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Updated: 12 अक्टूबर, 2015 01:59 PM
विवेक शुक्ला
विवेक शुक्ला
  @vivek.shukla.1610
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भारत-पाकिस्तान के बीच लगातार तल्ख होते रिश्तों का सरहद के आर-पार होने वाले निकाहों पर भी असर हुआ. दोनों मुल्कों के रिश्ते बिगड़ते गए तो इस तरह के निकाह भी बंद हो गए. एक दौर में हर साल सैकड़ों निकाह होते थे, जब दूल्हा पाकिस्तानी होता था और दुल्हन हिन्दुस्तानी. इसी तरह से सैकड़ों शादियों में दुल्हन पाकिस्तानी होती थी और दूल्हा हिन्दुस्तानी.

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चीफ और कभी वहां के विदेश सचिव रहे शहरयार खान ने कुछ साल पहले अपने साहबजादे अली के लिए भोपाल की लड़की को अपनी बहू बनाया था. उनके फैसले पर पाकिस्तान में बहुत हंगामा बरपा था. पाकिस्तान में कट्टरपंथियों ने शहरयार साहब पर हल्ला बोलते हुए कहा, “शर्म की बात है कि शहरयार खान को अपनी बहू भारत में ही मिली. उन्हें पाकिस्तान में अपने बेटे के लिए कोई लड़की नहीं मिली.” जवाब में शहरयार खान ने कहा, “भोपाल मेरा शहर है. मैं वहां से बहू नहीं लाऊंगा, तो कहां से लाऊंगा.” दरअसल उनका भोपाल से रिश्ता रहा है. उनकी अम्मी भोपाल की कन्या थीं. वे नवाब पटौदी के चचेरे भाई हैं. उनके परिवार ने देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान का रुख कर लिया था.

सेलिब्रिटीज के निकाह
मशहूर क्रिकेटर जहीर अब्बास और मोहसिन खान ने भारतीय कन्याओं से निकाह किए. इसी तरह से मशहूर भारतीय लेखक अनिल धारकर ने पाकिस्तानी लड़की से शादी की. सादिया देहलवी ने भी पाकिस्तानी बिजनेसमेन से शादी की. पूर्व भारतीय आर्मी चीफ बिक्रम सिंह की बहू भी पाकिस्तानी हैं.

कौन करता था वहां निकाह
ये कोई बहुत पुरानी बात नहीं है जब सरहद के उस पार जाने के बाद भी शहरयार खान और उनके जैसे तमाम लोग अपने बेटे या बेटी के निकाह के लिए योग्य वर या वधू की तलाश भारत में करते रहे थे. इससे मिलती-जुलती कहानी उन तमाम भारतीय मुस्लिम परिवारों की भी है, जिनके भाई-बंधु बंटवारे या उसके बाद पाकिस्तान में जाकर बसते रहे. यानी कि बंटवारे से बंटे परिवार मौका मिलने पर सीमा के आर-पार निकाह के लिए तैयार रहते थे. आमतौर पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली के मुस्लिम पाकिस्तान में बसे अपने करीबी रिश्तेदारों के लड़के-लड़कियों से अपने बच्चों की शादी करने को खासी वरीयता देते थे. पाकिस्तान में भारत से जाकर बस गए मुसलमानों के हितों के लिए लड़ने वाली मुत्ताहिदा कौमी मुवमेंट (एमक्यूएम) के चीफ अल्ताफ हुसैन ने इस लेखक को साल 2004 में कहा था कि अगर दोनों मुल्कों के रिश्तों में सुधार नहीं हुआ तो बंटवारे के वक्त बंटे परिवार हमेशा के लिए एक-दूसरे से दूर हो जाएंगे. वे आगरा से हैं. उन्होंने कहा था कि मेरी ख्वाहिश है कि मेरे बेटे-बेटियों को योग्य दूल्हा-दुल्हन यूपी से मिले. आगरा और यूपी से हमारा बहुत गहरा रिश्ता है. यूपी की मिट्टी में दफन हैं हमारी कई पीढियां.

वीजा का झंझट
सीमा के आर-पार शादी करने के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोध आता रहा है वीजा. अभी तक भारत-पाकिस्तान एक-दूसरे के देश के नागरिकों को वीजा देने में लंबा वक्त लेते रहे हैं. हो सकता है कि कुछ मशहूर लोगों को इस लिहाज से दिक्कत नहीं आती हो, पर दोनों मुल्कों का आम अवाम इतना खुशकिस्मत कहां है. वीजा और फिर नागरिकता पाने के झंझट से बचने के लिए बहुत सारे लोग सीमा के आर-पार अपना जीवन साथी खोजना बंद कर चुके हैं.
 
जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी के हिस्ट्री विभाग में प्रोफेसर डा. ए. अहमद कहते हैं, “नब्बे के दशक तक सरहद के आर-पार काफी निकाह होते थे. लेकिन इनमें लगातार कमी आती रही क्योंकि दोनों पड़ोसी मुल्कों के संबंधों में उतार-चढ़ाव आता रहा. अब तो खत्म से हो गए सरहद के आर-पार होने वाले निकाह.”आरोप लगते रहे हैं कि निकाह के बाद भारत और पाकिस्तान सरकार ऐसे लोगों को नागरिकता देने में बहुत उदार रुख नहीं दिखाते. गाजियाबाद के महमूद अली की पत्नी कराची से हैं. उन्हें दो तरह की दिककतों से सामना करना पड़ता है. पहला, महमूद की पत्नी को निकाह के छह साल के बाद भी भारत की नागरिकता नहीं मिली. दूसरा, उन्हें भारत में रहने के लिए वीजा की अवधि को बढ़ाते रहना पड़ता है. इसे बढ़ाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती है. गृह मंत्रालय के एक आला अफसर ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि पाकिस्तानी नागरिकों को भारतीय नागरिकता देने में अकारण देरी नहीं की जाती. अगर मामला सिर्फ किसी घरेलू महिला से संबंधित है, तो नागरिकता देने में देरी करने का सवाल ही पैदा नहीं होता. हालांकि इस दावे के साथ वे लोग इत्तेफाक नहीं रखते, जिन्होंने पाकिस्तानी लड़की से विवाह किया हो. यही स्थिति उन भारतीय लड़कियों की भी है, जो पाकिस्तानी लड़कों से शादी करती हैं. भारत में पाकिस्तान उच्चायोग के डिप्टी कमिश्नर बाबर अमीन दावा करते हैं, किसी भी अन्य मुल्क की तरह ही हमारे यहां भी किसी अन्य देश के नागरिक को नागरिकता देने की कुछ शर्ते हैं. हम छह साल तक पाकिस्तान में लगातार रहने वाले इंसान को नागरिकता दे देते हैं. हमारे यहां इस आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होता कि उसका संबंध भारत से है.

खैर दावे कोई लाख करे पर खराब होते पड़ोसियों के संबंधों का असर पड़ रहा है खून के रिश्तों पर भी.

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लेखक

विवेक शुक्ला विवेक शुक्ला @vivek.shukla.1610

लेखक एक पत्रकार हैं.

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