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 |  4-मिनट में पढ़ें  |   30-03-2018
गिरिजेश वशिष्ठ
गिरिजेश वशिष्ठ
  @girijeshv
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सीबीएसई पेपर लीक कांड पर बात श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी के इस उद्धरण से करते हैं. “भारत में शिक्षा व्यवस्था, चौराहे पर पड़ी हुई उस कुतिया के समान है, जिसे हर आता-जाता और ऐरा-गैरा लतियाता रहता है” शिक्षा ही नहीं शिक्षार्थी और विद्यार्थी भी लतियाये जाने की अवस्था से बाहर निकल ही नहीं रहे हैं. दिल्ली में किसी को सीबीएसई का पर्चा मिला. पर्चा वाट्सएप पर बंटा और बवाल हो गया.

सीबीएसई का काम था कि पर्चे की गोपनीयता को बनाए रखने वाली व्यवस्था बनाए. लेकिन वो बना नहीं सकी. उसकी नाकामी लेकिन सीबीएसई का कुछ नहीं हुआ. पर्चे सीधे प्रिंसिपल के दफ्तर में पहुंचते हैं. अगर प्रिंसिपल पर्चे की गोपनीयता कायम नहीं रख पाए तो उनका कुछ नहीं बिगड़ा. पर्चे प्रिंटिंग प्रेस में छपते हैं लेकिन प्रिंटिंग प्रेस भी पर्चे पर कुछ नहीं कर सके. बचे विद्यार्थी तो श्रीलाल शुक्ल की ‘कुतिया’की तरह लात पर लात खा रहे हैं.

शिक्षा, शिक्षा व्यवस्था, छात्र, पेपर लीक   जिन विद्यार्थियों की परीक्षा रद्द हुई है वो परेशान हैं क्या करें क्या न करें

जिन विद्यार्थियों की परीक्षा रद्द हुई है वो परेशान हैं क्या करें क्या न करें. एक पर्चा लीक होने का तनाव है और बाकी की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ रहा है. जितने विद्यार्थी परीक्षा में बैठे हैं उनमें दशमलव 01 फीसदी भी ऐसे नहीं है जिन्हें वो पर्चा लीक होने के बारे में पता भी चला हो लेकिन वो झेल रहे हैं. जिन छात्रों के पास पेपरलीक का वाट्सएप आया वो भी सोशल मीडिया की तरह का दूसरा माल समझकर फॉरवर्ड करते चले गए. किसे पता कि जो पर्चा आ रहा है वो सचमुच का पर्चा है या मज़ाक लेकिन वो बच्चे भी पुलिस पूछताछ से लेकर मीडिया की खबरों तक हर चीज़ से होने वाली प्रताड़ना झेल रहे हैं.

किसी भी मनोवैज्ञानिक से पता कर लीजिए ऐसी हालत में बच्चे सामान्य नहीं रह सकते. जाहिर बात है कि परीक्षा का मूल मकसद ही खत्म हो गया. परीक्षा आखिर मूल्यांकन के लिए ही तो होती है. लेकिन अगर सही मूल्यांकन न हो सके. जब ये पता ही न चल सके कि विद्यार्थी ने जो पढ़ाया वो उसे कितना पता है तो फिर परीक्षा का क्या मतलब.

ऐसे में अलग अलग तरह की मांगें हो रही हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि परीक्षा सिर्फ दिल्ली में ही कैंसल होनी चाहिए थीं पूरे देश में नहीं. लेकिन दिल्ली के छात्रों का सही मूल्यांकन नहीं हुआ और बाकी देश का हुआ. दिल्ली के छात्र मनोवैज्ञानिक कारण से पिछड़ गए तो क्या होगा. वो भी तो न्याय संगत नहीं है.

शिक्षा, शिक्षा व्यवस्था, छात्र, पेपर लीक  सरकार को चाहिए कि वो इन छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखकर सही फैसला दे

ये है समाधान

भारत में अजीब मनोवैज्ञानिक अवस्था में बच्चों को गुजरना पड़े ऐसा पहला मौका नहीं आया है. पहले भी ऐसे ही हालात पैदा हुए थे. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद हुए दंगों के साथ साथ भोपाल गैस त्रासदी ने छात्रों की मनोदशा को प्रभावित किया था. तब की मध्यप्रदेश की सरकार ने इस मामले पर बड़ा कदम उठाया. मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने आदेश दिया कि जनरल प्रमोशन किया जाए. इम्तिहान में सभी छात्रों को पास घोषित कर दिया गया. इससे न तो मध्यप्रदेश की शिक्षा के स्तर पर कोई बुरा असर पड़ा न ही कोई नुकसान हुआ.

आज फिर वही हालात हैं. छात्रों की मनोस्थिति ऐसी नहीं है कि उनका सही मूल्यांकन किया जा सके. ऐसे में फिर से वही वक्त आया है. सभी विद्यार्थियों को कम से कम लीक पेपर वाले विषयों में पास कर देना चाहिए.औसत अंक का एक आंकड़ा तय कर दिया जाए और वो सभी छात्रों को दे दिया जाये. अकेला समाधान सिर्फ जनरल प्रमोशन है. बेईमान स्कूलों, लापरवाह सीबीएसई और मुन्नाभाई रैकट चलाने वाले लोगों की मार विद्यार्थी ही क्यों झेलें. वैसे भी बाकी कक्षाओं में विद्यार्थी सतत मूल्यांकन प्रणाली में प्रमोट हो ही रही है. इस बार बोर्ड परीक्षा में भी सहीं.

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गिरिजेश वशिष्ठ गिरिजेश वशिष्ठ @girijeshv

लेखक दिल्ली आजतक से जुडे पत्रकार हैं

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