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सियासत

 |  4-मिनट में पढ़ें  |   07-12-2018
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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राजस्थान चुनाव में कौन सी पार्टी जीतेगी, हर कोई ये जानना चाहता है. कोई एग्जिट पोल से अनुमान लगा रहा है तो कोई सट्टा मार्केट के आंकड़ों को तवज्जो दे रहा है. वहीं बहुत से लोग राजस्थान की राजनीति के इतिहास के आधार पर इस चुनाव के नतीजों का अनुमान लगा रहे हैं. राजस्थान में 1998 से ये ट्रेंड रहा है कि यहां एक बार भाजपा आती है तो दूसरी बार कांग्रेस. इससे पहले 1993 में भाजपा ने लगातार दूसरी बार राजस्थान की सत्ता पर वापसी की थी. लेकिन आपको शायद पता नहीं होगा कि राजस्थान की तीन सीटें ऐसी हैं, जो इस बात के सटीक आकलन में मदद करती हैं कि राजस्थान में किसकी सरकार बनेगी. जो भी पार्टी इन तीनों सीटों पर जीतती है, वही राजस्थान की सत्ता पर काबिज भी होती है.

राजस्थान चुनाव 2018, एग्जिट पोल, कांग्रेस, भाजपाराजस्थान चुनाव में 3 सीटें कपासन, केकरी और कुंभालगढ़ निर्णायक की भूमिका अदा करती आई हैं.

'क' का जादू

यहां जिन तीन सीटों की बात हो रही है, उनके नाम 'क' से शुरू होते हैं. ये सीटें हैं केकरी, कपासन और कुंभालगढ़. इन तीनों में से केकरी और कपासन तो बेहद खास हैं. 1951 से लेकर अब तक इन दोनों सीटों पर जो जीता है, वही सत्ता में भी रहा है. कुल 14 चुनावों में से सिर्फ एक बार इन सीटों के हिसाब से सत्ता में पार्टी नहीं रही, वरना हर बार इन सीटों ने निर्णायक भूमिका निभाई है.

1- कपासन

1977 तक राजस्थान में लगातार कांग्रेस जीतती रही. 1977 में इंदिरा गाधी के खिलाफ लहर चली थी, जिसके बाद जनता पार्टी के मोहन लाल ने कांग्रेस को हरा दिया. कपासन ने 1951 के बाद से 1977 तक लगातार कांग्रेस के उम्मीदवार को विजयी बनाया, सिर्फ एक बार पहले चुनाव में कपासन के लोगों ने बीजेएस के उम्मीदवार को जिताया था. 1977 में भारतीय जन संघ (जिससे भाजपा बनी) के नेता भैरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने. इंडिया टुडे के एग्जिट पोल ने कांग्रेस को क्लीन स्वीप करता हुआ दिखाया है और एग्जिट पोल के अनुसार भी कपासन ने इस बार कांग्रेस को ही जिताने का फैसला किया है.

2- केकरी

अगर 1967 के राजस्थान विधानसभा चुनाव को छोड़ दिया जाए तो केकरी की जनता ने हर बार जिस पार्टी के उम्मीदवार को विजयी बनाया, वही पार्टी सत्ता में काबिज हुई. 1967 में स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार ने केकरी में विजय पताका फहराई थी, लेकिन सत्ता में कांग्रेस की सरकार बनी थी. 1990 में केकरी ने जनता दल के उम्मीदवार शंभु दयाल को जिताया और राजस्थान में भाजपा की सरकार बनी. 1993 में भी शंभु दयाल यहां से दोबारा जीते. ये आखिरी बार था, जब केकरी की जनता ने लगातार दो बार एक ही पार्टी के उम्मीदवार को जिताया हो. सिर्फ एक बार को छोड़कर अब तक हमेशा सटीक नतीजे देता रहा केकरी इस बार के एग्जिट पोल के मुताबिक भी सही नतीजे दे रहा है. यहां कांग्रेस जीत रही है और सत्ता में भी कांग्रेस ही आ रही है.

3- कुंभालगढ़

1951 से लेकर अब तक कुल 13 में से 10 चुनावों में कुंभालगढ़ में जो जीता, उसी पार्टी की सरकार सत्ता में बनी. पहली बार 1951 में कुंभालगढ़ से बीजेएस के उम्मीदवार ने जीत हासिल की, लेकिन सत्ता में कांग्रेस की सरकार बनी. इसके बाद दूसरी बार 1962 में इस सीट पर स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार जीते, लेकिन उसकी सरकार नहीं बनी. वहीं तीसरी बार 1990 में इस सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार ने विजय पताका फहराई, लेकिन भाजपा सत्ता में आने में कामयाब रही. आपको बता दें कि इंडिया टुडे के एग्जिट पोल के अनुसार इस बार कुंभालगढ़ के लोगों ने भाजपा को जिताया है, जबकि सत्ता में कांग्रेस आती दिख रही है. हो सकता है कि चौथी बार कुंभालगढ़ गलत साबित हो.

इन तीन सीटों के अलावा राजस्थान की 6 ऐसी सीटें हैं, जिन्होंने 1990 के बाद से लेकर अब तक जिस पार्टी को चुनाव में जिया है, वही सत्ता में आई है. ये सीटें सूरतगढ़, सुजानगढ़, चामू, शियो, देओली-उनियरा और रानीवाड़ा हैं. चुनावों के नतीजे 11 दिसंबर को आने वाले हैं. अगर एग्जिट पोल के नतीजों पर नजर डालें तो भी यही देखने को मिलता है कि इन सभी 6 सीटों में से चार पर कांग्रेस जीत रही है और दो पर भाजपा के साथ उसकी तगड़ी टक्कर है. यानी इस बार भी ये सीटों निर्णायक हो सकती हैं. हालांकि, 11 दिसंबर को नतीजे आने के बाद ही यह साफ होगा कि इनका रिकॉर्ड बना रहेगा या टूट जाएगा.

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