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सियासत

 |  3-मिनट में पढ़ें  |   26-12-2016
अभिनव राजवंश
अभिनव राजवंश
  @abhinaw.rajwansh

पूरा देश नोटबंदी के बाद 'कैशलेस' हो गया है, कमोबेश हर जगह फण्ड की कमी देखी जा रही है. मगर साल 2017 में जिन 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उन राज्यों की फ़िजा कुछ बदली बदली सी है. पिछले कुछ महीनों में इन राज्यों में करोड़ों की योजनाओं की या तो घोषणा की जा रही है या फिर उनका उद्घाटन किया जा रहा है. अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं.

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 एक ही दिन में सड़कें, हॉस्पिटल, स्कूल और थीम पार्क मिला कर 910 उद्घाटन किए

अगर बात करें सबसे ज्यादा विधानसभा सीटों वाले और कई मामलों में सबसे अहम मने जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की तो, पिछले कुछ महीनों में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 1239 फैसले किए हैं. 20 दिसम्बर को, एक ही दिन में सड़कें, हॉस्पिटल, स्कूल और थीम पार्क मिला कर 910 उद्घाटन किए. यहीं नहीं, आगामी चुनावों में ज्यादा से ज्यादा वोट पाने की जुगत में लगे अखिलेश ने इसके अलावा भी करोड़ों के योजनाओं का उद्घाटन किया, इनमें लखनऊ आगरा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन, लखनऊ मेट्रो को हरी झंडी प्रमुख हैं. हाल के ही महीनों में अखिलेश ने नोएडा-ग्रेटर नोएडा के बीच 4356 करोड़ की लागत से बनने वाले मेट्रो लाइन का भी शिलान्यास किया. अखिलेश ने 16 लाख राज्य कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें भी लागू करने की घोषणा की है.

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उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब की अकाली-भाजपा सरकार, जो कुछ महीनों पहले ही ड्रग के मुद्दे पर बुरी तरह घिर गयी थी, ने भी अपनी छवि सुधारने की लिहाज से पिछले कुछ महीनों में कई अहम निर्णय लिए हैं. बादल सरकार के अहम निर्णयों में संविदा के आधार पर विभिन्न विभागों में काम कर रहे 27000 कर्मचारियों को स्थाई करना, विभिन्न सेक्टरों में 9% वैट की कटौती और सरकारी कर्मचारियों के लिए सस्ते दामों पर होम लोन, एजुकेशन लोन और पर्सनल लोन देना शामिल हैं.

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 अकाली-भाजपा सरकार भी छवि सुधारने की लिहाज से कई अहम निर्णय ले रही है

इन राज्यों के अलावा उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के भी राज्य सरकारों ने भी जनहित योजनाओं के लिए अपनी तिजोरियां खोल रखी हैं. राज्य सरकारें चुनाव आयोग के चुनावों के घोषणा से पहले अपने खाते में ज्यादा से ज्यादा उपलब्धियां जमा करने की होड़ में दिख रहीं हैं.

हालांकि भारतीय राजनीती के लिए ये कोई नई बात नहीं हैं, आमतौर पर सभी राज्य सरकारें अपने कार्यकाल के आखिरी साल में ज्यादा से ज्यादा काम करना पसंद करती हैं. भले ही बाकि के चार साल उन्हें जनता की दुःख तकलीफों का सही एहसास न हो मगर चुनावी वर्ष में हर सरकार की काम की रफ्तार किसी बुलेट ट्रेन की तरह हो जाती है.

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ऐसे में सवाल यही है कि सरकारें चुनावी साल में जिस तत्परता से नेता-मंत्री जनहित की योजनाओं को अंजाम देते नजर आते हैं, क्या वो बाकी के कार्यकाल में नहीं दिख सकते? क्या हमारी सरकारें जानबूझ कर अपने कार्यकाल के शरुआती सालों में काम करना पसंद नहीं करती? लगता तो यही है कि हमारे नेता शायद भारतीय जनता की उस कमजोरी से भली भांति परिचित हैं जिसमें कहा जाता है कि हम भारतीय चीजों को बहुत ही जल्द भूल जाते हैं, और ऐसा कई चुनावी नतीजों में देखने को भी मिला है, जहां सरकारों ने अपने आखिरी के सालों में काम की रफ्तार बढ़ाकर सत्ता में वापसी कर ली है.

ऐसे में जनता को भी अपनी इस कमजोरी से बाहर आने की जरुरत है और सरकार चुनते वक्त आखिरी के महीनों को पैमाना न मान कर पूरे कार्यकाल के दौरान किये गए कार्यों के आधार पर चुनाव करने कि जरुरत है.

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लेखक आज तक में पत्रकार है.

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