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Updated: 29 जनवरी, 2016 01:05 PM
अभिषेक पाण्डेय
अभिषेक पाण्डेय
  @Abhishek.Journo
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धर्म और राजनीति का रिश्ता कितना गहरा है इसे समझना है तो अयोध्या चलिए. यहां आकर आपको समझ में आएगा कि कैसे धर्म के नाम पर राजनीति की जाती है और धीरे-धीरे राजनीति को ही धर्म बना दिया जाता है. कैसे धार्मिक उन्माद को राजनीतिक महत्वाकांक्षा से जोड़ा जाता है, कैसे राजनीति की बिसात पर लोगों को धर्म के नाम पर मोहरा बनाया जाता है.

और आखिर में धर्म के नाम पर लड़ने वाले लोग महज वोट बैंक बनकर रह जाते हैं. राजनीति जीत जाती है, लोग अवाक रह जाते हैं. लेकिन यह सिलसिला बंद नहीं होता है क्योंकि इससे पहले कि वे सच जानें वे राजनीति को भी धर्म मान चुके होते हैं. धर्म का नशा रगों में कब राजनीति बनकर बहने लगता है पता ही नहीं चलता.

अयोध्या में राम और रहीम के नाम पर यह सिलसिला वर्षों से चलता आ रहा है और एक बार फिर से राजनीति ने राम और रहीम के मानने वालों को आमने-सामने ला खड़ा किया है. वैसे तो यह विवाद कई दशक पुराना है लेकिन 1992 में यहां बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद से ही विवाद की आग कभी शांत ही नहीं होती बल्कि जब-तब सुलग उठती है या यूं कहें कि नेताओं द्वारा सुलगा दी जाती है. अभी कुछ ही दिन पहले अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए वीएचपी द्वारा कारसेवकपुरम में दो ट्रक पत्थर भिजवाए जाने की खबरें सुर्खियां बनीं. इससे पहले कि इस खबर की आग ठंडी होती अयोध्या में विवादित स्थल के पास ही स्थित कजियाना कॉलोनी में मुस्लिमों ने बाबरी मस्जिद के थर्माकोल मॉडल को एक मंच पर प्रदर्शित किया और इसे वीएचपी द्वारा मंदिर निर्माण के लिए भेजे गए पत्थरों की प्रतिक्रिया माना गया. आखिर क्यों अयोध्या में 1992 वाला माहौला फिर बनने लगा है? ठंडे पड़ चुके इस मुद्दे के फिर से उबाल मारने की क्या है वजह, आइए जानें?

2017 के यूपी चुनावों पर नजर! 

अगर आपको लगता है कि राम और रहीम के अनुयायियों की धार्मिक भावनाएं अचानक जाग्रत हो गई हैं तो जरा रुकिए! ऐसा बिल्कुल नहीं है. दोनों धर्मों के लोग यहां 1992 के सैंकड़ों वर्ष पहले और मस्जिद ढहाए जाने के बाद भी शांति से एकदूसरे के साथ रहते आए हैं. यही वजह है कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी अयोध्या पर दंगों के खून का धब्बा कभी नहीं लगा. पर इस धरती का अफसोस यही है कि इसकी किस्मत अक्सर बाहर वाले ज्यादा तय करते रहे हैं. इसीलिए जीत के बाद भुला दी जाने वाली अयोध्या अब फिर से चुनावों के करीब आने पर राजनीतिक दलों को याद आने लगी है.

जहां बीजेपी और वीएचपी मंदिर निर्माण के पक्ष में हवा बना रहे हैं तो वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी जैसी पार्टियां बीजेपी को राजनीतिक लाभ लेने से रोकने के लिए इसका विरोध कर रही हैं. हर पार्टी राजनीति कर रही है क्योंकि कोई भी 2017 के चुनावों में इससे मिलने वाले राजनीति लाभ से चूकना नहीं चाहता है. उनके लिए न हिंदू, जरूरी है न मुसलमान, उनकी नजर बस इनसे मिलने वाले वोटों पर हैं. इसलिए किसी भी पार्टी के लिए यह जरूरी नहीं है कि यहां राम का मंदिर बने या रहीम का मस्जिद बल्कि उन्हें सत्ता में पहुंचने का जुगाड़ चाहिए.

हर पार्टी कर रही है राजनीतिः

राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर बीजेपी ने सीधे तौर पर भले ही अभी कोई बयान नहीं दिया है लेकिन आरएसएस और वीएचपी जैसे हिंदूवादी संगठनों के ऐक्शन मोड में आने को बीजेपी के पक्ष में हवा बनाने के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि दूसरी पार्टियां इस पर राजनीति नहीं कर रही हैं. 6 दिसंबर को बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने आंबेडकर के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित समारोह का प्रयोग बड़ी चालाकी से मुस्लिम कार्ड खेलने में किया और अयोध्या में बाबरी मस्जिद को सांप्रदायिक ताकतों द्वारा ढहाए जाने का बयान दे डाला. समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने तो यहां तक कह दिया कि बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने में सब मिले हुए थे और इसे रोकने के लिए सेना ने भी कुछ नहीं किया था. यानी वोटों के धुव्रीकरण की कोशिशें हर पार्टी की तरफ से तेज हो गई हैं. फर्क सिर्फ अपने कथित सिद्धांतों और राजनीतिक फायदों के हिसाब से बयानबाजियों का है, लेकिन मकसद सबका एक ही है.

इसे देखते हुए तो यही लगता है कि आने वाला वर्ष अयोध्या के आम लोगों के लिए बहुत भारी होने वाला है. इस तनाव का सबसे ज्यादा असर आम जनजीवन पर ही पड़ता है. लेकिन इन सबसे बेफिक्र राजनीतिक पार्टियां राम और रहीम के अनुयायियों को लड़वाने पर आमादा हैं!

लेखक

अभिषेक पाण्डेय अभिषेक पाण्डेय @abhishek.journo

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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