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Updated: 26 फरवरी, 2017 04:03 PM
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होली इस बार किस रंग से खेली जाएगी और कौन रंग निखरेगा, अभी तो बस दावेदारी का दौर है. यूपी विधानसभा चुनाव में कुछ रंग ऐसे भी हैं जो उन सारे समीकरणों में फिट हो जाते हैं जो जीत के हर पैरामीटर में अव्वल नजर आते हैं.

हार जीत की बात अपनी जगह है लेकिन कुछ ऐसे उम्मीदवार हैं जिनकी मौजूदगी ने मुकाबले को खासा दिलचस्प बना दिया है.

'दम' फैक्टर का नमूना

मायावती इस बार दम फैक्टर यानी दलित-मुस्लिम गठजोड़ की मदद से यूपी की कुर्सी पर फिर से बैठने की तैयारी में जुटी हैं. यही वजह है कि मायावती ने इस बार सबसे ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है.

मायावती ने बहराइच की बलहा सीट से जिसे टिकट दिया है वो कैंडिडेट दलित-मुस्लिम प्रेम की गजब की मिसाल है - और इसीलिए हर किसी की जबान पर है.

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार ये कहानी 1992 में दिल्ली विश्वविद्यालय में एक इंटर-यूनिवर्सिटी एथलेटिक प्रतियोगिता से शुरू हुई जब गौतमबुद्ध नगर की किरण भारती और आजमगढ़ के मोहम्मद शौकत खान की मुलाकात हुई. तब शौकत खान डीयू छात्र संघ के सचिव थे और किरण लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज से फीजियोथेरेपी का कोर्स कर रही थीं. दो साल बाद दोनों ने शादी कर ली.

bansidhar-bauddh_650_022617031214.jpgयूपी के एक मंत्री ऐसे भी...

बलहा विधानसभा क्षेत्र में साढ़े तीन लाख वोटर हैं जिनमें 90 हजार मुस्लिम और 80 हजार दलित मतदाता हैं. किरण और शौकत दोनों की टोली अलग अलग इलाकों में वोट मांगने जाती है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा जा सके. जाहिर है किरण ज्यादातर वक्त दलितों के बीच होती हैं तो शौकत मुस्लिम समुदाय के साथ.

वैसे इस सीट पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार वंशीधर बौद्ध की अपनी अलग पहचान है - उनके पास अब भी पक्का मकान नहीं है. बरसों पहले बलिया से रोजी रोटी की तलाश में पिता के साथ बहराइच पहुंचे वंशीधर फिलहाल अखिलेश सरकार में राज्य मंत्री हैं.

बहराइच की तो अलग कहानी है, अयोध्या में तो बीएसपी उम्मीदवार बज्मी सिद्दीकी ने बीजेपी और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की नींद पूरी तरह हराम कर रखी है. जिस अयोध्या में डीएम और एसपी भी गैर हिंदू देखने को शायद ही मिलते हों - वहां मायावती ने एक ऐसे शख्स को टिकट दिया जो पहली बार चुनाव लड़ रहा है. बज्मी सिद्दीकी साइकिल के कारोबार से जुड़े हैं और फैजाबाद में उनका शो रूम है.

bazmi-siddiqui_650_022617031310.jpgविरोधियों पर भारी पड़ रहा मायावती का दांव...

अयोध्या की सीट ऐसी रही है जहां बरसों से बीजेपी का एक छत्र राज रहा है, लेकिन 2012 में पवन पांडे ने यहां से चुनाव जीत कर सीट समाजवादी पार्टी के नाम कर दी - पार्टी को तोहफा दिया तो रिटर्न गिफ्ट में मंत्री पद भी मिला, लिहाजा इस बार भी चुनाव मैदान में हैं. बीजेपी ने इस बार वेद प्रकाश गुप्ता को टिकट दिया है जो 2012 में बीएसपी के टिकट पर मैदान में थे. 25 साल तक विधायक रहे लल्लू सिंह पवन पांडे से शिकस्त के बाद मोदी लहर में बीजेपी की ओर से लोक सभा पहुंच चुके हैं.

अयोध्या सहित यूपी के 11 जिलों की 51 सीटों पर 27 फरवरी को वोट डाले जाने हैं.

इधर भी मैं, उधर भी...

जातीय और धार्मिक समीकरणों के खांचे में उम्मीदवारों को फिट करने के मामले में आरएलडी नेता अजीत सिंह तो मायावती से भी आगे दिखे. पश्चिम यूपी की बुलंदशहर सीट से अजित सिंह की पार्टी ने अंजू मुस्कान को मैदान में उतारा है. पश्चिम यूपी में विधानसभा चुनाव के शुरू के ही दो चरणों में वोट डाले जा चुके हैं.

अंजू मुस्कान की कहानी भी किरण भारती से मिलती जुलती है. जाति से जाटव अंजू ने इलाके के ही मुस्लिम युवक फरमान अली से शादी कर ली और फिर अंजु मुस्कान बन गयीं. बीजेपी के लव जिहाद की काट के रूप में अजीत सिंह ने अंजू को खोज निकाला. यहां के कुल 3.2 लाख वोटों में 45 हजार जाटव वोटर हैं जिनका ताल्लुक अंजू से और 50 हजार मुस्लिम हैं जिस समुदाय से फरमान आते हैं. अंजू जब वोट मांगने निकलती थी तो इलाके के लोगों के हिसाब से कहीं बेटी बन जातीं तो कहीं बहू.

पुरकाजी विधानसभा सीट से अजीत सिंह ने जिला पंचायत सदस्य छोटी बेगम को टिकट दिया. मुजफ्फरनगर की ये सीट सुरक्षित है, लेकिन छोटी बेगम इसलिए चुनाव लड़ सकीं क्योंकि उनका जन्म अनुसूचित जाति परिवार में हुआ था और शादी हुई अमीर खान से.

इस तरह छोटी बेगम को ट्रिपल फायदा मिलने की उम्मीद है - अपनी अनुसूचित जाति का वोट, पति के कारण मुसलमान और आरएलडी के चलते जाट मतदाताओं के वोट. जगह के हिसाब से छोटी बेगम वोट के लिए कहीं बहू तो कहीं बेटी और कहीं आरएलडी उम्मीदवार बता कर लोगों से चुनाव जिताने की अपील करती रहीं.

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