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Updated: 01 नवम्बर, 2019 06:52 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
  @parulchandraa
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महाराष्ट्र में सीएम पद की कुर्सी के लिए भाजपा और शिव सेना में खींचतान की स्थिति बनी हुई है. हो सकता है कि देवेन्द्र फडनवीस ही दोबारा सीएम बन जाएं या हो सकता है कि इस बार मौका आदित्य ठाकरे को मिल जाए. सीएम जो भी हो, पर लगता नहीं कि महाराष्ट्र में महिलाओं की स्थिति बेहतर हो सकेगी. महाराष्ट्र के गांवों की जहां की महिलाएं सालों से दयनीय स्थिति में जीवन जीने को मजबूर हैं. महाराष्ट्र के कुछ मामले महिलाओं की ताजा स्थिति और उसपर सरकार की अनदेखी की पोल खोल रहे हैं.

बीड जिले को गन्ना काटाई करने वालों का जिला कहा जाता है. यहां की 50 प्रतिशत महिलाएं खेतों में गन्ना कटाई का काम करती हैं. और गन्ना कटाई के समय ये पश्चिमी महाराष्ट्र काम करने के लिए पलायन कर जाती हैं. अक्टूबर से मार्च तक लाखों लोग इस इलाके में गन्ना कटाई के लिए दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. लेकिन एक-एक पैसे को भी दांत से पकड़कर रखने वाले ठेकेदार महिलाओं को काम नहीं देना चाहते. क्योंकि उनका मानना है कि पीरियड के दिनों में महिलाएं तकलीफ में ब्रेक लेंगी या छुट्टी मांगेगी जिससे काम पर असर पड़ेगा.

women without wombsबीड की ज्यादातर महिलाएंअपनी कोख त्याग चुकी हैं

इसलिए ठेकेदार महिलाओं से कहते हैं कि अगर गन्ना कटाई का काम करना है तो पहले गर्भाशय निकलवाओ ताकि पीरियड ही न आएं. और अगर इस वजह से कोई महिला छुट्टी करती है तो उसे हर्जाने के रूप में 500 रुपए देने होते हैं. महिलाओं की मजबूरी ये कि घर चलाने के लिए काम चाहिए और काम तब मिलेगा जब बच्चेदानी निकलवाएंगी. क्योंकि वो नहीं होगा तो न पीरियड होंगे और न पीरियड का भयानक दर्द. सबसे खराब स्थिति तो ये है कि 25 साल की महिलाओं तक ने अपने गर्भाशय निकलवा दिए हैं.

राजनीति के अच्छे अच्छे खिलाड़ियों का संबंध बीड जिले से रहा है. लेकिन गन्ना ठेकेदारों द्वारा बीड जिले की महिलाओं पर किया जा रहा शोषण देखकर भी अनदेखा कर दिया गया. वजह ये भी है कि कई नेताओं की अपनी अपनी गन्ना फैक्ट्री हैं. डॉक्टरों का भी यही कहना था कि ये सब सालों से चल रहा है. इस खबर से भारत ही नहीं विदेशी मीडिया भी हिल गया. और तब राष्ट्रीय महिला आयोग(NCW) ने बीड में महिलाओं की स्थिति पर महाराष्ट्र राज्य सरकार को नोटिस भेजा और तब राज्य सरकार ने कमेटी गठित करके इस मामले की जांच करवाई. हाल ही में उस कमेटी ने इस जांच की रिपोर्ट दी जिसमें महाराष्ट्र सरकार ने पहली बार ये बात स्वीकार की, कि बीड की महिलाओं के साथ शोषण किया जा रहा है. और यहां बाकी जिलों की तुलना में कहीं ज्यादा गर्भाशय निकालने की सर्जरी करवाई गई हैं. सरकार का कहना है कि पिछले 3 सालों में बीड में 4605 hysterectomy सर्जरी यानी बच्चेदानी या गर्भाशय निकलवाए गए. एक या दो दिन की मजदूरी के लिए इन महिलाओं से उनका जैविक अधिकार छीना जा रहा है लेकिन हर कोई मूक दर्शक बना हुआ है.

women without wombsमहिलाओं की इस स्थिति पर सरकार मौन

2. पानी बाई

महाराष्ट्र के ठाणे के गांव देंगनमल में बहुविवाह होते हैं. यानी एक आदमी कई महिलाओं से शादी करता है. और वजह है 'पानी'. ये गांव भी महाराष्ट्र के उन 19 हजार गांव में से एक है जहां पानी नहीं है और यहां ज्यादातर सूखे जैसे हालात ही रहते हैं. गांव की आबादी करीब 500 है और घर की जरूरत के लिए पानी का इंतजाम करने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं पर ही होती है. पानी करीब 6 किलोमीटर दूर से भरकर लाना पड़ता है. और एक पत्नी के लिए घर के कामों के साथ-साथ पानी भरकर लाना बहुत मुश्किल होता है इसलिए पानी भरकर लाने के लिए यहां लोग शादियां करते हैं. पानी के लिए लाई गई इन दुल्हनों को 'पानी बाई' कहा जाता है. अगर दूसरी पत्नी बीमार पड़ जाए और पानी न ला सके तो वो पति तीसरी शादी भी कर सकता है.

panibaiमहाराष्ट्र की ये महिलाएं मजदूर से ज्यादा कुछ नहीं हैं

एक बार में एक महिला को कम से कम 30 लीटर पानी लाना होता है. 6 किलोमीटर दूर जाने और 30 लीटर पानी ढोकर लाने में महिलाओं को 8 से 10 घंटे लग जाते हैं. ये 'पानी बाई' वो महिलाएं हैं जो ज्यादातर विधवा हैं या फिर पति द्वारा छोडी गई हैं. लोगों की मानें तो ऐसा करके इन महिलाओं का जीवन सुधर रहा है, उन्हें घर मिल जाता है. लेकिन इसके लिए उन्हें रोज धूप में तपना पड़ता है और रात में बिस्तर पर. पुरुष अपने स्वार्थ के लिए ही इनका इस्तेमाल कर रहे हैं. इन महिलाओं के अब बच्चे भी हैं. लेकिन तपती धूप में मीलों चलकर पानी लाने वाली महिलाओं की तकलीफें किसी सरकार को नजर नहीं आईं. इसे प्रथा बना दिया गया है.

3. कौमार्य परीक्षण

महाराष्ट्र के पठारी क्षेत्रों में कंजारभाट समाज बसा हुआ है. ये समाज नई नवेली दुल्हनों के जबरन कौमार्य परीक्षण यानी वर्जिनिटी टेस्ट करने को लेकर जाना जाता है. शादी होने के बाद एक जात पंचायत बैठती है. जो कौमार्य परीक्षा के लिए वर और वधु पक्ष से 5000-5000 रुपए लेती है. इसके बाद दूल्हे को सफेद चादर देकर सुहागरात के लिए एक कमरे में भेजा जाता है. सफेद चादर यानी जिसपर शारीरिक संबंध बनाने के बाद खून के धब्बे दिखाई देने चाहिए. कमरे में इस बात का ख्याल रखा जाता है कि कोई नुकीला सामान अंदर न हो. दुल्हन के बालों में लगी पिन निकाल दी जाती है, चूड़ियों को रुमाल से बांध दिया जाता है जिससे वो टूटे न. क्योंकि सफेद चादर पर किसी और तरह के खून की कोई गुंजाइश न हो. सुबह जात पंचायत फिर बैठती है. और सबके सामने दूल्हे से पूछा जाता है कि तेरा 'माल' कैसा था? धब्बे हैं तो लड़का जवाब देता है 'मेरा माल खरा-खरा-खरा' और धब्बे नहीं हैं तो 'मेरा माल खोटा-खोटा-खोटा'.

चादर पर खून का धब्बा न हो तो लड़की को चरित्रहीन समझ लिया जाता है. और तब भरी पंचायत में लड़की के घरवाले लड़की को मारते-पीटते हैं. रिश्ता बचाने के लिए लड़कीवाले पंचायत और लड़के वालों को और पैसे देकर मनाते हैं लेकिन कई मामलों में उसी वक्त लड़की से तलाक ले लिया जाता है. ऐसे कई मामले प्रकाश में आते रहते हैं. लेकिन जब राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के कानों तक ऐसी वाहियात प्रथा की बात पहुंची तब महाराष्ट्र सरकार से जांच करने की मांग की गई. वरना महाराष्ट्र सरकार तो महिलाओं के खिलाफ होने वाले इस तरह के शोषण को प्रथा मानकर मौन ही रहती है.

4. आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवा

भले ही एक किसान आत्महत्या करता हो लेकिन उस मौत से उसका पूरा परिवार प्रभावित होता है. महाराष्ट्र में मराठवाड़ा में सबसे ज्यादा सूखा पड़ता है और इस इलाके को किसानों का sucide zone भी कहा जाता है. पिछले 5 सालों में 14000 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की और आत्महत्या के ये मामले मराठवाड़ा से सबसे ज्यादा थे. किसान के आत्महत्या करने की खबर अखबारों में तो छप जाती हैं लेकिन खबरों में ये नहीं छपता कि आत्महत्या के बाद उन किसानों के परिवार का क्या होता है, उनके घर में चूल्हा कैसे जलता है. कर्ज में डूबा किसान आत्महत्या तो कर लेता है लेकिन उसकी मौत के बाद परेशानियों का सारा बोझ उसके परिवार को उठाना पड़ता है. कर्ज तो चुकाना ही होगा, बेटा बड़ा हो तो वो चुकाएगा नहीं तो किसान की पत्नी को कुछ भी करके कर्ज चुकाना होगा. कल्पना कीजिए ऐसे किसी परिवार की, कि एक किसान की बेवा को किन मुश्किलों के साथ परिवार को पालना होता होगा. लेकिन ऐसे मामलों में सरकार कुछ को सरकारी मदद देकर फ्री हो जाती है लेकिन कुछ को कोई मदद नहीं मिलती. जनवरी से मर्च 2019 तक 610 किसानों ने आत्महत्या की इनमें से 192 मामलों में ही सरकारी मदद (1 लाख) की गई.

आज जितनी जद्दोजहद महाराष्ट्र के नेता कुर्सी के लिए कर रहे हैं, अगर उसकी आधी मेहनत भी महिलाओं की दशा सुधारने में की गई होती तो इस आधी आबादी ने वोटों के माध्यम से शुक्रिया कहा होता. फिर न गठबंधन की नौबत आई होती और न ऐसे हालात होते.

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पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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