे जो लहर के हिसाब से चलते हैं. ये वे लोग होते हैं जो पता करते हैं कि सब लोग वोट किसे दे रहे हैं और फिर उसके हिसाब से मन बनाते हैं. इनमें मुस्लिम वोट भी था. मुस्लिम समुदाय को एक शख्स ऐसा चाहिए था जो बीजेपी को रोक सके. इस कैटेगरी में युवा वोट भी शामिल था. प्रशांत किशोर ने इसी वोट बैंक को नीतीश की झोली में डलवाने के इंतजाम किये. लोक सभा के चुनाव में भी पहले मोदी लहर तैयार की गई और फिर उसे भुनाया गया.

जहां तक यूपी की बात है - यहां न तो मोदी स्टाइल पूरी तरह कामयाब हो सकती है, न नीतीश स्टाइल. यही वजह है कि प्रशांत यूपी में पंजाब से भी अलग ऐंगल पर फोकस कर रहे हैं.

वोटों के कबीले

यूपी में कामयाबी का नुस्खा पूरी तरह अलग है. यूपी में बिहार जैसा कमिटेड जातीय वोट बैंक तो नहीं है लेकिन किसी न किसी फैक्टर के चलते उसने कबीलों का रूप अख्तियार कर लिया है.

वोट के इन कबीलों में दलित और मुस्लिम वोट भले ही सबसे ऊपर हों, लेकिन ब्राह्मण, ठाकुर, ओबीसी जैसे कबीले तख्त और तकदीर दोनों बदलने की हैसियत रखते हैं.

मायावती अच्छी तरह समझ चुकी हैं कि अगर उनके परंपरागत वोट बैंक के साथ अगर मुस्लिम वोट मिल जाएं तो काम बन जाएगा. इसीलिए मायावती का पूरा जोर 'दम फैक्टर' पर टिका है. अपने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले से वो निराश भले हों लेकिन हताश नहीं हैं - उन्हें इतनी तो अपेक्षा है ही कि उनके उम्मीदवार अपनी बिरादरी के कुछ न कुछ वोट तो जुटा ही लेंगे. मसलन - अगर ब्राह्मण उम्मीदवार है तो अपने अलावा दलित वोट लेकर और अगर मुस्लिम उम्मीदवार है तो अपने साथ साथ मायावती के सपोर्ट बेस का फायदा उठाकर अपनी सीट तो सुनिश्चित कर ही लेगा.

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कांग्रेस को भी अपने मिशन-84 फॉर्मूले से जरूर अपेक्षा रखनी चाहिए. आखिर कांग्रेस ने यूपी के 84 सुरक्षित सीटों के लिए बिलकुल नये तरह से तैयारी की है. इनमें ज्यादातर नये चेहरे देखने को मिल सकते हैं.

न प्रियंका, न शीला

यूपी में मायावती और अखिलेश यादव के मुकाबले न तो बीजेपी और न ही कांग्रेस के पास ऐसा कोई जाना पहचाना चेहरा है जिस पर आम राय बन सके. बीजेपी भले ही बगैर चेहरे के किस्मत आजमाने का फैसला करे, लेकिन प्रशांत की चली तो वो कांग्रेस में ऐसा कतई नहीं होने देंगे.

खबर है कि प्रशांत किशोर ने यूपी में भरोसे के चेहरे के तौर पर राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा या शीला दीक्षित का नाम सुझाया है. नाम तो ये तीनों एक से बढ़ कर एक हैं, मगर हर नाम में कम से कम एक पेंच जरूर है.

राहुल गांधी कांग्रेस के पीएम मैटीरियल हैं. जो कांग्रेस प्रधानमंत्री पद के लिए नीतीश के नाम पर हाय तौबा मचाने लग रही हो वो भला मायावती और अखिलेश के मुकाबले चुनाव मैदान में राहुल को उतारेगी? सवाल ही पैदा नहीं होता.

रही बात प्रियंका की तो वो अब तक खुद को सोनिया गांधी और राहुल के चुनाव प्रचार तक सीमित रखती आई हैं - या फिर अहम मसलों पर रायशुमारी में हिस्सा लेती आई हैं. अगर दिल्ली में कांग्रेस के ताजा पोस्टरों में रॉबर्ट वाड्रा को शामिल किया जाना कोई संकेत है तो बात और है.

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कौन होगा कांग्रेस का चेहरा?

अब बात शीला दीक्षित की. गांधी परिवार की भरोसेमंद कार्यकर्ता हैं और अरविंद केजरीवाल के रामलीला मैदान पर धावा बोलने से पहले तक इंद्रप्रस्थ की सल्तनत पर कांग्रेस का नाम लिखती रही हैं. यूपी से उनका मजबूत कनेक्शन भी है - उन्नाव उनका ससुराल जो है.

शीला नहीं तो कौन?

भरोसेमंद चेहरे के तौर पर राहुल और प्रियंका के बाद प्रशांत ने शीला का नाम आखिर क्यों लिया?

कहा जा सकता है कि यूपी की गुटबाजी के चलते कोई ऐसा चेहरा जो वहां घुल मिल भी जाए. एक वजह और है यूपी में ब्राह्मण वोट बैंक भी अहम है जिसका कुछ हिस्सा कभी मायावती के साथ फिट हो गया था. इस बार उसका झुकाव बीजेपी की ओर माना जा रहा है. शीला दीक्षित इस मामले में कांग्रेस के लिए कुछ मदद भले हो जाएं, लेकिन उनकी उम्र इसमें आड़े आ रही है, ऐसी चर्चा है.

यूपी के कई सारे छोटे दलों का जमघट नीतीश कुमार के साथ जुट रहा है जिसका ताना बाना कांग्रेस के लिए भी बुना जा रहा है. प्रशांत की कोशिश यही होगी कि कांग्रेस हर डेडिकेटेड वोट बैंक में सेंध लगा ले इससे दूसरे पक्ष स्वाभाविक तौर पर कमजोर पड़ेंगे. तब तक मीडिया और तमाम दूसरे हथकंडों के जरिये एक ऐसा माहौल बनाएं कि नई लहर जैसी लगे - यही वो स्विंग वोट है जो प्रशांत को कामयाब बनाते हैं.

कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए कांग्रेस के चेहरे के रूप में कुछ और भी नाम ऐसे ही लीक हों - और आखिर में जो सामने आए वो दलित हो या मुस्लिम!

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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