व्यंग्य: देश गरीब है, मुफ्त में मिले सांसदों को खाना
सभी भत्ते मिला दिए जाएं तो बड़ी मुश्किल से सांसदों को 1.4 लाख रुपये महीने के मिलते हैं. ऐसे में उनसे सब्सिडाइज्ड कैंटीन का हक भी छीन लिया जाए, यह तो नाइंसाफी होगी.
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रात के बारह बजे संसद की आपात बैठक बुलाई गई है. सभी सांसदों के चेहरे उड़े हुए. आसानी से समझा जा सकता है कि देश की बागडोर 'संभाले' लोग गहन चर्चा करने आए हैं. इतने में अध्यक्ष महोदया आती हैं. सभी सम्मान में उठ खड़े होते हैं.
अध्यक्ष महोदया: कृपया बैठ जाइए. आप सब की चिंता से वाकिफ हूं. आखिर आपकी चिंता मेरी भी तो चिंता है. मैं पहले एक सांसद हूं, उसके बाद ही अध्यक्ष हूं. RTI के सहारे कोई भी ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा सरकार पर उंगली उठाए, यह राष्ट्र हित में नहीं है. हम इसे होते नहीं देख सकते. आज हमारे भोजन पर सवाल उठा है, कल कोई गाड़ी पर, परसों कोई सुरक्षा पर उंगली उठाएगा! आखिर कब तक हम जनता को जनार्धन मानते रहेंगे? बैठक शुरू की जाए.
मरद यादव: यह देश गरीबों का देश है. हम जनता के प्रतिनिधि हैं. उनकी 'सेवा' करते-करते हम और भी गरीब हो जाते हैं. ध्यान दीजिए अध्यक्ष महोदया, हम सब गरीबी से बेहाल हैं. हाल यह है कि आज की रात मुझे भूखे सोना पड़ा (लंबी डकार). ऐसे में हमें सब्सिडी पर खाना दिया जाता है तो इसमें गुनाह क्या है? 700-750 लोगों को भर पेट खाना खिलाने के लिए अगर सरकार को पिछले साल 14 करोड़ रुपये सब्सिडी देनी पड़ी तो इतना हंगामा काहे है?
काउल गांधी: सरकार से हमारे मतभेद हैं और रहेंगे. लेकिन 'खाना' तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. यह अधिकार तो हमारे समय में भी सभी भाई-बंधु सांसदों को मिला हुआ था. सही मायने में 2010 से लेकर अब तक के संसद मेनू की दर में कोई वृद्धि नहीं की गई है. सरकार ने हमारी दर जारी रखी, इसके लिए हम तहे दिल से शुक्रगुजार हैं. सभी भत्ते मिला दिए जाएं तो बड़ी मुश्किल से हमें 1.4 लाख रुपये महीने के मिलते हैं. इतने में घर-'बार' चलाना मुश्किल है. सरकार तत्क्षण कोई कदम उठाए, हम इसकी आशा करते हैं. हमसे हमारे 'अच्छे दिन' छीनने का सरकार को कोई हक नहीं है.
अरुण केतली: सरकार पूरी घटना पर नजर रखे हुए है. हर एक मुद्दे पर लोगों को राजनीति करने से रोकना होगा. पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों से घर-परिवार छोड़कर दिल्ली नगरी में रहने आए हम जैसे लोगों को फिश फ्राइ और चिप्स 25 रुपये में, मटन कटलेट 18 रुपये में, सब्जियां 5 रुपये में, मटन करी 20 रुपये में और मसाला डोसा 6 रुपये में मिल रहा है तो इसके लिए सरकार को शाबासी देनी चाहिए. लेकिन नहीं, लोगों को यहां भी राजनीति सूझती है. हम इस मुद्दे पर माननीय सदस्यों की वोटिंग चाहते है. आज के आज सरकार इसे खत्म करना चाहती है.
अध्यक्ष महोदया: दो मुद्दों पर वोटिंग का आग्रह आया है.
एक - सैलरी बहुत कम है. इसे बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये प्रति महीने करने का प्रस्ताव आया है. क्या आप सभी सहमत हैं?
एक साथ सारी मेजें थपथपाई जाने लगीं. द हाउस सेज यस... और बिल हुआ पास.
दूसरा - संसद की कैंटीन को सब्सिडी मिलती है. तभी लोग RTI कर सवाल पूछते हैं. इसकी सब्सिडी खत्म की जा रही है. अब इसे मुफ्त कर दिया गया है. संविधान संशोधन कर इसके लिए एक अलग बजटीय प्रावधान किया जाएगा, जो RTI दायरे से बाहर होगा. क्या आप सभी सहमत हैं?
मेजें थपथपाई नहीं ठोकी जाने लगीं. कई मेज टूट गईं. द हाउस सेज यस... और बिल हुआ पास.
अध्यक्ष महोदया: आप सभी अर्धरात्रि में भी इस अति संवेदनशील मुद्दे पर जुटे. बहस की, देश की अखंडता बरकरार रखी. मैं और यह सदन युगों-युगों तक आप सभी का आभारी रहेगा. द हाउस इज एडजर्न्ड टिल नेक्स्ट फ्री लंच!!!
वैधानिक चेतावनी: यह फिल्म संसद में, सांसदों के द्वारा और सांसदों के लिए बनाई गई है. राष्ट्रहित का ध्यान रखते हुए आम जनता के लिए यह प्रतिबंधित है. चोरी-छिपे इसे देखने वाले पर मकोका लगा दिया जाएगा. और हां, यह मंगल ग्रह की संसद है, इसे भारत की संसद समझने की भूल न करें.

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