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Updated: 10 सितम्बर, 2019 05:21 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रोहतक की रैली से पहले महाराष्ट्र के एक दिन के दौरे पर थे. मोदी के मुंबई और औरंगाबाद के कार्यक्रम तो हुए लेकिन खराब मौसम के चलते नागपुर दौरान टाल देना पड़ा.

पूरे दौरे में मोदी और उनके साथ साथ देवेंद्र फडणवीस सहित बीजेपी के तमाम नेता केंद्र की बीजेपी सरकार के 100 दिन पूरे होने पर उपलब्धियां गिनाते रहे - और साथ ही साथ इसरो के किस्से भी सुने और सुनाये जाते रहे. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी ऐसे कई मुद्दों पर बीजेपी की हां में हां मिलाते देखे गये.

बाकी चीजों के बीच बात जब बीजेपी और शिवसेना के सियासी गठबंधन पर आयी. उद्धव ठाकरे ने दोनों दलों के गठबंधन को 'अटल' करार दिया है. मतलब, अब बीजेपी और शिवसेना विधानसभा चुनावों में अलग अलग नहीं जाने वाले - बल्कि वैसे ही लड़ेंगे जैसे 2019 का लोक सभा चुनाव लड़ा था. उद्धव ठाकरे का गठबंधन को अटल बताना बीजेपी की राज्य सरकार की वापसी के हिसाब से तो बहुत ही अच्छी बात है - लेकिन आदित्य ठाकरे का क्या होगा? ये तो ऐसा लगता है उद्धव ठाकरे ने बेटे आदित्य ठाकरे के सपनों पर ही पानी फेर दिया है.

तो आदित्य ठाकरे CM नहीं बनेंगे!

2019 के आम चुनाव से पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे में संपर्क तो कई बार हुए थे, लेकिन दो मुलाकातें जबरदस्त रहीं. एक संपर्क फॉर समर्थन अभियान के दौरान जब अमित शाह मातोश्री पहुंचे थे और एक बाद में. एक और अहम मुलाकात उद्धव ठाकरे की मोदी के साथ भी हुई - और फिर दोनों की हाथ उठाये तस्वीर आईं. समझो हो ही गया. फाइनल. गठबंधन कायम रहेगा. उससे पहले उद्धव ठाकरे अयोध्या तक यात्रा कर आये थे - और आगे के लिए काशी और मथुरा का वादा भी. उससे पहले उद्धव ठाकरे की ओर से कभी संजय राउत तो कभी सामना का एडिटोरियल - अक्सर राम मंदिर के नाम पर मोदी सरकार 1.0 पर सवाल उठाते रहे.

प्रधानमंत्री मोदी के महाराष्ट्र जाने से पहले तक शिवसेना की ओर से ऐसे तैयारी चल रही थी कि लग रहा था पार्टी लोक सभा चुनाव से अलग रूख अख्तियार करेगी. इसकी एक वजह ठाकरे परिवार की तीसरी पीढ़ी के नेता आदित्य ठाकरे की राजनीतिक सक्रियता रही. पहली बार मातोश्री का कोई सदस्य चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है. सर्व साधारण को सूचित भी कर दिया गया है कि आदित्य ठाकरे मुंबई की वर्ली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले हैं.

आदित्य ठाकरे की चुनावी तैयारियों को उनकी भविष्य की संभावित योजनाओं से जोड़ कर देखा जाने लगा था - क्या ये मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आदित्य ठाकरे को बिठाने की तैयारी चल रही है? राजनीतिक गतिविधियों की जरिये शिवसेना की ओर से रह रह कर मैसेज भी दिये जा रहे थे. काफी दिनों से आदित्य ठाकरे 'आशीर्वाद यात्रा' और 'आदित्य संवाद' जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे हैं. आदित्य ठाकरे के इन राजनीतिक गतिविधियों को शिवसेना की ओर से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की महाजनादेश यात्रा के समानांतर पेश किया जा रहा था.

प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में उद्धव ठाकरे ने बीजेपी नेतृत्व की तारीफ में तमाम कसीदे पढ़े. बीजेपी के साथ गठबंधन की खासियत भी एक विशेष शब्द के जरिये समझाया - 'अटल'.

thackeray with modi and fadnavisमोदी के आगे मजबूर हुए उद्धव ठाकरे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महाराष्ट्र दौरे के बाद अब तो कोई चांस नहीं लगता कि आदित्य ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने का अब कोई चांस बचा है - और ऐसी कोई बात भी बीजेपी नेतृत्व की ओर से नहीं कही गयी है. न तो अमित शाह ने ऐसा कुछ कहा है न मोदी ने. बल्कि उद्धव ठाकरे ने ही ऐसा बयान दिया है जिससे लग रहा है कि आदित्य ठाकरे के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने के दरवाजे फिलहाल तो बंद हो ही गये हैं.

सत्ता के लिए उद्धव ठाकने ने समझौता कर लिया

महाराष्ट्र में बीजेपी की बिहार जैसी कोई मजबूरी नहीं है, इसलिए राजनीति के हर दांव खुल कर खेलती है. अभी तो बीजेपी जैसे खेल रही है - फायदा शिवसेना को भी बराबर हो रहा है. देखना होगा सीटों के बंटवारे की नौबत आने पर बीजेपी शिवसेना के साथ कैसे पेश आती है. महाराष्ट्र विधानसभा में 288 सीटें हैं और अभी तो यही माना जा रहा है कि 50-50 का बंटवारा लागू होगा. इस बीच कुछ सहयोगी दलों को 18 सीटें देने पर भी विचार विमर्श की चर्चा है.

उद्धव ठाकरे का दावा है कि बीजेपी-शिवसेना गठबंधन चुनावों बात एक बार फिर सत्ता में लौटेगा. ठाकरे ने इस बात पर भी खुशी जतायी कि प्रधानमंत्री मोदी महाराष्ट्र में बढ़ती जनसंख्या के लिए सुविधायें भी मुहैया करा रहे हैं.

उद्धव ठाकरे ने एक और खास बात बड़ी ही साफगोई के साथ की - 'हम सत्ता चाहते हैं... इसमें कोई शंका नहीं है, लेकिन हम ऐसा राज्य के विकास के लिए चाहते हैं.'

उद्धव ठाकरे का इस बात पर खास जोर भी दिखा. शिवसेना सत्ता चाहती है. बीजेपी महाराष्ट्र में भी शिवसेना को फिलहाल वैसे ही साथ रखती लगती है जैसे केंद्र में NDA के साथी दलों को. कुछ ऐसे जैसे बीजेपी अकेले भी काफी है, लेकिन सबको साथ लेकर चलने के मकसद को पूरा करने के लिए साथ भी जरूरी है.

उद्धव ठाकरे अपनी मजबूरी को समझ रहे हैं. उद्धव ठाकरे को लग रहा है कि शिवसेना भी बीजेपी के साथ ही मजबूत है. अकेले दम पर सत्ता हासिल करने शिवसेना के वश की फिलहाल तो बात नहीं है. फिर समझौते तो करने ही पड़ेंगे. कह भी रहे हैं - हम सत्ता चाहते हैं. कहने को तो ये भी कि विकास चाहते हैं इसलिए. अच्छी बात है.

लेकिन बीजेपी के साथ समझौते का मतलब भी साफ होता है. मुख्यमंत्री बीजेपी का ही होगा - किसी को कोई शक नहीं होना चाहिये. चुनावों में देवेंद्र फडणवीस ही मुख्यमंत्री का चेहरा भी होंगे और सत्ता में लौटने पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी वही बैठेंगे.

अब मुख्यमंत्री की कुर्सी तो एक ही है. फिर किसी दूसरे के लिए तो सवाल ही नहीं पैदा होता. हां, अगर दूसरे की इतनी ही दिलचस्पी है और बीजेपी ये समझती है कि राजनीति की मजबूरी है तो बगल वाली कुर्सी को एक विशेष पद तो नवाजा ही जा सकता है - डिप्टी सीएम. उद्धव ठाकरे की सत्ता की चाहते को ऐसे भी समझ सकते हैं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी का लालच छोड़ एक तरीके से मन ही मन आदित्य ठाकरे के लिए डिप्टी सीएम की कुर्सी पक्की कर ली है. जब तक मंजिल दूर लगे, पड़ावों पर भी कुछ वक्त तो गुजारे ही जा सकते हैं. चुनावों से ऐन पहले ऐसी बुद्धिमानी दिखाने में उद्धव ठाकरे हाल फिलहाल तो माहिर ही लगते हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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