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सिनेमा

 |  6-मिनट में पढ़ें  |   03-01-2017

साल का पहला दिन...रविवार की छुट्टी...बहुत दिनों बाद परिवार के साथ हॉल में जाकर कोई फिल्म देखी. आमिर खान प्रोडक्शन की 'दंगल'. आमिर खान के बारे में एक बात तय है कि बॉलिवुड में उनकी टक्कर की व्यावसायिक बुद्धि रखने वाला फिल्मकार इस वक्त और कोई नहीं है. इसका सबूत है नोटबंदी के दौर में भी उनकी होम प्रोडक्शन फिल्म दंगल की बॉक्स ऑफिस पर अपार कामयाबी. 70 करोड़ के बजट पर बनी दंगल रिलीज के पहले 10 दिन में ही 270 करोड़ रुपए से ऊपर कमा चुकी है.

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इससे पहले आमिर बॉक्स ऑफिस पर यही करिश्मा 2014 में 'पीके' और 2009 में  '3 इडियट्स' के लिए दिखा चुके हैं. बेशक 'पीके' और '3 इडियट्स' आमिर की होम प्रोडक्शन फिल्में नहीं थीं. उन दोनों ही फिल्मों के निर्देशक राज कुमार हिरानी और निर्माता विधू विनोद चोपड़ा थे. लेकिन उन दोनों फिल्मों की रिकॉर्डतोड़ कामयाबी में आमिर खान की मौजूदगी भी अहम फैक्टर रही, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता.

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 आमिर की फिल्म में एक ऐसा मैसेज भी है जिसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए

आमिर खान उम्र के 52वें साल में प्रवेश करने के बाद भी बड़े पर्दे पर अपना आकर्षण बनाए रखे हुए हैं तो इसके पीछे उनकी सोची-समझी स्ट्रेटेजी है. ये स्ट्रेटेजी है 'लेस एक्सपोजर' की. बॉलिवुड में मौजूदा दौर में जितने भी टॉप स्टार्स हैं, उनमें आमिर सबसे कम फिल्में करते हैं. आमिर ने इस मामले में 'अदाकार-ए-आजम' दिलीप कुमार की एक बात को अपना आदर्श बना रखा है. दिलीप कुमार ने एक बार कहा था कि अदाकार को ऐसा गुलाब होना चाहिए जो अपने हुनर की एक-एक पंखुड़ी को धीरे-धीरे खोलता है. ये नहीं कि बहुत जल्दी ही खुद को पूरा एक्सपोज कर दे.

यही वजह है कि आमिर एक वक्त में एक फिल्म ही करते हैं और जो भी किरदार निभाते हैं उसमें पूरी तरह उतर जाते हैं. किरदार की मांग के मुताबिक वो अपने शरीर को ढालते हैं. उसी गेट-अप में हर वक्त रहते हैं. आमिर ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें खुद पर भरोसा है. दूसरे सुपरस्टार्स से आमिर एक और मायने में जुदा है. वो है फिल्मों की प्रमोशन रणनीति. इन दिनों कोई भी फिल्म रिलीज होती है तो उसके प्रमोशन के लिए टीवी के पॉपुलर शोज में पूरी स्टार कास्ट को हाथ-पैर मारते देखा जा सकता है. लेकिन आमिर की रणनीति फिल्म के थीम और किरदारों के मुताबिक शहर-शहर जाकर फिल्म पर हाइप बनाने की होती है. जैसे कि 'दंगल' के लिए उन्होंने किया. 'दंगल' पहलवान महावीर सिंह फोगाट और उनकी बेटियों गीता और बबीता की रीयल लाइफ स्टोरी से प्रेरित है तो आमिर ने प्रमोशन रणनीति में इस परिवार को भी शामिल रखा. साथ ही जिन नवोदित कलाकारों ने गीता और बबीता के किरदारों को बड़े पर्दे पर उतारा, उन्हें भी पूरे समय लाइम लाइट में रखा.

'दंगल' की स्टारकास्ट में अगर महावीर सिंह फोगट का किरदार निभाने वाले आमिर खान को छोड़ दिया जाए तो साक्षी तंवर के अलावा ऐसा और कोई भी कलाकार नहीं है जिसके बारे में दर्शकों को पहले से ज्यादा कुछ पता था. 'दंगल' में आमिर की पत्नी की भूमिका निभाने वालीं साक्षी तंवर टीवी सीरियल्स का बहुत बड़ा नाम हैं लेकिन बॉलिवुड में ये उनका सही मायने में पहला बड़ा ब्रेक है. साक्षी वैसे तो फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' में सनी देओल की नायिका थीं लेकिन वो फिल्म विवादों और बैन के झंझट में ही फंस कर रह गई.  

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 फिल्म के प्रमोशन के वक्त सभी कलाकारों और असली किरदारों को साथ रखा गया

'दंगल' के दूसरे किरदारों की बात की जाए तो चाहे वो गीता का रोल निभाने वाली फातिमा सना शेख हों या बबीता के किरदार में दिखीं सान्या मल्होत्रा. या इनके बचपन के रोल निभाने वालीं जायरा वसीम और सुहानी भटनागर. या फिर 'ताऊ के भतीजे' के तौर पर दिखे अपारशक्ति खुराना. सभी को इसी फिल्म से इंट्रोड्यूस किया गया इसलिए वो दर्शकों को ताजा हवा के झोंके की तरह लगे. साथ ही फोगट परिवार की रीयल लाइफ उनमें जीवंत हो उठी. इसके लिए फिल्म के निर्देशक-लेखक नीतेश तिवारी की भी तारीफ की जानी चाहिए. आमिर ने यही रणनीति 2007 में अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म 'तारे ज़मीं पर' के लिए भी अपनाई थी. अनमोल गुप्ते की लिखी इस फिल्म के क्रेडिट रोल में निर्देशक के तौर पर खुद आमिर खान का नाम था. 'तारे जमीं पर' का ताना-बाना डिस्लेक्सिया बीमारी से पीड़ित बच्चे पर बुना गया था. आमिर ने पूरा फोकस इस बच्चे का किरदार निभाने वाले दर्शील सफारी पर ही रखा था. आमिर फिल्म में आर्ट टीचर  थे जरूर लेकिन कहीं उन्होंने अपने सुपर स्टारडम को फिल्म के थीम पर हावी नहीं होने दिया. इस फिल्म में भी आमिर खान के अलावा कोई और बड़ा स्टार मौजूद नहीं था.

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जहां तक 'दंगल' की बात है तो आमिर खान ने 'म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के' संदेश को बहुत अच्छी तरह से लोगों तक पहुंचाया. वो भी हरियाणा की पृष्ठभूमि में जहां लड़कियों का लड़कों की तुलना में कम अनुपात हमेशा ही चिंता का विषय रहा है. लड़कियों को सही मौके दिए जाएं तो वो क्या नहीं कर सकतीं. गीता और बबीता से अच्छी मिसाल और कौन हो सकती हैं. ये सही है कि 'दंगल' एक फिल्म है. क्रिएटिव लिबर्टी की वजह से किरदारों को 'लार्जर दैन लाइफ' इमेज देने में थोड़ी-बहुत अतिश्योक्ति बरती जाने से इनकार नहीं किया जा सकता.

महावीर सिंह फोगट के जरिए आमिर इस कड़वी सच्चाई को दिखाने में सफल रहे हैं कि आज भी किस तरह लड़कों को ही कुलदीपक समझा जाता है. लोग समझते हैं कि उनके वंश का नाम लड़का ही ऊंचा कर सकता है. महावीर सिंह फोगट की कहानी के जरिए आमिर ने दिखाया कि मजबूरियों के चलते महावीर को पहलवानी छोड़नी पड़ी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल लाने के सपने को पूरा नहीं कर सके. ऐसे में वो बेटे के जरिए इस सपने को पूरा करना चाहते हैं. लेकिन उनके एक के बाद एक चार लड़कियां हो जाती हैं और बेटे की आस पूरी नहीं हो पाती. फिर अपनी दोनों बड़ी बेटियों के जरिए ही वे अपने सपने को अंजाम तक पहुंचाते हैं.       

यहां तक तो सब ठीक है लेकिन फिल्म का एक एंगल ऐसा भी है जिस पर ज्यादा गौर नहीं किया गया. हकीकत में ये होता है कि हर इनसान जीवन में कुछ बड़ा बनने का सपना देखता है. किन्हीं वजहों से ये सपना पूरा नहीं हो पाता तो फिर अपनी संतान के जरिए उसे पूरा करने की कोशिश करता है. लेकिन अपना अधूरा सपना पूरा करने के लिए बच्चों को ट्रेनिंग देने की खातिर 'अत्याचार' की हद तक उतर आना कैसे जायज हो सकता है? बच्चा खुद क्या बनना चाहता है, उसकी नैसर्गिक प्रतिभा क्या है, ये जाने बिना उस पर अपनी मनमानी थोपना ना तो बाल-मनोविज्ञान की दृष्टि से उचित है और ना ही आधुनिक परिवेश की जरूरतों की दृष्टि से. बहरहाल, आमिर खान ने जिस उद्देश्य से 'दंगल' को बनाया, उस एंगल में वो पूरी तरह कामयाब रहे हैं. दर्शकों को भरपूर मनोरंजन मिल रहा है और आमिर को बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्डतोड़ कलेक्शन.

लेखक

खुशदीप सहगल खुशदीप सहगल @khushdeepsehgal

लेखक आजतक में एसोसिएट एडिटर हैं

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